1989 के बाद भारतीय राजनीति पर दलीय व्यवस्था के विखंडन का क्या प्रभाव पड़ा

    प्रश्नकर्ता MD
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    उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
    Moderator

    1989 के बाद भारतीय राजनीति पर दलीय व्यवस्था के विखंडन:- यद्यपि भारत में बहुदलीय व्यवस्था है, लेकिन वर्ष 1967 के चौथे आम चुनाव के पूर्व तक एक दल प्रभुत्व की व्यवस्था विद्यमान रही

    लेकिन इसके बाद विशेषकर 1989 के बाद लोकसभा चुनावों में एक नवीन प्रवृत्ति भारतीय राजनीति में उभरकर सामने आती है, वह है एक दल के प्रभुत्व का अंत।

    अतः 1989 के बाद एक दलीय प्रभुत्व व्यवस्था का अन्त हो गया तथा| मिली-जुली सरकारों का युग प्रारम्भ हुआ।

    भारत के राजनीतिक दलों के विकास से स्पष्ट होता है कि एक लम्बे समय तक भारत में संगठित विपक्ष का अभाव रहा है।

    परंतु 1989 के पश्चात् अब सशक्त विपक्ष देखने को मिल रहा है। देखा गया है कि नवीं, दसवीं, ग्यारहवीं, 12वीं, 13वीं, 14वीं तथा 15वीं लोकसभा के चुनावों ने संसद और देश की राजनीति में एक शक्तिशाली विपक्ष को जन्म दिया है।

    जून 1991 के लोकसभ चुनाव के परिणामस्वरूप भारतीय जनता पार्टी, जनता दल तथा वामपंथी मोर्चा संसद में शक्तिशाली विपक्ष की स्थिति में थे।

    राज्य स्तर पर भी अधिकांश राज्यों में विपक्ष पर्याप्त शक्तिशाली है या कम-से-कम उसे मान्यता प्राप्त विपक्षी दल की स्थिति प्राप्त है।

    इस प्रकार प्रारंभ में एवं सन् 1980 से 1989 तक संसद एवं राज्य विधानसभाओं में संगठित विरोधी दलों का अभाव रहा।

    सन् 1991 से 2004 के चुनावों के बाद अब वह स्थिति नहीं है वरन् सशक्त विपक्ष का प्रादुर्भाव हो चुका है जो भारतीय दलीय प्रणाली की महत्वपूर्ण विशेषता है।

    भारतीय राजनीतिक दलीय प्रणाली में दल-बदल की प्रवृत्ति में खासी कमी आई है। 52वें संशोधन तथा बाद में 91वें संशोधन द्वारा दल-बदल पर पूर्णतया रोक लगाने का प्रयास किया गया है।

    उत्तरकर्ता Sonal Gupta
    Participant

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