हिन्दी भाषा का विकास किस प्रकार हुआ

    प्रश्नकर्ता naresh12
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    उत्तरकर्ता shubham
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    हिन्दी भारोपीय परिवार की आर्यभाषा है।

    हिन्दी का विकास प्राचीन, मध्यकालीन आर्यभाषाओं से इस प्रकार हुआ –

    संस्कृत > पालि > प्राकृत > अपभ्रंश > हिन्दी

    अपभ्रंश हिन्दी से तुरन्त पहले की भाषा है।

    अपभ्रंश का समय 500 ई. से 1000 ई. तक माना जाता है अतः अनुमानत: 1000 ई. के आस-पास हिन्दी का प्रयोग होने लगा था अतः हिन्दी का विकासक्रम 1000 ई. से प्रारम्भ होकर वर्तमान समय तक फैला हुआ है।

    डॉ. धीरेन्द्र वर्मा ने हिन्दी भाषा के विकास को तीन कालों में विभक्त किया है-

    1. आदिकाल की हिन्दी (1000 ई. – 1500 ई.)
    2. मध्यकाल की हिन्दी (1500 ई. – 1800 ई.)
    3. आधुनिक काल की हिन्दी (1800 ई. के उपरान्त)

    आदिकाल की हिन्दी (1000 ई. – 1500 ई. तक)

    1. आदिकाल की हिन्दी अपभ्रंश के अत्यधिक निकट थी। 2. आदिकालीन हिन्दी में प्रायः उन्हीं ध्वनियों का प्रयोग मिलता है जो अपभ्रंश में प्रचलित थीं।

    3. अपभ्रंश में केवल आठ स्वर थे अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ओ। इन आठों स्वरों के अतिरिक्त आदिकालीन हिन्दी में ऐ, औ दो संयुक्त स्वर और प्रयुक्त होने लगे थे।

    4. च, छ, ज, झ अपभ्रंश में स्पर्श व्यंजन थे किन्तु हिन्दी में वे स्पर्श-संघर्षी बन गए और अब तक स्पर्श संघर्षी ही हैं।

    5. न, र, ल, स प्राचीन आर्यभाषाओं में दंत्य ध्वनियाँ थी जबकि आदिकालीन हिन्दी में ये वय॑ ध्वनियाँ हो गई।

    6. आदिकालीन हिन्दी का व्याकरण अपभ्रंश के बहुत निकट था। धीरे-धीरे अपभ्रंश के रूप कम होते गए और हिन्दी के अपने रूप विकसित होते गए।

    7. अपभ्रंश संस्कृत और पालि की तुलना में वियोगात्मक थी, किन्तु फिर भी संयोगात्मकता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी किन्तु आदिकालीन हिन्दी में वियोगात्मकता का प्राधान्य हो गया तथा सहायक क्रियाओं और परसर्गों का प्रयोग पर्याप्त मात्रा में होने लगा।

    8. आदिकालीन हिन्दी में नपुंसकलिंग पूरी तरह समाप्त हो गया।

    9. कृदन्तों से बनी क्रियाओं में लिंग परिवर्तन पूरी तरह होने लगा।

    10. हिन्दी वाक्य रचना में पदक्रम निश्चित होने लगा था जबकि अपभ्रंश में वह कुछ-कुछ अनिश्चित था।

    11. हिन्दी बोलियों के अपने-अपने व्याकरणिक रूप अभी अलग-अलग नहीं हुए थे।

    12. आदिकालीन हिन्दी का शब्द भण्डार अपने प्रारम्भिक चरण में अपभ्रंश का ही था जिसमें धीरे-धीरे अन्य शब्दों का प्रयोग होने लगा।

    13. मुस्लिम प्रभाव से अरबी-फारसी के शब्द भी हिन्दी में प्रयुक्त होने लगे थे।

    14. आदिकालीन हिन्दी के प्रमुख कवि हैं-गोरखनाथ, चन्दबरदाई, विद्यापति, नरपति नाल्ह, कबीर, ख्वाजा बंदा नेवाज, शाह मीराजी।

    15. इस काल के कवियों ने डिंगल (अपभ्रंश + राजस्थानी), पिंगल (अपभ्रंश + ब्रजभाषा), मैथिली, दक्खिनी, अवधी, ब्रज मिश्रित भाषा का प्रयोग किया है।

    मध्यकाल की हिन्दी (1500 ई. – 1800 ई.)

    1. मध्यकालीन हिन्दी में बोलियों का स्वतन्त्र विकास हो गया। मुख्य रूप से ब्रज, अवधी, खड़ी बोली का विकास इस काल में हुआ और साहित्य में ब्रज, अवधी का प्रयोग प्रमुखता से हुआ।

    2. मध्यकालीन हिन्दी अपभ्रंश के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त हो गई।

    3. हिन्दी भाषा का अपना व्याकरण हो गया तथा व्याकरणिक दृष्टि से वह अपभ्रंश से स्वतन्त्र हो गई।

    4. मध्यकालीन हिन्दी पूरी तरह वियोगात्मक भाषा बन गई जिसमें सहायक क्रियाओं और परसर्गों का प्रयोग प्रचुरता से होने लगा।

    5. मध्यकालीन हिन्दी के शब्द भण्डार में अरबी-फारसी, तुर्की के शब्द पर्याप्त मात्रा में (लगभग 6000 शब्द) आ गए।

