समकालीन साहित्यिक पत्रकारिता की वर्तमान स्थिती की विवेचना करते हुये पत्रकारिता की विभिन्न प्रवृत्तियों की व्याखा करे ?

समकालीन साहित्यिक पत्रकारिता की वर्तमान स्थिती:- ये साहित्यिक पत्रकारिता का इतिहास काफी पुराना है, किसी भी देश की सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को जानने के लिये उस देश की पत्रिकाओं और समाचार पत्रों की भूमिका को नज़र अंदाज नहीं किया जा सकता।

चूंकि साहित्य और पत्रकारिता दोनों एक दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हुये हैं, यही कारण है कि जब भी आवश्यकता पड़ी सहित्यकारों ने हिन्दी पत्रकारिता को सामाजिक और राजनितिक उद्देश्य के तहत अपनाया।

हिन्दी में साहित्यिक पत्रकारिता की शुरूआत भी इसी तथ्य को सामने रखकर भारतेन्दू हरिश्चन्द्र, प्रतापनारायण मिश्र, बालमुकुंद गुप्त आदि ने की और बाद में चलकर आचार्य महावीर प्रसाद और प्रेमचंद ने उसका विकास किया।

उल्लेखनीय है कि साहित्यिक पत्रकारिता की परंपरा भारतेन्दु युग से प्रारंभ होती है भारतेन्दू के संपादन में प्रकाशित वैसे तो 25 पत्रिकाओं का उल्लेख मिलता है

जिनमें खास तौर पर कवि वचन सुधा (1867-68), हरिश्चन्द्र मैगजीन (1873-74)और हरिश्चन्द्र पत्रिका (1871) की चर्चा की जाती हैं। इन पत्रिकाओं के प्रकाशन के पीछे संपादक का उद्देश्य पाठकों को राजनीतिक विषयों की जानकारी देना था।

जनता को देश की स्थिति के प्रति सजग करना तथा पुरानी रूढ़ियों को ध्वस्त कर नई चेतनाएं जगाने का काम उक्त पत्रिकाएँ करती थीं। भारतेन्दू काल की अन्य कई पत्रिकाओं का प्रकाशन भी इसी उद्देश्य से किया जाता था।

स्वदेशी आंदोलन के दौरान इन पत्रिकाओं की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डालते हुये डॉ. रामविलास शर्मा ने एक जगह लिखा है”कांग्रेस ने अभी स्वदेशी आंदोलन विधिपूर्वक न आरंभ किया था, न बंग भंग आन्दोलन ने जन्म लिया था।

केवल हिन्दी के भारतेन्द ने स्वेदशी आंदोलन का सूत्रपात बहुत पहले कर दिया था।” कहने की आवश्यकता नहीं कि भारतेन्दू ने ‘कवि वचन सुधा’ के 23 मार्च 1874 के अंक में स्वदेशी वस्त्र पहनने पर जोर दिया था और विलायती कपड़ों का विरोध किया था।

साथ में चलकर इस मुहिम को आगे बढ़ाने का काम आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने अपनी पत्रिका ‘सरस्वती‘ के जरिए किया। आजादी के पहले हिन्दी की जो साहित्यिक पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही थीं उनमें सबसे महत्वपूर्ण पत्रिका ‘सरस्वती’ थी, जिसके कई महत्वपूर्ण अंक निकले।

चूंकि वह हिन्दी की जातीय पत्रिका थी इसलिए द्विवेदी जी उसके संपादन में काफी रुचि लेते थे। उन्होंने अपने एक पत्र में स्वीकार भी किया था कि ‘हिन्दी की एकमात्र प्रतिष्ठित पत्रिका ‘सरस्वती’ थी। मन मेरा उधर ही लगा था।

डॉ. रामविलास शर्मा ने हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं में उसके विशिष्ठ स्थान की ओर संकेत करते हुये अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण’ में लिखा है-

यदि द्विवेदीजी द्वारा संपादित ‘सरस्वती’ के पुराने अंक उठाकर किसी भी नई पुरानी पत्रिका के अंकों से मिलाये जाय तो ज्ञात होगा कि पुराने हो चुकने पर भी इन अंकों में सीखने-समझने के लिए अन्य नवीन पत्रिकाओं की अपेक्षा कहीं अधिक सामग्री है।

‘सरस्वती’ सबसे पहले ज्ञान की पत्रिका थी. वह हिन्दी नवजानगरण का मुख पत्र थी और हिन्दी भाषी जनता की सर्वमान्य जातीय पत्रिका थी। ज्ञान की पत्रिका होने के अलावा वह कलात्मक साहित्य की पत्रिका थी

ऐसे साहित्य की जो रीतिवादी रूढ़ियों का नाश करके नवीन सामाजिक सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप रचा जा रहा था। इसलिए उसने हिन्दी साहित्य में और उसके बाहर व्यापक स्तर पर भारतीय साहित्य में यह प्रतिष्ठा प्राप्त की. जो बीसवीं सदी में अन्य किसी पत्रिका को प्राप्त न हुई।

उपर्युक्त कथन में रेखांकित करने योग्य बातें हैं-‘ज्ञान की पत्रिका “हिन्दी नवजागरण का मुखपत्र’ ‘हिन्दी भाषी जनता की सर्वमान्य जातीय पत्रिका,’ ‘कलात्मक साहित्य की पत्रिका’ इन विशेषताओं के साथ अपनी पत्रिकाएं निकालने से जुड़कर सामाजिक और राजनीतिक चेतना के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही हैं,

