क्रिप्स मिशन का उद्देश्य क्या था? यह असफल क्यों हुआ?

द्वितीय विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों की स्थिति बिगड़ती जा रही थी तब ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल ने भारतीयों से सहयोग प्राप्त करने के उद्देश्य से एक सद्भावना मंडल भारत भेजा जिसके अध्यक्ष सर स्टेफर्ड क्रिप्स थे। 22 मार्च, 1942 को ‘क्रिप्स मिशन’ भारत पहुँचा। चूँकि इस आयोग के अध्यक्ष सर स्टेफर्ड क्रिप्स थे अत: यह क्रिप्स मिशन के नाम से जाना जाता है। इस मिशन की प्रमुख बातें थीं-
1. ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के अन्तर्गत भारत को पूर्ण औपनिवेशिक स्वराज्य दिया जाए।
2. संविधान सभा और ब्रिटिश सरकार में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा हेतु एक संधि की जायेगी।
3. जब तक संविधान सभा का निर्माण न हो, अंग्रेज ही भारत की सुरक्षा के लिए उत्तरदायी होंगे।
4. भारतीय शासन के अन्य विभाग भारतीयों को सौंप दिए जायेंगे। इसमें सभी राजनीतिक दलों के सदस्य होंगे।
5. इन सभी सुधारों के बदले भारतीय जनता युद्ध में सरकार की मदद करेगी। कांग्रेस ने पंडित जवाहर लाल नेहरू व मौलाना आजाद को इस मिशन के साथ वार्ता हेतु अपना अधिकारिक वार्ताकार नियुक्त किया।

गाँधी इर्विन पैक्ट का उल्लंघन – लॉर्ड इर्विन के पश्चात् विलिंगटन वायसराय बना। उसने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि कांग्रेस ने उत्तरी प्रान्त के किसानों को कर न देने के लिए उकसाया है, परिणामस्वरूप जवाहरलाल नेहरू को बन्दी बना लिया गया। गाँधी जी ने वायसराय से मुलाकात के लिए समय माँगा जो नहीं दिया गया और गाँधी इर्विन पैक्ट समाप्त हो गया। कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों ने ही किप्स प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। गाँधी जी ने क्रिप्स प्रस्ताव को उत्तरतिथिय चेक’ कहा।

क्रिप्स मिशन के प्रमुख प्रावधानों में युद्ध के बाद एक ऐसे भारतीय संघ के निर्माण का प्रयत्न करना था, जिसका स्तर अधिराज्य (डोमोनियन) हो तथा युद्ध के तत्काल बाद एक संविधान निर्मात्री सभा का गठन करना, जिनमें ब्रिटेन भारत और देशी रजवाड़ों के प्रतिनिधि शामिल हों आदि शामिल थे।