    6. भक्ति आन्दोलन के चरमोत्कर्ष के कारण तत्सम शब्दों का प्रयोग भाषा में बढ़ गया।

    7. यूरोप से सम्पर्क होने के कारण कुछ पुर्तगाली, स्पेनी, फ्रांसीसी तथा अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग हिन्दी में होने लगा।

    8. अवधी राम काव्य की , सूफी काव्य की भाषा बन गई तथा कृष्ण काव्य ब्रजभाषा में रचा गया। समूचे रीतिकाल में ब्रजभाषा का काव्य के क्षेत्र में एकछत्र शासन रहा।

    9. इस काल के प्रमुख साहित्यकार हैं-जायसी, सूर, मीरा, तुलसी, केशव, बिहारी, भूषण, देव, घनानन्द, कुली कुतुबशाह, बजही तथा बली आदि।

    आधुनिककाल की हिन्दी (1800 ई. के उपरान्त)

    1. 1800 ई. के पश्चात् की हिन्दी आधुनिक काल की हिन्दी है। इस काल में शिक्षा का प्रचार-प्रसार होने से अंग्रेजी शब्दों का व्यवहार हिन्दी में बढ़ा है। अंग्रेजी के प्रभाव से ड़ जैसे संयुक्त व्यंजन हिन्दी में प्रयुक्त होने लगे। स्वरों में ऐ, औ का उच्चारण जो क्रमशः अए, अओ (प्राचीनकाल) था, अब वे हिन्दी क्षेत्र में मूल स्वर के रूप में उच्चरित होने लगे। पश्चिमी और पूर्वी हिन्दी में इन दोनों का उच्चारण संस्कृत की तरह संयुक्त स्वर अइ, अउ के रूप में होता है।

    2. मध्यकाल में ‘अ’ का लोप शब्दांत में हुआ था किन्तु आधुनिक काल तक आते-आते यह प्रक्रिया पूरी हो गई और अब कोई भी शब्द अकारांत नहीं है।

    3. ‘व’ ध्वनि जो पहले द्वयोष्ठ्य थी अब वह कुछ अपवादों को छोड़कर पश्चिमी क्षेत्र में दन्त्योष्ठ्य रूप में उच्चरित होने लगी।

    4. आदिकाल में हिन्दी बोलियों का कोई व्याकरण नहीं था परन्तु मध्यकाल में जब ये बोलियाँ प्रभावी हो गईं और उनका साहित्य में प्रयोग होने लगा तो भाषिक एकरूपता लाने के लिए उनके व्याकरण की जरूरत पड़ी और ब्रज, अवधी, खड़ीबोली के व्याकरण बनाए गए।

    5. हिन्दी पूरी तरह एक वियोगात्मक भाषा बन गई।

    6. शिक्षा, संचार माध्यमों में प्रयोग के कारण हिन्दी व्याकरण का रूप बहुत कुछ निर्धारित हो गया। व्याकरण के इस स्थिरीकरण में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का बहुत बड़ा योगदान है।

    7. आधुनिक काल की हिन्दी में खड़ी बोली से विकसित हिन्दी को प्रमुखता प्राप्त हो गई और उसका प्रयोग काव्य, गद्य दोनों में होने लगा।

    8. अंग्रेजी भाषा के विराम चिों को हिन्दी ने अपनाकर अर्थ की दृष्टि से बहुत कुछ सुनिश्चितता प्राप्त कर ली।

    9. शब्द भण्डार की दृष्टि से आधुनिक काल की हिन्दी में तत्सम, तद्भव, देशज तथा विदेशी शब्दों का पर्याप्त भण्डार विकसित हुआ।

    10. अंग्रेजी प्रभाव से आज की हिन्दी पर अंग्रेजी का तथा आर्य समाज के प्रभाव से वर्तमान हिन्दी पर संस्कृत की तत्सम शब्दावली का पर्याप्त प्रभाव पड़ा है।

    11. अभिव्यक्ति की आवश्यकता पूर्ति हेतु हिन्दी में अनेक नए शब्द यथा-फिल्माना, स्वीकारना, घुसपैठिया, कारसेवक आदि का समावेश हो गया है। हिन्दी शब्द भण्डार की निरन्तर होने वाली वृद्धि उसकी अभिव्यक्ति क्षमता को बढ़ा रही है।

    12. आधुनिक काल में काव्य के साथ-साथ गद्य की विविध विधाएँ भी हिन्दी में विकसित हुई हैं यथा-उपन्यास, कहानी, नाटक, निबन्ध, आत्मकथा, जीवनी, संस्मरण, रेखाचित्र, आलोचना, भेटवार्ता, रिपोर्ताज, यात्रावृत्त आदि।

    आज हिन्दी हमारी सरकारी काम-काज की भाषा होने से राजभाषा भी है तथा बहुसंख्यक लोगों की भाषा होने से राष्ट्रभाषा भी है। यही नहीं अपितु कुंभ मेले जैसे विशाल आयोजनों में जहाँ सभी प्रदेशों के लोग आते हैं, हिन्दी ही सम्पर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त की जाती है क्योंकि निरक्षर जनता अंग्रेजी से वह काम नहीं ले पाती।

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