Bring out the stages in the evolution of money. मुद्रा के विकास की अवस्थाओं को स्पष्ट कीजिए।

    प्रश्नकर्ता Current Affrays
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    उत्तरकर्ता maharshi
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    मुद्रा का आरम्भ कब और कहाँ हुआ, यह कहना कठिन है। सामाजिक संस्थाओं की भांति मुद्रा का विकास भी दीर्घकालीन प्रयोगों के द्वारा हुआ है ।। वस्तुतः मुद्रा का विकास मानव सभ्यता के विकास का एक अंग है क्योंकि इसका स्वरूप मानव सभ्यता की विविधताओं और इसकी विभिन्न अवस्थाओं में भिन्न-भिन्न रहा है। वस्तु मुद्रा से आज हम साख मुद्रा तक पहुंच गए हैं। इस विकास को कुछ लोग स्वाभाविक विकास और कुछ लोग नियमित विकास कहते हैं ।
    इतिहासकार बतलाते हैं कि दक्षिणी महासागर के द्वीपों के निवासी पत्थर की मुद्रा (stone money) का प्रयोग करते थे। आर्य जाति की सर्वाधिक प्राचीन पुस्तक, ऋग्वेद में मुद्रा के रूप में गाय के प्रयोग का उल्लेख है। कालान्तर में चमड़े, हड्डियों, गेहूँ, तांबा, सोना-चाँदी का प्रयोग मुद्रा के रूप में होने लगा। विख्यात इतिहासकार हेरोडोटस (Herodotus) के अनुसार सिक्कों का प्रयोग सर्वप्रथम ईसा से ६०० सौ वर्ष पर्व लीडिया (Lydia; में हआ था। सिक्कों की ढलाई की कला के विकास के साथ मुद्रा की राजकीय धारणा का भी प्रारम्भ हुआ। इससे व्यवस्थित मुद्रा (managed money) के विकास का मार्ग सरल हो गया। आजकल तो लगभग सभी देशों में पत्र-मुद्रा का प्रयोग हो रहा है। इस प्रकार मानव-सभ्यता के विकास के साथ और मानवीय आवश्यकताओं की मांग के अनुसार मुद्रा का रूप भी बदलता रहा है। विभिन्न समय में मानव समाज ने विभिन्न वस्तुओं को मुद्रा के रूप में स्वीकार एवं प्रचलन किया है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से हम मुद्रा के विकास को अग्रणित पांच अवस्थाओं में वर्णित कर सकते हैं :-
    1. प्रथम अवस्था : वस्तु मुद्रा (Commodity Money)- प्रारम्भ काल में वस्तु मुद्रा का प्रचलन था। किन्तु किसी स्थान में कौन-सी वस्तु को मुद्रा का रूप दिया गया, यह आर्थिक विकास की अवस्था, सांस्कृतिक अवस्था, जलवायु, स्थान आदि पर निर्भर था। फलतः जबकि पाषाण-युग (stone age) में पत्थर की मुद्रा का प्रचलन था तो आखेट-युग (hunting age) में खाल अथवा चमड़ा, हड्डियों आदि को मुद्रा माना गया, खानाबदोश (nomadic) युग और पशुपालन युग (pastoral age) में गाय, बकरी, भेंड़, घोड़े आदि को और कृषि युग (agricultural age) में मक्का, कोदो, चावल, गेहूँ आदि अनाज एवं दासों ( salves ) को भी मुद्रा के रूप में प्रचलित किया गया था। ठंढे स्थानों में जानवरों की ग्वाल एव फर को, गर्म देशों में चिड़ियों, बा के पंजों एवं जबड़ों को हाथी के दांतों को एवं अन्य ऐमी ही वस्तुओं को मुद्रा का रूप दिया गया। उसी प्रकार समुद्रों के निकट के निवासियों ने मछलियों, घोंघों, सीपियों, शंखों, कौड़ियों आदि को भी मुद्रा के रूप में स्वीकार किया है। आज भी संसार में बहुत से स्थान है जहां पर वस्तु मुद्रा का प्रचलन है। प्रो० एफ० डब्लू. म्यूलर (F. W. Muller) का कहना है कि कुछ वर्षों पूर्व तक “कनाडा के हडसन की खाड़ी के क्षेत्र में मूल्य‘निर्धारण के लिए खालों का प्रयोग किया जाता था। यूनानी सभ्यता के प्रारम्भ में विनिमय के माध्यम के रूप में बैलों का प्रयोग किया जाता था। आज भी दक्षिणी सूडान में दिनका चरवाहा जाति के लोग अपनी सम्पत्ति को गाय, बैल तथा बकरियों के रूप में आँकते हैं। इसी प्रकार अमेरिका के मेरीलैंड प्रदेश में १७३२ ई० में मकई को विधि-ग्राह्य मुद्रा घोषित किया गया था।”
    किन्तु सभ्यता के विकास के साथ-साथ वस्तु मुद्रा के दोष एवं कठिनाइयाँ स्पष्टतः अधिक होती गई।
    वस्तु-मुद्रा के प्रमुख दोष अग्रलिखित थे-
    (१) इसमें प्रमाणीकरण (standardization) और एकरूपता का अभाव था।
    (२) इसमें वहनीयता का अभाव था।
    (३) इन्हें भविष्य के लिए संचित रखना कठिन था क्योंकि बकरियाँ मर सकती थीं, अनाज सड़ सकता था आदि ।
    (४) इनमें सुरक्षा का भी अभाव था क्योंकि इन्हें गुप्त रूप से नहीं रखा जा सकता था। सबके सामने प्रत्यक्ष होने के कारण इनकी चोरी आदि हो सकती थी।
    (५) इनके संचय में व्यवस्था व्यय अधिक पड़ जाता था—उनकी सुरक्षा आदि के लिए।
    (६) इनके मूल्यों में अस्थिरता थी।
    (७) उनमें उपयुक्त अंश तक विभाजकता का भी अभाव था।

