BA Hindi Shukla ji ki Rachna Chintamani ki Bhav Sagar Shilp ka vishleshan Hue Sahitya ko Aur Kala ki Gochar ta ka Siddhant per shukr ji ke vichar prakat kijiye

    प्रश्नकर्ता Jatin Gahlot
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    उत्तरकर्ता Manish kumar yadav BPNPSS S000206 supaul
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    शुक्लजी की रचना चिन्तामणि :-

    (क) चिन्तामणि, भाग-1  (1939 ई., 17 निबन्ध)चिंतामणि सन् १९३९ में प्रकाशित आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा रचित हिन्दी का निबंधात्मक (समालोचना)ग्रंथ है। इस पुस्तक के चार भाग हैं। चिन्तामणि के प्रमुख निबन्ध हैं- भाव या मनोविकार, उत्साह, श्रद्धा और भक्ति, करुणा, लज्जा और ग्लानि, घृणा, ईर्ष्या, भय, क्रोध, कविता क्या है, काव्य में लोक [1] मंगल की साधनावस्था। पुस्तक का दूसरा भाग सन् १९४५ ई. में विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के संपादन में प्रकाशित हुआ था। चिंतामणि का तीसरा भाग नामवर सिंह के संपादन में सन् १९८३ में प्रकाशित हुआ था। चौथा भाग सन् 2002 में कुसुम चतुर्वेदी एवं ओमप्रकाश सिंह के संपादन में प्रकाशित हुआ जिसमें 47 निबंध हैं।

    (ख) चिन्तामणि, भाग-2  (1945 ई.) :  प्राकृतिक दृश्य, काव्य में रहस्यवाद, काव्य में अभिव्यंजनावाद।

    (ग)  चिन्तामणि, भाग-3  (1983 ई., सं. डॉ. नामवर सिंह)

    (घ)  चिन्तामणि, भाग-4  (2004 ई., सं. डॉ. कुसुम चतुर्वेदी और डॉ. ओमप्रकाश सिंह)

    भाषागत:

    शुक्ल जी के गद्य-साहित्य की भाषा खड़ी बोली है और उसके प्रायः दो रूप मिलते हैं –

    क्लिष्ट और जटिल

    गंभीर विषयों के वर्णन तथा आलोचनात्मक निबंधों के भाषा का क्लिष्ट रूप मिलता है। विषय की गंभीरता के कारण ऐसा होना स्वाभाविक भी है। गंभीर विषयों को व्यक्त करने के लिए जिस संयम और शक्ति की आवश्यकता होती है, वह पूर्णतः विद्यमान है। अतः इस प्रकार को भाषा क्लिष्ट और जटिल होते हुए भी स्पष्ट है। उसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है।

    सरल और व्यवहारिक

    भाषा का सरल और व्यवहारिक रूप शुक्ल जी के मनोवैज्ञानिक निबंधों में मिलता है। इसमें हिंदी के प्रचलित शब्दों को ही अधिक ग्रहण किया गया है यथा स्थान उर्दू और अंग्रेज़ी के अतिप्रचलित शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। भाषा को अधिक सरल और व्यवहारिक बनाने के लिए शुक्ल जी ने तड़क-भड़क अटकल-पच्चू आदि ग्रामीण बोलचाल के शब्दों को भी अपनाया है। तथा नौ दिन चले अढ़ाई कोस, जिसकी लाठी उसकी भैंस, पेट फूलना, काटों पर चलना आदि कहावतों व मुहावरों का भी प्रयोग निस्संकोच होकर किया है।

    शुक्ल जी का दोनों प्रकार की भाषा पर पूर्ण अधिकार था। वह अत्यंत संभत, परिमार्जित, प्रौढ़ और व्याकरण की दृष्टि से पूर्ण निर्दोष है। उसमें रंचमात्र भी शिथिलता नहीं। शब्द मोतियों की भांति वाक्यों के सूत्र में गुंथे हुए हैं। एक भी शब्द निरर्थक नहीं, प्रत्येक शब्द का अपना पूर्ण महत्व है।

