सुभद्रा कुमारी चौहान

    प्रश्नकर्ता deelip
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    उत्तरकर्ता Quizzer Jivtara
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    सुभद्रा कुमारी चौहान का जीवन परिचय

    सुभद्रा कुमारी चौहान की गिनती भारत की स्वतंत्रता सेनानी लेखिकाओं में की जाती है। उनका जन्म सन् 1905 में इलाहाबाद के निहालपुर मुहल्ले में हुआ था। वह अपने माता-पिता की सातवीं संतान थीं। सुभद्रा बचपन में बहुत नटखट थी, इसलिए माता-पिता उनका विशेष ध्यान रखते थे। अपने चंचल और तेज-तर्रार स्वभाव के कारण प्रायः उन्हें डाँट भी पड़ती थी। किंतु वह मन से बहुत कोमल थीं। घर के नौकरों से भी उनका व्यवहार आत्मीयतापूर्ण रहता था।

    सुभद्रा के माता-पिता ने उन्हें घर में ही पढ़ना-लिखना सिखाया। इसके बाद उनकी प्रारंभिक शिक्षा प्रयाग स्थित एक विद्यालय में हुई। विद्यार्थी जीवन से ही उनका झुकाव लेखन की ओर होने लगा था। उन्होंने पहली कविता पंद्रह वर्ष की उम्र में रची थी। कवता रचने के प्रति उनका रुझान प्रायः माता-पिता व अध्यापकों के लिए परेशानी भी पैदा कर देता था। सुभद्रा प्रायः गणित की कॉपी में ही कविताएँ लिख लेती थीं।

    सन् 1919 में सुभद्रा नौवीं कक्षा की छात्रा थीं। उन दिनों पंजाब के जलियाँ- वाला बाग में भीषण नरसंहार हुआ। सुभद्रा का कोमल मन इससे आहत हुआ और उन्होंने कलम को ही अपनी आवाज बनाने का निर्णय लिया।

    स्कूली जीवन में ही सुभद्रा का परिचय महादेवी वर्मा से हुआ। सुभद्रा और महादेवी–दोनों ही गणित आदि की कॉपियों में कविताएँ लिखती थीं। सुभद्रा ने ही गुमसुम रहनेवाली महादेवी की ऐसी ही एक कॉपी पूरे विद्यालय में प्रचारित की थी। इस कारण दोनों में जल्दी ही घनिष्ठता हो गई। वैसे दोनों के स्वभाव में काफी अंतर था—सुभद्रा चंचल थीं तो महादेवी गंभीर स्वभाववाली, किंतु यह अंतर भी उनकी मित्रता को कम नहीं कर सका।

    स्कूली शिक्षा के बाद सुभद्रा ने क्रास्टवेद गर्ल्स कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त की। सुभद्रा की शिक्षा पूरी होने के साथ ही ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान के साथ उनका विवाह कर दिया गया। ठाकुर लक्ष्मण सिंह ने बी.ए., एल-एल.बी. तक शिक्षा पाई थी और प्रसिद्ध वकील थे।

    सुभद्रा बचपन से ही रूढिवादी विचारों की विरोधी थीं। वह परदा प्रथा के पक्ष में भी नहीं थीं। इसीलिए विवाह के बाद वह बिना चूँघट निकाले ही ससुराल जाने लगीं; लेकिन यह खबर उनसे भी पहले उनकी ससुराल पहुंच गई। वहाँ की औरतों में कानाफूसी होने लगी।

    सुभद्राजी के जेठ ने भी यह खबर सुनी तो वह कुछ नाराज हुए। वह क्रोधावेश में दरवाजे पर ही बैठ गए। समय की नजाकत को समझकर सुभद्रा ने तुरंत घूघट निकाल लिया। लेकिन घर के अंदर पहुँचते ही फिर उलट दिया। यहाँ सुभद्रा को अपने पति का पूरा सहयोग मिला। दरअसल, वह भी रूढियों के खिलाफ थे। इस तरह सुभद्रा को पति के रूप में एक अच्छा मित्र मिल गया था। ठाकुर लक्ष्मण सिंह सक्रिय स्वतंत्रतासेनानी थे। वह राष्ट्रीय आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लेते थे।

    सन् 1919 के जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने देश में क्रांतिकारी आंदोलन को तेज कर दिया था। सुभद्रा ने अपनी नौवीं की परीक्षा और लक्ष्मण सिंह ने एम.ए. की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। वे दोनों गांधीजी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन में कूद पड़े, क्योंकि उन दिनों असहयोग आंदोलन जोरों पर था।

    असहयोग आंदोलन में आते ही सुभद्रा प्रेरणात्मक कविताएँ लिखने लगीं। सुभद्रा और लक्ष्मण सिंह ने क्रांतिकारियों में अपनी पैठ जमा ली थी। सभी क्रांतिकारी उनकी कलम का प्रभाव जानते थे। सन् 1920-21 में सुभद्रा ने ‘राखी की लाज’ और ‘जलियाँवाला बाग में वसंत’ शीर्षक से ओजस्वी कविताओं की रचना की।

    सुभद्रा ने जहाँ साहित्य के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई थी, वहीं लोग उन्हें एक क्रांतिकारी समाज-सेविका के रूप में भी पहचानने लगे थे। 14 अगस्त, 1923 को जबलपुर में कई राष्ट्रीय नेताओं के आगमन के कारण ब्रिटिश सरकार ने उस दिन वहाँ निषेधाज्ञा जारी कर दी और जुलूस आदि पर पाबंदी लगा दी थी। स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों ने निषेधाज्ञा का उल्लंघन किया। सुभद्रा भी उनके साथ थीं। वह उस समय गर्भवती थीं। कुछ समय बाद उन्होंने एक बेटी को जन्म दिया।  माँ बनने के बाद सुभद्रा में एक नई काव्य-चेतना ने जन्म लिया। उन्होंने वात्सल्य रस से भरपूर कुछ कविताओं की रचना की। इसी दौरान उन्होंने ‘झाँसी की रानी’ शीर्षक कविता भी लिखी। वीर रस से भरपूर इस कविता से उनका नाम देश भर में प्रसिद्ध हो गया।

    उनका आकसमिक निधन 15 फरवरी 1948 को एक कार दुरघटना में नागपुर के निकट सिवनी में हो गया था।

    सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध कविता:- 

    “सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भूकुटी तानी थी,

    बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,

    गुमी हुई आजादी की कीमत सब ने पहचानी थी,

    दूर फिरंगी को करने की सब ने मन में ठानी थी,

    चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार प्रानी थी,

    बुन्देले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी,

    खूब लड़ी मरदानी वह तो झांसी वाली रानी थी।”

    ‘झाँसी की रानी’ शीर्षक उनकी इस कविता ने सोए जनमानस की आत्मा को झकझोरकर रख दिया। राष्ट्रीय स्तर पर उनकी विशिष्ट पहचान बन गई। लोग जोश के साथ ऊँचे स्वरों में उनकी कविता गाने लगे। इसी एक कविता ने उन्हें अमर कर दिया  |

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