    2. द्वितीय अवस्था : धातु मुद्रा (Metallic Money)- वस्तु मुद्रा की कठिनाइयों के कारण धीरे-धीरे मुद्रा के लिए धातुओं का प्रयोग किया जाने लगा। इन धातुओं में लोहा, लांबा, चांदी, सोना उल्लेखनीय हैं। धात मुद्रा की यह विशेषता थी कि इन्हें सरलतापूर्वक हस्तान्तरित और स्थानान्तरित किया जा सकता था, इनका संचय सरल था, इनमें विभाजकता थी, इनमें एकरूपता अधिक थी, उनका विनाश बहुत शीघ्र नहीं हो सकता था। प्रारम्भ में लोहा और तांबा का प्रयोग मुद्रा के रूप में अवश्य किया गया किन्तु कालान्तर में अनुभव किया गया कि लोहे और ताँबे में दुर्लभता की मात्रा अधिक नहीं है जिससे कि सस्ती वस्तुओं के क्रय-विक्रय के लिए तो ये उपयुक्त थे किन्तु महँगी और बड़ी वस्तुओं के लिए इन्हें बहुत अधिक मात्रा में ढोना पड़ता था। फलतः मनुष्य ने सोना-चांदी जैसी बहुमूल्य धातुओं का मुद्रा के लिए प्रयोग करना प्रारम्भ किया। किन्तु इनके साथ भी एक दूसरे प्रकार की समस्या उत्पन्न हुई-इनमें दुर्लभता (scarcity) की मात्रा अधिक थी। इससे अति मूल्यवान वस्तुओं के क्रय-विक्रय के लिए तो बहुमूल्य धातुएं उपयुक्त थीं किन्तु छोटी-छोटी सस्ती वस्तुओं के विनिमय के सम्बन्ध में कठिनाइयाँ उपस्थित हुई। फलतः मूल्यवान वस्तुओं के लिए सोना-चाँदी जैसी बहुमूल्य धातुओं का एवं सस्ती वस्तुओं के लिए तांबे आदि का प्रयोग किया जाने लगा। इस प्रकार मुद्रा के रूप में तांबा, लोहा, कांसा, सोना, चांदी आदि सभी धातुओं का बारी-बारी से प्रयोग हुआ है। किन्तु अन्य धातुओं की अपेक्षा सोना एवं चांदी का मुद्रा के रूप में अपेक्षाकृत अधिक समय तक प्रयोग हुआ है।

    3. तृतीय अवस्था : सिक्के (Coins)- आरम्भ में धातुओं के टुकड़ों को ही मुद्रा के रूप में प्रयोग किया जाता था। किन्तु धातुओं के सभी टुकड़ों का वजन एक समान नहीं हो सकता था। इससे इनमें एकरूपता का अभाव था जिसके फलस्वरूप विनिमय के समय सर्वदा इनका वजन करना पड़ता था। इनके अतिरिक्त इनकी शुद्धता की जांच में भी कठिनाइयाँ होती थीं। फलतः इन धातुओं के सिक्कों की ढलाई होने लगी और सरकार ने धातु के इन सिक्कों पर अपनी मोहर लगा दी। इस प्रकार धातुओं के सिक्कों का प्रारम्भ हुआ। प्रख्यात इतिहासकार हेरोडोटस (Herodotus) के अनुसार सिक्कों का प्रयोग सर्वप्रथम लीडिया (Lydia) में ईसा के ६-७ सौ वर्ष पूर्व हुआ था। सिक्कों की ढलाई के साथ राजकीय मुद्रा (state money) की धारणा का आविर्भाव हुआ। व्यवस्थित मुद्रा (managed money) का विकास सिक्कों की ढलाई से ही सम्भव हो सका।

