मारवाड़ी को राजस्थानी उपभाषा की प्रतिनिधि और आदर्श बोली कहा जाता है कि विवेचना करते हैं इसकी विशेषताओं का वर्णन कीजिए

मारवाड़ी: राजस्थान की आदर्श उपभाषा

मारवाड़ी, राजस्थान के साहित्यिक और भाषाई सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, जिसे मारवाड़ क्षेत्र की उपभाषा के रूप में जाना जाता है। इसका उद्भाव शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है और इसे राजस्थान के कई क्षेत्रों में स्थानीय भाषा के रूप में बोला जाता है। आइए इस उपभाषा की विशेषताओं का विवेचना करें।

मारवाड़ी क्षेत्र

मारवाड़ी का विकास मुख्य रूप से जोधपुर, अजमेर, बीकानेर, जैसलमेर, मेवाड़, सिरोही और इनके आसपास के क्षेत्रों में हुआ है। यहां की जनता मारवाड़ी में संवाद करने का आदर्श और स्थानीय भाषा को बनाए रखने में योगदान करती है।

साहित्य और लोक-साहित्य

मारवाड़ी साहित्य में इसका आरम्भ ‘डिंगल’ रूप में हुआ था, जो काव्य-रचना के लिए प्रयुक्त होता है। इसका साहित्यिक विकास से राजस्थानी की सभी उपभाषाओं में मारवाड़ी सबसे समृद्ध है। यहां साहित्य और लोक-साहित्य का अध्ययन करने के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है।

ध्वनियाँ और विशेषताएँ

  1. ‘ल’ ध्वनि: मारवाड़ी में ‘ल’ ध्वनि का उच्चारण अनेक बार ‘ल’ रूप में होता है, जैसे- ‘बाल’ से ‘बाल’, ‘गाली’ से ‘गाली’ आदि। यह इस भाषा को अनूठा बनाता है।
  2. ‘ऐ’ और ‘औ’ स्वरों का संयुक्त-स्वर: इसमें ‘ऐ’ और ‘औ’ स्वरों का उच्चारण कई बार संयुक्त-स्वर ‘अइ’ और ‘अड’ रूप में मिलता है, जिससे इसकी विशेषता बढ़ती है।
  3. विशेष ध्वनियाँ: मारवाड़ी में ‘ध’ और ‘स’ ध्वनियाँ मिलती हैं, जो कि क्लिक (Click) ध्वनियाँ हैं और इसे और भी विशेष बनाती हैं।

मारवाड़ी को राजस्थान की उपभाषा की अद्वितीय प्रतिनिधि और आदर्श बोली माना जाता है, जो इसकी ध्वनियों, शब्दावली, और साहित्यिक धारा से साबित होता है। इस अद्वितीयता के कारण, मारवाड़ी का साहित्य राजस्थानी भाषाओं में अपना विशिष्ट स्थान बना रखता है।