बंगाल विभाजन के विरुद्ध बंगाल तथा महाराष्ट्र में हुए विरोध प्रदर्शन का वर्णन कीजिए

बंगाल विभाजन का निर्णय ने 1903 में समाज को हिला दिया था। इस निर्णय ने स्वदेशी आन्दोलन को जन्म दिया, जो अप्रत्याशित था और जनता को एक सामाजिक और आर्थिक बदलाव की दिशा में प्रेरित किया। इस लेख में, हम स्वदेशी आन्दोलन के महत्वपूर्ण पहलुओं को विवेचित करेंगे, जिसने बंगाल विभाजन के खिलाफ एक ऐतिहासिक संघर्ष की शुरुआत की।

बंगाल विभाजन और आन्दोलन की उत्पत्ति

दिसम्बर 1903 में बंगाल विभाजन का प्रस्ताव बना एक सामाजिक चरित्र के रूप में प्रस्तुत हुआ। इस प्रस्ताव ने बंगाल के लोगों में गहरा आक्रोश उत्पन्न किया, जिसका परिणाम स्वदेशी आन्दोलन की शुरुआत हुई। नेताओं जैसे सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और कृष्ण कुमार मित्र ने इस प्रस्ताव के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की और अखबारों व पत्रिकाओं के माध्यम से जनता को जागरूक किया। इसके बाद, 20 जुलाई, 1905 को अंग्रेजी सरकार ने बंगाल विभाजन का निर्णय लिया, जिससे स्वदेशी आन्दोलन की शुरुआत हुई।

स्वदेशी आन्दोलन की शुरुआत

7 अगस्त, 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल में हुई एक ऐतिहासिक बैठक में स्वदेशी आन्दोलन की घोषणा की गई। इस बैठक में बहिष्कार प्रस्ताव पारित हुआ और स्वदेशी आन्दोलन ने अपना पहला कदम रखा। नेता जैसे सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने देश के दौरे पर निकलकर स्वदेशी लोगों से मैनचेस्टर के कपड़े और लिवरपूल के नमक के बहिष्कार की अपील की, जिससे आम जनता का साथ मिला।

स्वदेशी आन्दोलन और सामाजिक परिवर्तन

स्वदेशी आन्दोलन ने जनजागरूकता के लिए स्वयंसेवी संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन संगठनों ने आन्दोलन के लिए जनमत तैयार करने में महत्वपूर्ण योगदान किया। अश्विनी कुमार दत्त के नेतृत्व में गठित ‘स्वदेश बांधव समिति’ बंगाल में अपनी शाखाएँ स्थापित कीं और शिक्षा, दस्तकारी, और अन्य स्वदेशी उत्पादों के प्रचार-प्रसार का कार्य किया।

इस समय टैगोर के शांति निकेतन की तर्ज पर बंगाल नेशनल कॉलेज की स्थापना हुई और अरविन्द घोष इसके प्राचार्य बने, जिन्होंने देशी भाषाओं को प्रोत्साहित किया और इसे सांस्कृतिक विकास की दिशा में मोड़ा। इसी समय बंगाल में तकनीकी शिक्षा के लिए ‘बंगाल इंस्टीट्यूट’ की स्थापना हुई और छात्रों को उच्च शिक्षा हेतु जापान भेजा गया।

स्वदेशी आन्दोलन और सांस्कृतिक प्रभाव

स्वदेशी आन्दोलन ने सांस्कृतिक क्षेत्र में गहरा प्रभाव डाला, जिससे बंगला साहित्य का स्वर्णकाल था। इस समय अवनीन्द्र नाथ टैगोर ने भारतीय कला पर पाश्चात्य आधिपत्य को तोड़ा और नन्दलाल बोस जैसे प्रमुख चित्रकार हुए।

स्वदेशी आन्दोलन ने भारतीय समाज को एक नए दृष्टिकोण से देखने का अवसर दिया। इसने समाज के विभिन्न वर्गों को एक साथ आने का माध्यम प्रदान किया और सामाजिक और आर्थिक समृद्धि की दिशा में एक सामाजिक संजीवनी दी।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में स्वदेशी आन्दोलन का महत्वपूर्ण स्थान है। इसने समाज में जागरूकता बढ़ाई और राष्ट्रीयता की भावना को बढ़ावा दिया। यह आन्दोलन ने आपसी सदभाव, एकता, और स्वदेशी उत्पादों की प्रोत्साहना के माध्यम से देश को आर्थिक स्वावलंबी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान किया। इससे स्पष्ट है कि स्वदेशी आन्दोलन ने देश को सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी सशक्त किया।