    4. चतुर्थ अवस्था : पत्र-मुद्रा (Paper Money)- धातु-मुद्रा और सिक्कों की ढताई के बाद मुद्रा के विकास की अन्य महत्वपूर्ण घटना पत्र-मुद्रा का विकास है जिसे स्वयं मुद्रा के आविष्कार के बाद सबसे बड़ा आविष्कार कहा जा सकता है। बात-मदा में सविधाएं अधिक थीं और उनमें जनता का विश्वास भी था। किन्तु धातु-मुद्रा के साथ दो सबसे बड़ी कठिनाई थी-अधिक मात्रा में उन्हें सरलतापूर्वक हस्तान्तरित और स्थानान्तरित करना सम्भव नहीं था और उनके चोरी चले जाने की विशेष संभावना थी। व्यापारियों एवं अन्य ऐसे ही व्यक्तियों ने अनुभव किया कि उन्हें अपने साथ बहुत दूर तक ले जाना खतरे से खाली नहीं है। अतएव उन्होंने धातु-मुद्रा को अपने पास लेकर चलने के बदले उन्हें सोनार अथवा अन्य किन्हीं व्यापारियों के पास रखकर उनका प्रमाण-पत्र लेकर अन्य स्थानों में -व्यापारमादि कार्यो के लिए आना-जाना प्रारम्भ किया। इस प्रकार पत्र-मुद्रा का प्रारम्भ हुआ ।
    किन्तु पन-मुद्रा का विकास भी एकाएक नहीं हो गया। इसका विकास क्रमिक रूप में हुआ है। पत्र-मुद्रा के विकास के इतिहास में चार स्पष्ट अवस्थाएँ आती हैं। प्रारम्भ में व्यापारियों ने धातु-मुद्रा को वास्तव में अपने साथ न ले जाकर उनका प्रमाण-पत्र अपने पास रखकर व्यापार करने का अभ्यास डाला। अपनी मुद्रा को व्यापारी सोनार के यहाँ जमा कर देते थे और उससे अपनी मुद्रा का लिखित प्रमाण-पत्र (written evidences of command over money) ले लेते थे। उसी प्रमाण पत्र के आधार पर वे अपना व्यापार-व्यवसाय करते थे। ये लिखित प्रमाण-पत्र स्वयं मुद्रा नहीं थे वरन् मुद्रा के केवल अस्थायी स्थानापन्न (temporary substitutes) ही थे। इन प्रमाण-पत्रों को व्यवसायी स्वीकार कर लेते थे क्योंकि उन्हें विश्वास रहता था कि जब कभी आवश्यकता होगी, इन प्रमाण-पत्रों के आधार पर वास्तव में मुद्रा प्राप्त कर ली जायगी। यदि ये खो जाते तो उससे कोई हानि नहीं हो सकती थी क्योंकि स्वयं उन्हीं प्रमाण-पत्रों को क्रय के लिए प्रयुक्त नहीं किया जा सकता था। पत्र मुद्रा के विकास की यह प्रथम अवस्था थी।

    कालान्तर में स्वयं इन लिखित प्रमाण-पत्रो का ही मुद्रा के रूप में प्रयोग किया जाने लगा। जनता स्वभावतः इन प्रमाण-पत्नों पर विनिमय के माध्यम के रूप में विश्वास करने लगी और इन्हीं प्रमाण-पत्रों का विनिमय के लिए लेन-देन करने लगी। ये लिखित प्रमाण-पत्र धात्विक मुद्रा का प्रतिनिधित्व करने लगे और चूँकि उन्हें आवश्यकतानुसार धातु-मुद्रा में बदला जा सकता था इसलिए जनता ने उन्हीं को स्वयं मुद्रा के रूप में स्वीकार करना प्रारम्भ किया। इन लिखित प्रमाण-पत्रों के साथ चोरी आदि का भय बहुत कम था और उनके हस्तान्तरण एवं स्थानान्तरण में भी अधिक सुविधा-सरलता थीं। इस अवस्था में लिखित प्रमाण-पत्रों को मुद्रा के रूप में तो स्वीकार किया जाने लगा फिर भी अब तक ये प्रमाण-पत्र स्वयं मुद्रा नहीं बन पाए थे। इन्हें प्राप्त करने पर बैंक के पास जाकर इनके बदले नकद मुद्रा ले जाती थी। पत्र-मुद्रा के विकास की यह द्वितीय अवस्था थी।

