सिद्ध,नाथ और जैन साहित्य में विषय में बताते हुए इनके अन्तर को स्पष्ट कीजिए

    प्रश्नकर्ता Ratnesh Dubey
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    उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
    Moderator

    सिद्ध,नाथ और जैन साहित्य में विषय में बताते हुए इनके अन्तर ।

    सिद्ध साहित्य- वज्रयान के क्रोड़ में पोषित होकर भी उससे अनुशासित नहीं हुआ, वह सहजयान का मार्ग लेकर स्वतन्त्र-सा हो गया।

    जैन साहित्य- अत्यन्त प्राचीन होते हुए भी-बौद्ध धर्म के समानान्तर चल कर-श्रावकाचार के रूप में नैतिक मापदण्डों के निर्माण में शक्तिसम्पन्न हुआ।

    नाथ साहित्य- शैव धर्म से स्फूर्ति पाकर सिद्ध-साहित्य के संशोधन में और भी कृतकार्य हुआ।

    इस भावना के होते हुए भी इन तीनों के जीवनगत दृष्टिकोण में अन्तर था।

    1 .सिद्धसम्प्रदाय प्रवृत्तिमार्गी था;

    2 .जैन सम्प्रदाय प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों से पूर्ण था

    3. नाथ-सम्प्रदाय सम्पूर्णतः निवृत्तिमार्गी था।

    किन्तु जीवन के लौकिक पक्ष से साधना में बल प्राप्त करने की अन्तर्दृष्टि तीनों में ही वर्तमान थी।

    इन तीनों साम्प्रदायिक साहित्यों में दार्शनिक पक्ष का महत्त्व भी भिन्न-भिन्न है। जैन-साहित्य में सबसे अधिक दार्शनिक तत्त्व है, इसके अनन्तर सिद्ध साहित्य में है, फिर नाथ साहित्य में।

    इस प्रकार इन सभी धर्मों में एक ऐसा वेग था जो अपने चारों ओर के वातावरण को परिष्कृत करने में पूर्ण सक्षम था। इन सभी धार्मिक आन्दोलनों में एक बात समान रूप से वर्तमान रही और वह यह कि इनमें अन्धविश्वासों और रूढ़ियों के लिए कोई स्थान नहीं था।

    जीवन की स्वाभाविक प्रवृत्तियों का अधिक से अधिक उपयोग करने तथा उन्हें स्वाभाविक क्षेत्रों में ले जाने का आदर्श सभी में मौजूद था।

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