इस पाठ में लेखक ने नगरीय सभ्यता पर क्या व्यंग्य किया है ?

नगरीय सभ्यता बाहरी चमक-दमक और टीम-टाम पर विश्वास रखती है, वह धूल से दूर रहना चाहती है ताकि उसका शरीर मैला न हो।

वह काँच के हीरों को प्यार करती है असली हीरों को नहीं।