सविनय अवज्ञा आंदोलन का सविस्तार वर्णन कीजिए

    प्रश्नकर्ता Arvind Gupta
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    उत्तरकर्ता jivtaraQuizzer
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    सविनय अवज्ञा आंदोलन :- अगस्त, 1928 ई. में प्रकाशित नेहरू रिपोर्ट के सम्बन्ध में मुसलमानों के अतिरिक्त कांग्रेस के नेताओं में अत्यधिक मतभेद थे। पण्डित जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस जैसे नवयुवक नेता अपनी पूर्ण स्वराज्य की माँग पर दृढ़ थे दूसरी ओर पण्डित मोतीलाल नेहरू जैसे पुरानी पीढ़ी के नेता तत्कालीन परिस्थितियों में औपनिवेशिक स्वराज्य की माँग को उचित समझते थे। इसी मतभेद के कारण जब दिसम्बर, 1928 ई. में कांग्रेस का अधिवेशन कलकत्ता में हुआ तो ऐसा प्रतीत होने लगा कि इस रिपोर्ट को लेकर कांग्रेस में विघटन को जाएगा और नेहरू रिपोर्ट के सम्बन्ध में कोई निर्णय नहीं लिया जा सकेगा परन्तु उन विषम परिस्थितियों में महात्मा गाँधी ने मध्यस्थता करके दोनों गुटों में समझौता करा दिया जिसके परिणामस्वरूप नेहरू प्रतिवेदन को स्वीकार कर लिया गया। इसी समय गाँधी जी ने कांग्रेस से एक प्रस्ताव और पारित करवा लिया जिसके द्वारा सरकार को एक अल्टीमेटम दिया गया जिसका महत्वपूर्ण अंश निम्न प्रकार है

    “यदि ब्रिटिश संसद इस विधान को ज्यों-का-त्यों 31 दिसम्बर, 1929 ई. तक या उससे पहले स्वीकार कर ले तो कांग्रेस इस विधान को अपना लेगी बशर्ते कि राजनीतिक स्थिति में कोई परिवर्तन न हो लेकिन यदि उस तिथि तक ब्रिटिश संसद उसे स्वीकार न करे या इसके पहले ही अस्वीकार कर दे तो कांग्रेस देश को कर-बन्दी की सलाह देकर अन्य उपायों के आधार पर जिन्हें वह बाद में निश्चित करेगी, अहिंसात्मक असहयोग आन्दोलन चलाएगी।”

    लेकिन ब्रिटेन में सत्ता परिवर्तन होने पर भी लेबर दल सरकार ने भी भारतीयों की माँगों की ओर ध्यान नहीं दिया और इस प्रकार नेहरू रिपोर्ट सफल न हो सकी। सन् 1930 ई. के प्रारम्भ तक भारत के चारों ओर उत्तेजना का वातावरण निर्मित होता जा रहा था। देश की राजनीतिक, आर्थिक स्थिति बहुत अधिक खराब थी। इस बात की आशंका होने लगी थी कि यदि गाँधी जी अहिंसात्मक आन्दोलन का शुभारम्भ न करते तो बहुत अधिक दुर्दशा होती और सरकार के दमनचक्र के कारण भारत में हिंसक क्रान्ति का सूत्रपात होता। अत: इन परिस्थितियों में गाँधी जी ने कांग्रेस में ‘सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव पर विचार के लिए कांग्रेस कार्यकारिणी ने 14 से 16 फरवरी को एक बैठक साबरमती में आयोजित की। कांग्रेस ने स्थिति का गम्भीरतापूर्वक अध्ययन कर एक प्रस्ताव पास किया और गाँधी जी को सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करने के सम्पूर्ण अधिकार दे दिए। इस आन्दोलन को चलाने का गाँधी जी ने क्यों निर्णय लिया, वे परिस्थितियाँ कौन-सी थीं कि मार्च, 1930 ई. को गाँधी जी द्वारा सविनय अवज्ञा आन्दोलन का प्रारम्भ किया गया।