    जैसे-जैसे समय बीतता गया, आर्थिक क्रियाएँ, विनिमय कार्य बढ़ते गए और उनके साथ ही इन लिखित प्रमाण-पत्रों में, जो कालान्तर में बैंक नोट बन गए, जनता का विश्वास बढ़ता गया। अब उन्हें सामान्य रूप से स्वतंत्रता-पूर्वक विनिमय के माध्यम के रूप में स्वीकार किया जाने लगा। लिखित प्रमाण-पत्र अब केवल लिखित प्रमाण-पत्र ही नहीं रह सके, स्वयं मुद्रा बन गए। पहले उन्हें यथाशीघ्र नकद मुद्रा में बदलना पड़ता था। अब उन्हें मुद्रा में बदलने की आवश्यकता नहीं रही। विनिमय के माध्यम के रूप में जनता निःसंकोच उनका आदान-प्रदान करने लगी और जनता में उनका स्वतत्र एवं व्यापक रूप में प्रचलन (circulation) होने लगा। किन्तु अभी भी उन पर बैंक की प्रत्याभूति रहती थी कि जब कभी मांग की जायेगी तो बैंक-नोट के बदले में उतने मूल्य के सिक्के दे दिये जाएंगे। इस प्रकार परिवर्तनीय पत्र मुद्रा का प्रारम्भ हुआ। पन-मुद्रा विकास की यह तृतीय अवस्था थी। यह तृतीय अवस्था प्रथम एवं द्वितीय अवस्थाओं से बहुत ही आगे थी। प्रथम अवस्था में बैंक नोट मुद्रा के केवल लिखित प्रमाण-पत्र ही थे, उन्हें मुद्रा के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता था। द्वितीय अवस्था में ये बैंक नोट मुद्रा के रूप में स्वीकार किये जाने लगे थे। किन्तु तब भी ये मुद्रा नहीं थे क्योंकि उन्हें प्राप्त करने के बाद यथाशीघ्र उन्हें नकद मुद्रा में बदल देने की कोशिश की जाती थी। तृतीय अवस्था में बैंक नोट स्वयं मुद्रा ही हो गए और उन्हें अब मुद्रा का केवल प्रतिनिधि ही नहीं माना जाने लगा और न उन्हें तुरन्त नकद मुद्रा में बदलने की ही आवश्यकता रही यद्यपि उन बैंक नोटों पर जनता के विश्वास के लिए यह गारंटी रहती थी कि आवश्यकतानुसार उनके बदले में सोना-चांदी अथवा धातमुद्रा प्राप्त हो सकेगी। किन्तु जनता बहुधा इन्हें नकद कोष में बदलने की आवश्यकता नहीं समझती थी। इसके अतिरिक्त प्रथम और द्वितीय अवस्थाओं में वस्तुतः जितनी मुद्रा रहती थी उतने का ही प्रमाण-पत्र दिया जाता था। दूसरे शब्दों में, जितनी नकद मुद्रा का प्रमाण-पत्र अर्थात बैंक नोट रहता था उतनी धातु मुद्रा वास्तव में बैंक के कोष में रहती थी। किन्तु तृतीय अवस्था में बैंक अपने पास जमा की गई नकद धातु मुद्रा की अपेक्षा अधिक मुद्रा के लिए बैंक नोट जारी करने लगे क्योंकि उन्होने अनुभव किया कि जितने बैंक नोट जारी किए जाते हैं वे सभी तुरन्त ही नकद कोष में बदलने के लिए नहीं आते हैं।
    आगे चलकर जब बैंक नोट जारी करने के अधिकार विभिन्न वाणिज्य एवं अन्य बैंकों से लेकर एकमात्र केन्द्रीय बैंक को ही दे दिए गए तो पत्र-मुद्रा के विकास के इतिहास की चतुर्थ अवस्था चिह्नित हुई। आज पत्र-मुद्रा परिवर्तनीय भी नहीं रह गई है। बैंक नोटों को नकद में बदलने की अब कोई आवश्यकता नहीं रह गई है। इस प्रकार आज के बैंक नोट वस्तुतः अपरिवर्तनीय पत्र-मुद्रा (inconvertible paper money) हो गए हैं।

