कानून के समक्ष समानता से क्या अभिप्राय है

    प्रश्नकर्ता koyli
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    उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
    Moderator

     कानून के समक्ष समानता से अभिप्राय है कि राज्य का कानून या  न्यायालय किसी व्यक्ति के साथ कोई विभेद नहीं करेगा, चाहे। वह किसी भी धर्म, जाति, लिंग या वर्ण का हो। कानून की दृष्टि में सभी समान हैं।

    कानून के समक्ष समानता भारतीय संविधान के अनुच्छेद-11 में कानून के समक्ष समानता के अधिकार की विवेचना की गई है।

    अनुच्छेद-11 के अनुसार राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता तथा कानून के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।

    कानून के समक्ष समानता का आशय यह है कि कानून की नजर में सभी व्यक्ति समान होगे।

    अन्य शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि भारा में रोडरी विधि प्रणाली नहीं है। ध्यातव्य है कि फ्रांस सहित कुछ देशों में विधि की दो कोटियां साधारण विधि और प्रशासकीय विधि प्रचलित है।

    जन सामान्य को साधारण विधि तथा प्रशासकीय कर्मचारियों को प्रशासकीय विधि से नियंत्रित किया जाता है। कानून के समान संरक्षण (equal protection of law) का आरोप यह है कि समान स्थितियों में सबके साथ समान व्यवहार किया जाए।

    प्रत्येक व्यक्ति कानून के समक्ष समान है तथा किसी भी व्यक्ति को कानून के समान संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता है।

    विधि या कानून के समक्ष समानता का अधिकार एक नकारात्मक अवधारणा है जिसका आशय यह है कि किसी व्यक्ति को विशेष अधिकार नहीं दिए गए हैं और कोई भी व्यक्ति कानून से कपर नहीं है।

    किसी भी व्यक्ति को समान संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता है। यह भारतीय संविधान द्वारा प्रदत अधिकारों का सकारात्मक पक्ष है जिसका आशय यह है कि प्रत्येक व्यक्ति के साथ सभी समान परिस्थितियों में समान व्यवहार किया जाए।

    कानून के समक्ष समानता का आशय यह नहीं है कि सभी व्यक्ति बिलकुल एक समान है या व्यक्तियों के मध्य जो असमानता निहित है उसे समाप्त कर दिया जाए। समानता का आशय यह है कि जिन व्यक्तियों की परिस्थितियां एक समान हैं, उनके साथ एक जैसा व्यवहार किया जाना चाहिए।

    अन्य शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि समान व्यक्तियों के लिए समान कानून होना चाहिए, परंतु इसका आशय यह भी नहीं है कि सभी व्यक्तियों के लिए एक ही कानून हो, इसका वास्तविक आशय यह है कि समाज की भिन-भिन्न श्रेणियों के लिए मिन-भिन कानून हो सकते हैं.

    परंतु वे वर्गीकरण युक्ति संगत एवं तार्किक आधार पर किए जाने चाहिए।  इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए समानता का अधिकार निम्न की आज्ञा प्रदान करता है

    1 कानून की दृष्टि से भिन्न-भिन्न वर्गों के व्यक्तियों के लिए अलग-अलग वर्गीकरण किया जा सकता है।

    2 कुछ विशेष प्रकार के अपराधों पर मुकदमा चलाने के लिए विशेष अदालतों का भी गठन किया जा सकता है।

    3 कुछ विशेष व्यक्तियों को विशेष परिस्थितियों में विशेष अधिकार दिए जा सकते हैं।

    सर्वोच्च न्यायालय ने चौ. चिरंजीव लाल बनाम भारत संघ के मामले में अनुच्छेद-14 की विवेचना करते हुए यह व्यवस्था दी है

    समान संरक्षण का अर्थ समान परिस्थितियों में एक समान संरक्षण है।

    2 राज्य विधि निर्माण करने के लिए युक्ति संगत विधि अपना सकता है।

    3 युक्ति संगत होने की कल्पना राज्य वर्गीकरण कर सकता है।

    4 अनुच्छेद-14 के अंतर्गत प्रदत्त विधि के समक्ष समानता का आशय यह है कि जन्म, मूलवंश आदि के आधार पर व्यक्तियों के मध्य विशेषाधिकारों को प्रदान करने तथा कर्तव्यों के आधार पर भेद किया जाना एक वैधानिक अधिकार है जो भारतीय नागरिकों और विदेशी नागरिक दोनों को प्रदान किया गया है।

     

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