jivtarachandrakant

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  • उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
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    (i) बड़े पैमाने पर विलोपन :

    (a) यह अपेक्षाकृत कम अवधि के भूवैज्ञानिक समय के भीतर बड़ी संख्या में प्रजातियों का विलोपन है।

    (b) यह पृथ्वी पर जीवन के पूरे अस्तित्व में समय-समय पर हुआ है।

    (ii) कारक जो बड़े पैमाने पर विलुप्त होने को ट्रिगर करते हैं कोई भी बड़े पैमाने पर विलुप्त होने का सही कारण नहीं जानता है, लेकिन कुछ कारक, जो प्रजातियों के बड़े पैमाने पर विलुप्त होने को ट्रिगर करते हैं, निम्नलिखित हैं

    (a) समुद्र के स्तर में गिरावट और तापमान में बदलाव (गरमानाऔर हिमीकरण)

    (b) क्षुद्रग्रह/उल्कापिंड ग्रह से टकराना

    (c) समुद्र से जहरीले हाइड्रोजन सल्फाइड उत्सर्जन

    (d) नोवा/सुपरनोवा/गामा किरणें विस्फोट और प्लेट टेक्टोनिक्स।

    उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
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    संयुक्त सूक्ष्मदर्शी द्वारा छोटी वस्तुओं के बड़े प्रतिबिम्ब देखे जा सकते हैं। इसकी आवर्धन क्षमता सरल सूक्ष्मदर्शी की तुलना में बहुत अधिक होती है।

    इसमें एक अभिदृश्यक लेन्स तथा दूसरा नेत्रिका लेन्स होता है।

    अभिदृश्यक लेन्स वस्तु ओर रखा जाता है जिससे इसका प्रतिबिम्ब A’B’ बनता है तथा A”B” का प्रतिबिम्ब नेत्रिका  लेन्स द्वारा बनता है जो बहुत बड़ा होता है।

    उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
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    कबीरदास के काव्य की विशेषता गुरु-भक्ति, ईश्वर के प्रति अथाह प्रेम, वैराग्य सत्संग, साधु महिमा, आत्म-बोध तथा जगत-बोध की अभिव्यक्ति है।

    उन्होंने समाज में फैले हुए सभी प्रकार के भेदभाव को दूर करने का प्रयास किया। कबीरदास ने अपनी कविताओं के माध्यम से हिंदू-मुस्लिम एकता तथा विभिन्न धर्मों, संप्रदायों के बीच समन्वय स्थापित किया।

    उन्होंने ऐसे धर्म की बात की जिस पर सभी धर्मों तथा सूफियों के प्रेम का प्रभाव दिखाई देता था। उन्होंने भगवान के निर्गुण स्वरूप की उपासना पर जोर दिया। उनका मानना था कि ईश्वर को मंदिर-मस्जिद में ढूँढना व्यर्थ है।

    उन्होंने मन की शुद्धि की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने अपनी कविताओं में धर्म के नाम पर किए जाने वाले आडंबरों का विरोध तथा राम-रहीम की एकता स्थापित करने का प्रयत्न किया है।

    धर्म और जाति के नाम पर होने वाले भेदभाव को उन्होंने समाज का सबसे बड़ा कलंक मानते हए इसके लिए उत्तरदायी पंडित और मौलवियों को ही ठहराया।

    उन्होंने हिंदू और मुसलमान दोनों का विरोध किया तथा दोनों को सच्चे मन से परमात्मा की भक्ति करने का उपदेश दिया।

    कबीरदास ने गुरु को भगवान के समकक्ष मानकर उसकी सच्ची वंदना करने पर जोर दिया और गुरु को सबसे पूज्य, अनुपम, ब्रह्म ज्ञान देने वाला और माया आदि विकारों को दूर करने वाला माना है।

    उनका विश्वास था कि सत्संगति में रहकर ही मनुष्य का सच्चा कल्याण हो सकता है। माया आत्मा और परमात्मा के मिलन में सबसे बड़ी बाधा है।

    उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
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    मानव भूगोल के कार्य-क्षेत्र या विषय-क्षेत्र के मुख्य रूप से तीन पहलू सम्मिलित होते हैं

    (i) प्राकृतिक वातावरण के तत्व, (ii) सांस्कृतिक वातावरण के तत्व, (iii) वातावरण समायोजन का अध्ययन।

    (i) प्राकृतिक वातावरण के तत्व – प्राकृतिक वातावरण के अन्तर्गत दो तत्वों का समावेश होता है

    (क) जड़ तत्व – जड़ तत्वों में स्थलाकृतियाँ, जलराशियाँ, जलवायु, मिट्टी तथा खनिज सम्पदा सम्मिलित हैं।