    5. पंचम अवस्था : साख मुद्रा (Credit Money)- आधुनिक विश्व में मुद्रा के विकास की एक और भी अवस्था हो गई है जिसे साख-मुद्रा अथवा चेकों के प्रचलन का युग कहा जा सकता है। आर्थिक विकास के साथ आर्थिक क्रिया भी बढ़ती गई और अपनी सुविधा के लिए मनुष्य ने परिवद्वित रूप में चेक, हुण्डी, विनिमय प्रपत्र आदि का व्यवहार करना प्रारम्भ किया। आजकल साख-मुद्रा का प्रयोग विकसित देशों में अधिकधिक मात्रा में होने लगा है। ऐसे देखने में तो साखमुद्रा अन्य प्रकार की मुद्रा से बहुत भिन्न ज्ञात होगी किन्तु मूलतः यह बैंक नोट का केवल एक दूसरा रूप ही है। पत्र-मुद्रा की प्रथम अवस्था में यह सुविधा थी कि लिखित प्रमाण-पत्र स्वयं मुद्रा नहीं थे बल्कि मुद्रा के अधिकार मात्र (command over money) थे, मुद्रा के दावे थे जिससे कि उनके खो जाने अथवा चोरी चले जाने से विशेष हानि नहीं होती थी। किन्तु जब कालान्तर में बैंक नोट
    स्वयं ही मुद्रा बन गए तो लिखित प्रमाण-पत्र की यह सुविधा जाती रही। अब इन बैंक नोटों के साथ भी चोरी, डकती और खो जाने आदि के भय बढ़ गए। इस कठिनाई और खतरे को दूर करने के लिए चेक आदि का प्रयोग किया जाने लगा। चेक का प्रयोग इस कठिनाई को दूर कर देता है। फलतः चेक आदि का प्रयोग विनिमय की सुविधा और सुरक्षा के लिए हुआ। किन्तु इंगलैंड में इनका प्रयोग इस कारण से भी हुआ कि वहाँ १४८४ के बैंक अधिनियम द्वारा बैंक नोटों को जारी करने की कठिन सीमा निर्धारित की गई थी। किन्तु जनसंख्या एवं धन और आर्थिक क्रियाओं में वृद्धि के कारण मुद्रा की. बढ़ती हुई पूर्ति की आवश्यकता थी। इसके अतिरिक्त चेक आदि का प्रयोग बैंक के लिए भी अधिक लाभकर होता है। इन सभी कारणों से चेक आदि जैसी साख मुद्रा का प्रयोग बढ़ने लगा और आज विकसित देशों में इसी प्रकार की मुद्रा का अधिक प्रयोग होने लगा है। चेक बैंक में जमा एक निश्चित रकम के आधार पर, जिसे बैंक निक्षेप या बैंक जमा (bank deposit) कहा जाता है, जारी किये जाते हैं। चेक के आविष्कार ने ऋण के लेन-देन के कार्य को बहुत ही सुविधाजनक बना दिया है। किन्तु चेक का विकास अभी पूर्ण नहीं हुआ है । यह अभी अपने विकास के तृतीय चरण में ही है। अभी चेक को कानूनी ग्राह्य-मुद्रा (legal tender) का पद नहीं प्राप्त हुआ है। वास्तव में, चेक कोई मुद्रा नहीं है। यह केवल वास्तविक मुद्रा को हस्तान्तरित करने का एक साधन-मात्र है। वास्तविक मुद्रा बैंक में जमा के रूप में रहती है। यदि चेक के पीछे बैंक-जमा न हो तो इसे कोई स्वीकार नहीं करेगा। अतएव बैंक-जमा को ही मुद्रा या नाम देना अधिक उपयुक्त होगा।

    इस प्रकार मुद्रा का विकास विभिन्न अवस्थाओं में क्रमिक रूप से हमा है। सभ्यता के आदि काल में मुद्रा का अस्तित्व नहीं था। किन्तु कालान्तर में वस्तु-विनिमय की आवश्यकताएं पड़ी जिससे मनुष्य ने कठिनाइयों का अनुभव किया और विभिन्न समय में आर्थिक विकास की अवस्था, जलवायु, स्थान आदि के अनुसार मनुष्य ने विभिन्न वस्तुओं को मुद्रा का रूप दिया। प्रारम्भ में वस्तु मुद्रा का प्रचलन हुआ और फिर क्रमशः धातु-मुद्रा, कागजी मुद्रा का प्रचलन हुआ और आज हम साख मुद्रा की ओर अधिकाधिक रूप में झुक रहे हैं। इस प्रकार विभिन्न चरणों में मुद्रा का विकास हुआ है । वस्तुतः मुद्रा को ढूंढा गया है न कि इसका आविष्कार किया गया है।” (“Money was discovered and not invented.”)

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