    साहित्य और कला की गोचरता का सिद्धान्त

    साहित्य: शुक्ल जी शायद हिन्दी के पहले समीक्षक हैं जिन्होंने वैविध्यपूर्ण जीवन के ताने बाने में गुंफित काव्य के गहरे और व्यापक लक्ष्यों का साक्षात्कार करने का वास्तविक प्रयत्न किया। उन्होंने ‘भाव या रस’ को काव्य की आत्मा माना है। पर उनके विचार से काव्य का अंतिम लक्ष्य आनन्द नहीं बल्कि विभिन्न भावों के परिष्कार, प्रसार और सामंजस्य द्वारा लोकमंगल की प्रतिष्ठा है।  ‘हमारे हृदय का सीधा लगाव प्रकृति के गोचर रूपों से है’ इसलिए कवि का सबसे पहला और आवश्यक काम ‘बिंबग्रहण’ या ‘चित्रानुभव’ कराना है।  इस प्रकार शुक्ल जी काव्य द्वारा जीवन के समग्र बोध पर बल देते हैं। जीवन में और काव्य में किसी तरह की एकांगिता उन्हें अभीष्ट नहीं।

    इनमें शुक्ल जी की काव्यमर्मज्ञता, जीवनविवेक, विद्वत्ता और विश्लेषणक्षमता का असाधारण प्रमाण मिलता है। काव्यगत संवेदनाओं की पहचान, उनके पारदर्शी विश्लेषण और यथातथ्य भाषा के द्वारा उन्हें पाठक तक संप्रेषित कर देने की उनमें अपूर्व सामर्थ्य है। इनके हिंदी साहित्य के इतिहास की समीक्षाओं में भी ये विशेषताएँ स्पष्ट हैं।

    कला की गोचरता: शुक्ल जी की स्थापनाएँ शास्त्रबद्ध उतनी नहीं हैं जितनी मौलिक। उन्होंने अपनी लोकभावना और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से काव्यशास्त्र का संस्कार किया। इस दृष्टि से वे आचार्य कोटि में आते हैं। काव्य में लोकमंगल की भावना शुक्ल जी की समीक्षा की शक्ति भी है और सीमा भी। उसकी शक्ति काव्यनिबद्ध जीवन के व्यावहारिक और व्यापक अर्थों के मार्मिक अनुसंधान में निहित है। पर उनकी आलोचना का पूर्वनिश्चित नैतिक केंद्र उनकी साहित्यिक मूल्यचेतना को कई अवसरों पर सीमित भी कर देता है उनकी मनोवैज्ञानिक दृष्टि आलोच्य कवि की मनोगति की पहचान में अद्वितीय है।

    विचारणीय यह है कि ‘रस’ पर विचार करने को यह दिशा भेद कैसे हुआ इस पर डॉ. रामविलास शर्मा ओर आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने जम कर विचार किया है डॉ. शर्मा कहना है- ‘साहित्य या कला की गोचरता का सिद्धांत शुक्ल जी के ज्ञान-ज्ञानशास्त्र का ही परिणाम है। ज्ञान न तो आत्मा का प्रकाश है न इलहाम होने से प्रकट हुआ है, न वह मनुष्य का सहज भावना का परिणाम है। इस तरह से ज्ञात शास्त्रों का विरोध करने के बाद शुक्ल जी ने अपना वैज्ञानिक सिद्धांत रखा है वह सिद्धांत यह है। कि मनुष्य के बौद्धिक चिन्तन का विकास इन्द्रियज ज्ञान के आधार पर ही हुआ है। आरम्भ में मनुष्य जाति की चेतना इन्द्रियज ज्ञान की समष्टि के रूप में ही अधिकतर हरी। पीछे ज्यें-ज्यें स्भ्यता बढती गई है त्यो-त्यों मनुष्य की ज्ञान सत्ता बुद्धि व्यवसायात्मक होती गई है।

    BY MANISH KUMAR YADAV TRIVENIGANJ SUPAUL BIHAR  INDIA

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