    (ख) चेतन तत्व – चेतन तत्वों में प्राकृतिक वातावरण की जैविक दशाएँ सम्मिलित हैं, जिनमें प्राकृतिक वनस्पति, जीव-जन्तु एवं पशु-पक्षी सम्मिलित हैं।

    उक्त जड़ व चेतन तत्वों के अध्ययन के बिना मानव के क्रियाकलापों को नहीं समझा जा सकता है।

    प्राकृतिक वातावरण के इन तत्वों का मानवीय क्रियाकलापों पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ता है, यह मानव भूगोल के अध्ययन क्षेत्र में सम्मिलित किया जाता है।

    (ii) सांस्कृतिक वातावरण के तत्व – सांस्कृतिक वातावरण का जन्म मानव तथा प्राकृतिक वातावरण की क्रियाओं- प्रतिक्रियाओं के फलस्वरूप होता है। इसके निर्माण में जहाँ एक ओर प्राकृतिक तत्वों का हाथ रहता है, वहीं दूसरी ओर मानव की सामूहिक शक्ति का भी योगदान है।

    प्रो. पी. डब्ल्यू. ब्रायन के अनुसार, “सांस्कृतिक वातावरण मानवीय क्रियाओं तथा भौतिक वातावरण के पारस्परिक सम्बन्धों की अभिव्यक्ति होता है।” सांस्कृतिक वातावरण के तत्वों को तीन पक्षों में विभक्त किया जाता है

    (क) विन्यास रूप – इसमें मानव द्वारा निर्मित खेत,खान, मकान तथा व्यावसायिक स्थल आदि सम्मिलित हैं।

    (ख) चल रूप – इसमें मानव द्वारा निर्मित यातायात के विभिन्न साधन सम्मिलित किये गये हैं।

    (ग) क्रिया रूप – इसमें विभिन्न मानवीय व्यवसाय यथा-कृषि, आखेट, पशुचारण, शिक्षा, सरकार, स्वास्थ्य, उद्योग, व्यापार, धर्म तथा विज्ञान आदि सांस्कृतिक तत्वों को सम्मिलित किया गया है।

    मानव द्वारा अपने प्राकृतिक वातावरण के सहयोग से जीविकोपार्जन करने के क्रिया-कलापों से लेकर उसकी उच्चतम आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किये गये प्रयत्नों तक का अध्ययन मानव भूगोल के विषय-क्षेत्र में आता है।

    (iii) वातावरण समायोजन का अध्ययन – मानव भूगोल के विषय क्षेत्र में यह देखना भी सम्मिलित है कि मानवीय क्रिया-कलापों में विभिन्नताएँ किस प्रकार संसार में वितरित हैं तथा प्राकृतिक वातावरण इन विभिन्नताओं के वितरण को कहाँ तक प्रभावित करता है? साथ ही मानव ने स्वयं को प्राकृतिक वातावरण की इन भिन्नताओं से किस प्रकार समायोजित किया है?

    उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
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    समाज सुधारक के रूप में राममोहन राय के विचार अपने युग के संदर्भ में प्रगतिशील ही नहीं क्रांतिकारी भी थे। उन्होंने सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा दुर्दशा, जाति प्रथा एवं अस्पृश्यता जैसे संक्रामक रोगों से भारत को मुक्त करने का प्रयास किया।

    वस्तुत: वे एक समाज सुधारक थे जिन्होंने सामाजिक पुनर्निर्माण एवं शिक्षा के क्षेत्र में उत्तम कार्य किया। उन्होंने यह विश्वास व्यक्त किया कि धर्म और समाज सुधार की अनुपस्थिति में केवल राजनीतिक विकास का कोई मूल्य नहीं रहेगा।

    उन्होंने राजनीतिक प्रगति और सामाजिक-धार्मिक सुधारों के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध सुनिश्चित करते हुए निम्नलिखित कार्य किये

    (1) मूर्ति पूजा का घोर विरोध-राममोहन राय मूर्ति पूजा के घोर विरोधी थे क्योंकि इससे कुछ भी हासिल नहीं होता था। मूर्ति पूजा के विरोध का खामियाजा उन्हें अपने माता-पिता से सम्बन्ध विच्छेद के रूप में चुकाना पड़ा था।

    उन्होंने इस अंध आस्था के विपक्ष में प्रमाणों सहित तर्क देते हुये कहा कि मूर्ति पूजा हिन्दू धर्म का कोई मौलिक अंग नहीं है, बल्कि इसका प्रचलन धीरे धीरे हुआ है। उन्होंने बताया कि “उपनिषद अद्वैतवाद की शिक्षा देते हैं जिसमें मूर्ति पूजा के लिये कोई स्थान नहीं है।”

