प्रारंभिक मध्ययुगीन काल में राजपूतों के उदय से संबंधित विभिन्न सिद्धांतों की चर्चा कीजिए

मध्ययुगीन काल में हमारा सामना राजपूत नामक एक नई जाति से भी होता है। राजपूतों के उद्भव के संबंध में विद्वानों के बीच काफी विवाद है। अनेक राजपूत कुल (कलान) अपने मूल को महाभारत में उल्लिखित सूर्यवंशी और चंद्रवंशी क्षत्रियों से जोड़ते हैं। कुछ अन्य कुल दावा करते हैं कि उनका उद्भव मनि वशिष्ठ द्वारा माउंटआब पर प्रज्वलित यज्ञाग्नि से हुआ। हम इन परंपराओं पर भरोसा नहीं कर सकते क्योंकि इनमें से कई का आर्थिक तथा सामाजिक जीवन, शिक्षा और धार्मिक विश्वास प्रथम उल्लेख बाद की चारण परंपराओं में ही हुआ है। उदाहरण के लिए यज्ञाग्निवाली परंपरा की स्थिति ऐसी ही है जबकि इसमें से उद्भूत होने का दावा अनेक राजपूत कुल प्रतिहार, परमार, चौहान, और सोलंकी करते हैं। परंपराओं से हम केवल यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि अलग-अलग राजपूत कुलों के मूल अलग-अलग हैं। कुछ भारतीय और विदेशी विद्वान मानते हैं कि इन कुलों में से कइयों के पूर्वज वे सीथियाई और हूण लोग थे जो हर्ष के काल के बाद भारत में बसे गए थे और कई कुलों का उद्भव ऐसी ही जनजातियों से हुआ। समय-समय पर देश में क्षत्रियों के अतिरिक्त ब्राह्मण और वैश्य परिवार भी शासनं करते रहे।

मालुम होता है कि कालांतर से विभिन्न जातियों के सभी शासक घरानों को राजपुत्र या राजपूत कहा जाने लगा एवं उन्हें क्षत्रियों का दर्जा दे दिया गया। देखा जा सकता है कि जातियों की व्यवस्था उतनी कठोर नहीं थी जितनी कि कभी-कभी मानी जाती है। व्यक्ति और समह वर्ण-सोपान में ऊपर उठ सकते हैं और नीचे भी गिर सकते हैं। कभी-कभी वर्ण सोपान में नई जातियों का स्थान निर्धारित करना कठिन हो जाता था। इसका एक उदाहरण कायस्थ जाति है जिसका उल्लेख इस काल से विशेष रूप से होने लगता है। मालूम होता है कि ब्राह्मणों और शूद्रों सहित विभिन्न जातियों के जो लोग राजकीय स्थापनाओं में कार्यरत थे कायस्थ कहा जाता था। कालांतर से वे एक अलग जाति के रूप में सामने आए। इस काल में हिंदु धर्म का विस्तार तेज़ी से हो रहा था। हिंदू धर्म ने न केवल बड़ी संख्या में बौद्धों और जैनों को अपने अंदर समाहार कर लिया था बल्कि बहत-सी देसीजनजातियों और विदेशियों को भी हिंदू बना लिया। ये नए हिंद नई जातियों और उपजातियों के रूप में हिंदू समाज में पच-रच गए। लेकिन अक्सर अन्होंने अपने पुराने रीतिरिवाजों, वैवाहिक रस्मों और यहाँ तक कि अपने मूल देवी देवताओं को भी कायम रखा। इस प्रकारे, समाज और धर्म अधिकाधिक जठिल होता गया।