पुष्टिमार्ग का जहाज किसे कहा जाता है

पुष्टिमार्ग का जहाज सूरदास को  कहा जाता है

कृष्णभक्ति का प्रसार पन्द्रहवीं सदी में आचार्य वल्लभ के प्रयत्नों से हुआ. वल्लभाचार्य ने पुष्टिमार्ग की स्थापना की.

भगवान का अनुग्रह ही पुष्टि कहलाता है. पुष्टिमार्ग में भावना का प्राधान्य रहता है

जिसके दो रूप हैं– भावात्मक और क्रियात्मक पुष्टिमार्गीय सेवा के सेव्य श्रीकृष्ण हैं.

सूरदास वल्लभाचार्य की पुष्टिमार्गीय भक्ति के स्तम्भ हैं. अतः वल्लभाचार्य ने उन्हें पुष्टिमार्ग का जहाज कहा. सूर की भक्ति भावना में वे सभी तत्व मिल जाते हैं जो पुष्टिमार्ग के लिए आवश्यक हैं.

सामान्य भक्ति, वैराग्यपूर्ण भक्ति, वैधी भक्ति, कांता भक्ति, सख्य भक्ति, वात्सल्य भक्ति, मधुर भक्ति और दास्य भक्ति सूर की भक्ति के रूप कहे जा सकते हैं.

इस तरह सूर ने भक्ति के विविध पक्षों को अभिव्यक्ति देकर अपनी उच्चकोटि की भक्ति-भावना को प्रकट किया है.

वल्लभाचार्यजी ने श्रीमद्भागवत् में निरूपित नवधा भक्ति को स्वीकार किया था.

आचार्यजी के मतानुसार ये नवधा भक्तियाँ (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद सेवन, अर्चन, वंदन, दासत्व, सख्य, आत्म-निवेदन) भगवान् की अनन्य प्रेमावस्था की प्राप्ति के साधन हैं.

इन साधनों को आचार्यजी वैकल्पिक न मानकर प्रेम भक्ति के लिए अनिवार्य मानते थे. तात्पर्य यह है कि वल्लभ मत में भागवत की नवधा भक्ति के अतिरिक्त दसवीं प्रेम लक्षणा भक्ति भी कही गई है.

यही मुख्य है. इसी के द्वारा भगवान् के स्वरूपानंद की प्राप्ति होती है. सूरदास ने भी नवधा भक्ति के साथ दसवीं प्रेम लक्षणा भक्ति को स्वीकार किया है |