    (2) सती प्रथा का उन्मूलन-राममोहन राय सती प्रथा का विरोध करने वाले प्रथम भारतीय थे। उनके इस कार्य के लिये ब्रिटिश भी उनकी प्रशंसा करते हैं। उनका मानना था कि सती प्रथा या ‘सहमरण’ शास्त्रसम्मत प्रथा नहीं है।

    इस कुसंस्कार को खत्म करने के लिये उन्होंने इसका उग्र विरोध किया जिसके फलस्वरूप लार्ड विलियम बैंटिक ने एक आज्ञा जारी कर 1829 में बंगाल में सती प्रथा को निषिद्ध घोषित कर दिया तथा 1830 में सती प्रथा निषिद्ध कानून को पूरे भारत में लागू किया गया।

    सोफिया फालेट के अनुसार “राममोहन राय ने हिन्दू धर्मग्रन्थों का प्रमाण देकर यह साबित किया कि सती प्रथा किसी तरह से धर्म संगत नहीं थी। उन्होंने यह भी दिखाया कि इस प्रथा की शुरुआत किसी धार्मिक प्रेरणा से नहीं हुई, स्वार्थी सम्बन्धियों द्वारा विधवा के भरण-पोषण के खर्च से बचने के लिये ऐसा किया गया।”

    (3) नारी की दशा सुधार के समर्थक-राममोहन राय आधुनिक भारत के नारी स्वातन्त्र्य के अग्रदूत माने जा सकते हैं। उनके समय में स्त्रियों की वैयक्तिक और सामाजिक दोनों ही स्थितियाँ दयनीय थीं।

    उन्होंने नारी स्वातन्त्र्य, नारी अधिकार और नारी शिक्षा पर बड़ा बल दिया तथा हिन्दू नारी के साथ किये जाने वाले अन्याय और अत्याचार का जमकार विरोध किया। वे चाहते थे कि सरकार ऐसा कानून बनाए जिससे कोई भी पुरुष एक पत्नी के रहते हुए दूसरा विवाह न कर सके।

    राममोहन राय का स्वण था कि बाल विधवाएँ पुनर्विवाह करें और प्रौढ़ विधवाएँ समाज में सिर उठाकर जी सकें इसलिए उनको शिक्षित किया जाए। उन्होंने महिला पुरुष के अधिकारों में समानता पर बल दिया और यह मानने से इन्कार किया कि स्त्रियाँ पुरुषों की अपेक्षा कम दिमाग की होती हैं।

    (4) जाति प्रथा का घोर विरोध-रामा राममोहन राय का मानना था कि जाति प्रथा मनुष्य को संकीर्ण ही नहीं बनाती है बल्कि सामाजिक असमानता को जन्म भी देती है। यही कारण था कि उन्होंने जाति व्यवस्था का भी घोर विरोध किया और इसे हिन्दू जाति के लिए कलंक बताया।

    शास्त्र का आधार प्रस्तुत करते हुए उन्होंने शैव विवाह पद्धति का समर्थन किया जिसमें, उम्र, वंश एवं जाति का कोई बन्धन नहीं होता। उन्होंने कहा भी- मुझे यह कहते हुए दुख होता है कि हिंदुओं में वर्तमान धर्म एवं जाति व्यवस्था ऐसी है कि जिसमें उसके राजनीतिक हितों की पूर्ति में सहायता नहीं मिल सकती।

    इस आधार पर देखें तो राममोहन राय ने सामजिक सुधार के लिये अनेक उल्लेखनीय कार्य किये। सामाजिक कुरीतियों और परम्परावाद का उन्होंने जहाँ खुलकर विरोध किया, वहीं सामाजिकता के नये नियम बनाने के लिये भी वह सदैव प्रयत्नशील रहे।

    सामाजिक बुराइयों का अन्त करने के लिये उन्होंने बुद्धिवाद के प्रचार का तरीका अपनाया। उनकी तुलना फ्रेंच ज्ञान कोष के सह-रचयिता दिदरो से की जा सकती है।

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    महात्मा गाँधी ने अपनी सत्याग्रह की तकनीकि का प्रथम प्रयोग चम्पारण पर किया था 

    गांधी जी ने सत्याग्रह तकनीकि का पहला बड़ा प्रयोग 1917 ई. में बिहार के चम्पारण जिले में किया।

    चम्पारण की घटना 20वीं सदी के प्रारम्भ में शुरू हुई थी। यहाँ नील के खेतों में काम करने वाले किसानों पर यूरोपीय मालिक बहुत अत्याचार करते थे।

    किसानों को अपनी जमीन के 3/20 भाग पर नील की खेती करना तथा उन मालिकों द्वारा तय दामों पर उन्हें बेचना पड़ता था।