वे हैं – समकालीन जनमत, वसुधा,समकालीन सृजन, अलाव, अभिव्यक्ति, अक्सर, वर्तमान साहित्य,कृति ओर, प्रसंग,सम्बोधन,साम्य, समकालीन चुनौती, कथन, जनपथ, अभिनव कदम तथा नया पथ।

जो आज के जमाने में जबकि बाजारवाद का गहरा प्रभाव कई पत्रिकाओं पर भी देखने में आ रहा है, छोटी और प्रगतिशील पत्रिकाओं के संपादकों को इसके प्रति विशेष रूप से सजग रहने की जरूरत है।

इस दिशा में वे ही पत्रिकाएं ज्यादा कारगर साबित हो सकती हैं जो सामान्य अंकों मे भी विशिष्ट वैचारिक सामग्री प्रस्तुत करने की दिशा मे प्रयत्नशील होगीं।

पत्रकारिता की विभिन्न प्रवृत्तियों की व्याखा:- के लिए कुछ निश्चित उद्देश्य हैं जिनपर ध्यान देना साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों के लिए जरूरी है।

1. साहित्यिक पत्रिकाओं को बड़ी अथवा व्यावसायिक पत्रिकाओं का अनुकरण नहीं करना चाहिए। जो पत्रिकाएं अधिक से अधिक वैचारिक सामग्री प्रस्तुत न कर अनावश्यक रचनाओं को प्रकाशित करने में यकीन करती हैं, वे छोटी अथवा साहित्यिक पत्रिका के मूल उद्देश्यों से रहित हैं।

2. चूंकि छोटी अथवा साहित्यिक पत्रिकाएं प्रगतिशील विचारों की पत्रिका होती हैं जिनमें प्रतिगामी प्रतिक्रियावादी विचारों का कोई स्थान नहीं होता अतः ऐसी पत्रिकाओं का सरोकार व्यापक जनता की आशा. आकांक्षा और समस्याओं से होता है। ये वर्गीय चिन्तन के विकास में भी सहायक होती हैं।

3.साहित्यिक पत्रिकाएं मूलतः श्रमजीवी होती हैं, जिनके सामने आर्थिक संकट बराबर बना रहता है। उनकी व्यवसायिक पत्रिकाओं के साथ प्रतियोगिता जारी रहती है इनमें प्रकाशित होने वाले रचनाकार भी प्रगतिशील सोच और प्रायः क्रांतिकारी तेवर के होते हैं।

अत: इनकी रचनाओं का व्यापक पाठक वर्ग पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। और ये पत्रिकाएं अपनी स्तरीय और जनपक्ष रचनाओं के बल पर जनोपयगी बनी रहती हैं।

4. चूंकि इन पत्रिकाओं का मुख्य उद्देश्य व्यापक जनता की चेतना और दृष्टि को विकसित करना होता है, जो व्यावसायिक और बड़ी पत्रिकाएं नहीं कर पाती इसलिए इन पत्रिकाओं का प्रचार-प्रसार सजग पाठकों और बुध्दिजीवियों के बीच ज्यादा होता है।

वैसे इन पत्रिकाओं की ओर सामान्य पाठकों की रूचि भी धीरे-धीरे बढ़ रही है जिसका कारण इनमें प्रकाशित सोद्देश्य रचनाएं हैं।

इस प्रकार देखें तो छोटी, अव्यवसायिक और तथाकथित साहित्यिक पत्रिकाएं प्रगतिशील और जनवादी विचारधारा से परिभाषित होती हैं और उनका प्रगतिशील और जनवादी बने रहना बहुत कुछ संपादकीय चेतना और दृष्टि पर निर्भर होता है।

लिहाजा ऐसी पत्रिकाओं का भविष्य सदैव उज्ज्वल होता है। यह बात अलग है

आज के संदर्भ में जबकि देश और समाज में बर्जुआ-वर्ग की ओर से बराबर जन-विरोधी स्थितियां पैदा की जा रही हैं. इन पत्रिकाओं के संपादकों और लेखकों का दायित्व बढ़ गया है।

दूसरी ओर जैसे-जैसे सभ्यता का संकट बढ़ता जाएगा वैसे-वैसे सामाजिक और राजनीतिक स्थितियां भी जटिल होती जाएंगी। ऐसे में जनवादी साहित्य के प्रचार-प्रसार की आवश्यकता बढ़ जाएगी।

चूंकि इस प्रकार से साहित्य का प्रकाशन छोटी पत्रिकाओं के माध्यम से ही संभव हो पाता है, अतएव छोटी अथवा साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों को इस दिशा में सतर्क रहना चाहिए।

उन्हें व्यावसायिक पत्रिकाओं में प्रकाशित जन-विरोधी अथवा बुर्जुआ-वर्ग की पक्षधर रचनाओं और उनके रचनाकारों की आलोचना कर इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करना चाहिए कि गैरजनवादी रचनाशीलता इस देश और समाज के लिए घातक है।

दरअसल इस उत्तर आधुनिक युग में लघु और जनवादी पत्रिकाओं की भूमिका को महत्व की दृष्टि से देखा जाने लगा है इनका भविष्य भी उज्जवल है, इसमें सन्देह नहीं।