    सविनय अवज्ञा आन्दोलन के प्रमुख कारण :- 
    सविनय अवज्ञा आन्दोलन के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी माने जाते हैं
    (1) शोचनीय आर्थिक स्थिति- गाँधी जी द्वारा चलाए गए सविनय अवज्ञा आन्दोलन के लिए भारतीयों की शोचनीय आर्थिक दशा विशेष रूप से उत्तरदायी थी। सन् 1930 ई. के आस-पास देश में भारी मन्दी और व्यापक रोजगार के कारण भारतीयों में असन्तोष व्याप्त था। मजदूर, व्यापारी, किसान और सामान्य जनता इससे परेशान थी। सरकार ने गाँधी जी की न्यूनतम माँगों को भी अस्वीकार कर दिया था। ऐसी स्थिति में गाँधी जी ने दूसरा आन्दोलन चलाने का निर्णय लिया।
    (2) असन्तोष और उत्तेजना का वातावरण- देश में असन्तोष और उत्तेजना का वातावरण तेजी से फैलता जा रहा था। राजनीति में नवयुवक वर्ग अधिक सक्रिय हो गया था। सरकार ने रुपए की कीमत 16 पैसे से बढ़ाकर 18 पैसे कर दी थी जिससे इंग्लैण्ड को अधिक लाभ हुआ था। सरकार ने मजदूर संगठनों के नेताओं पर मेरठ पड्यन्त्र का अभियोग लगाकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। जिससे मजदूर उत्तेजित हो उठे। सरदार भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त के क्रान्तिकारी कार्योंऔर लाहौर षड्यन्त्र के कारण भारत का राजनीतिक वायुमण्डल अत्यधिक उत्तेजित हो गया। दिसम्बर, 1928 ई. के कलकत्ता अधिवेशन में पारित गाँधी जी द्वारा भेजे गए अल्टीमेटम का सरकार ने कोई उत्तर नहीं दिया। परिणामस्वरूप लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वाधीनता का निर्णय लिया गया।
    (3) स्वतन्त्रता दिवस की घोषणा (सन् 1929 ई. का लाहौर अधिवेशन)- अभी तक ब्रिटिश सरकार की नीतियों एवं दृष्टिकोणों से भारतीयों को यह निश्चय हो गया था कि ब्रिटिश सरकार उस समय तक भारत को स्वराज्य नहीं देगी जब तक वह इसके लिए विवश न हो जाए। अत: भारी क्षोभ और निराशा के वातावरण में पण्डित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में दिसम्बर, 1929 ई. को लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन आयोजित किया गया था। अधिवेशन में 31 दिसम्बर, 1929 ई. की रात्रि को 12 बजे रावी नदी के तट पर भारत का तिरंगा झण्डा फहराकर पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पारित किया गया। कांग्रेस के विधान की पहली धारा में ‘स्वराज्य’ शब्द का अर्थ पूर्ण स्वाधीनता उल्लेखित किया गया और नेहरू रिपोर्ट वापस लेने तथा पूर्ण स्वाधीनता की प्राप्ति हेतु जनता का आह्वान किया गया। यह भी निश्चय किया गया कि 26 जनवरी का दिन ‘स्वाधीनता दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा। आवश्यकता पड़ने पर सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करने का कांग्रेस कार्यसमिति को अधिकार दे दिया गया।
    (4) इंग्लैण्ड में लेबर पार्टी की सरकार एवं दिल्ली घोषणा- पत्र-मई, 1929 ई. में इंग्लैण्ड में लेबर पार्टी की सरकार स्थापित हुई। भारतीयों को लेबर पार्टी की सरकार से बहुत आशाएँ थीं लेकिन भारत के सम्बन्ध में ब्रिटेन की नीति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। ब्रिटिश प्रधानमन्त्री मैक्डोनेल्ड ने भारत को शीघ्र ही राष्ट्रमण्डल में समानता का दर्जा दिए जाने की घोषणा की तथा भारत से गवर्नर को बातचीत के लिए इंग्लैण्ड बुलाया गया। इसके फलस्वरूप 31 अक्टूबर, 1929 ई. को गवर्नर लॉर्ड इरविन ने जो ‘दिल्ली घोषणा की वह बहुत ही अस्पष्ट थी। इसमें भारत को औपनिवेशिक स्वराज्य प्रदान करने की कोई तिथि निश्चित नहीं थी। भारत का नवयुवक वर्ग इस घोषणा से असन्तुष्ट था।
    (5) स्वाधीनता दिवस की घोषणा- लाहौर अधिवेशन में लिए गए निर्णय के अनुसार 26 जनवरी, 1930 ई. को कांग्रेस ने पहला पूर्ण स्वाधीनता दिवस बहुत उत्साह से मनाया। इस समारोह में स्वाधीनता को जनता का जन्म-सिद्ध अधिकार बताया गया। कांग्रेस द्वारा सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करने का निर्णय-14 से 16 फरवरी, 1930 ई. तक कांग्रेस कार्यकारिणी की एक बैठक साबरमती में आयोजित की गई। इस बैठक में एक प्रस्ताव पारित करके गाँधी जी को सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करने के सम्पूर्ण अधिकार दे दिए गए।