    इसे “तिनकठिया पद्धति‘ भी कहा जाता है।

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    भारतीय क्रांति की जननी मैडम भीका जी कामा को कहा गया है|

    मैडम भीका जी कामा का जन्म 1861 में मुम्बई के पारसी परिवार में हुआ था।

    परिजनों ने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए उन्हें इंग्लैण्ड भेजा, किन्तु वहाँ पढ़ाई में मन नहीं लगा और भारत की स्वतंत्रता के लिए श्याम जी कृष्ण वर्मा के संगठन से जुड़ गई।

    18 अगस्त 1907 को जर्मनी के स्टुटगार्ड में आयोजित विश्व समाजवादी देशों के सम्मेलन में भारत का सर्वप्रथम झण्डा फहराया।

    1934 ई. में भारत लौटी और आजादी के लिए काम करती रही। उनकी इस क्रांतिदर्शिता के कारण उन्हें “भारतीय क्रांतिकारियों की जननी‘ कहा जाता है।

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    अलबरूनी ने अपनी रचना ‘किताब उल हिन्द‘ अथवा ‘तहकीक-ए-हिन्द‘ की रचना गजनी में की थी। यह रचना भारतीय संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान के सम्बन्ध में जानकारी का अत्यन्त मूल्यवान स्रोत है।

    अलबरूनी ने भारतीय विज्ञान के सम्बन्ध में विस्तृत चर्चा की है। उसकी चर्चा खगोल विद्या, रसायन, भूगोल, भूगर्भ शास्त्र और ज्योतिष शास्त्र एवं चिकित्सा जैसे विषयों से  सम्बन्धित है।

    अलबरूनी की शिक्षा खगोलशास्त्री के रूप में हुई थी और जीवन के आरंभिक चरण में उसने ख्वारिज्म के दरबार में और  संभवतः गजनी के दरबार में भी ज्योतिषी के रूप में कार्य किया वह विभिन्न ग्रहों की चर्चा करता है।

    चांद की गति और उसके प्रमुख कारणों की व्याख्या करता है। उसने वराहमिहिर की रचना लघुजातक का अरबी में अनुवाद किया।

    इसके अतिरिक्त उसने वृहत् संहिता, मत्स्य पुराण और वायुपुराण जैसी रचनाओं का भी गहन अध्ययन किया था और इसके अनेक उद्धरण इसने प्रस्तुत किए हैं।

    अलबरूनी ने रसायन के बारे में भी चर्चा की है, जिसमें प्रधान  अभिरुचि सोना बनाने के काम में रहती थी। अलबरूनी ने इसका खण्डन किया है और इसे तर्क संगत नहीं माना है।

    किन्तु रसायनों का प्रयोग औषधि के रूप में वह मानता है। उसने आयुर्वेद सम्बन्धी  अरबी रचना ‘फिरदौस अलहिकमा’ का संभवतः स्रोत के रूप में उपयोग किया और इसी के माध्यम से उसने चरक संहिता के सम्बन्ध में जानकारियाँ प्रस्तुत की सुश्रुत संहिता से वह परिचित नहीं था और  उसके विवरण में शल्य चिकित्सा की कोई चर्चा नहीं हैं।

    भारतीय संस्कृति और विज्ञान के सम्बन्ध में अलबरूनी की  टिप्पणी इसलिए मूल्यावान है कि इसके माध्यम से इस्लामी जगत में  हिन्दुओं के ज्ञान-विज्ञान का परिचय प्रस्तुत हुआ और जो बौद्धिक सम्पर्क अरब शासनकाल में स्थापित हुआ था और तत्पश्चात् शिथिल  पड़ गया था इसकी पुनरावृत्ति संभव हो सकी।

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    बेसन की संधि पर 1802 ई वर्ष में हस्ताक्षर किये गये थे

    बेसीन की संधि पेशवा बाजीराव- || एवं अंग्रेजों के मध्य 31 दिसंबर, 1802 ई0 में हुई थी।

    इस संधि के तहत पेशवा ने  6000 अंग्रेजी सैनिकों की एक टुकडी पुना में रखना स्वीकार किया।

    गुजरात, ताप्ती तथा नर्मदा के आस-पास के क्षेत्र तथा तुगभद्रा नदी के सभी समीपवर्ती क्षेत्र का राजस्व (26 लाख) कम्पनी को दे दिए।

    इसके साथ ही सभी यूरोपीय लोगों को सेवा से हटाने, सूरत व बड़ौदा पर दावा खत्म करने और अंग्रेजों की सलाह से ही अन्य देशों के साथ संबंध रखने की शर्त पेशवा द्वारा मान ली गई।

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    भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में सातों राज्यों-अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा व मेघालय, असम  है।

    इसे सेवन सिस्टर  स्टेट के नाम से भी जाना जाता है

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