    कांग्रेस द्वारा सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करने का निर्णय- 14 से 16 फरवरी, 1930 ई. तक कांग्रेस कार्यकारिणी की एक बैठक साबरमती में आयोजित की गई। इस बैठक में एक प्रस्ताव पारित करके गाँधी जी को सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करने के सम्पूर्ण अधिकार दे दिए गए।

    यद्यपि कार्यकारिणी ने गाँधी जी को आन्दोलन प्रारम्भ करने के सम्पूर्ण अधिकार दे दिए थे किन्तु शान्ति और समझौते में विश्वास करने वाले गाँधी जी ने वायसराय को आन्दोलन प्रारम्भ करने से पूर्व एक अवसर और दिया।

    उन्होंने एक पत्र गवर्नर को लिखा जिसमें कहा गया कि यदि वह निम्नलिखित 11 शर्तों को सरकार मान ले तो उसे सविनय अवज्ञा आन्दोलन का नाम भी नहीं सुनना पड़ेगा :-
    1. पूर्ण नशाबन्दी हो।

    2. मुद्रा विनिमय में एक रुपया एक शिलिंग चार पेंस के बराबर माना जाए।

    3. मालगुजारी आधी कर दी जाए और उसे विधानमण्डल के नियन्त्रण में रखा जाए।

    4. नमक पर लगने वाला कर बन्द किया जाए।

    5. सैनिक व्यय में कमी की जाए और प्रारम्भ में इस आधा कर दिया जाए।

    6. बड़े-बड़े अधिकारियों के वेतन कम से कम आधे कर दिए जाएँ।

    7. विदेशी वस्त्रों पर तट कर लगाया जाए ताकि देशी उद्योगों को संरक्षण प्राप्त हो।

    8. तटीय व्यापार संरक्षण कानून पारित किया जाए।

    9. हत्या या हत्या की चेष्टा में दण्डित व्यक्तियों को छोड़कर सभी राजनीतिक बन्दियों को रिहा कर दिया जाए एवं सभी मुकदमे वापस ले लिए जायें।

    10. खुफिया पुलिस तोड़ दी जाए या उसे जन-नियन्त्रण में रखा जाए।

    11. आत्मरक्षा के लिए बन्दूक आदि हथियारों के लाइसेंस दिए जायें।

    शासन ने उक्त माँग-पत्र का सहानुभूतिपूर्वक उत्तर नहीं दिया। इतना ही नहीं, उसने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी प्रारम्भ कर दी। इस समय सुभाषचन्द्र बोस व अन्य 11 व्यक्तियों को एक वर्ष की सजा भी दी गई। फिर भी गाँधी जी ने एक और अवसर देने के लिए अपने एक अंग्रेज मित्र रेनाल्ड्स के हाथों एक पत्र वायसराय को भेजा। इसका उत्तर वायसराय ने बहुत ही निराशाजनक दिया और उल्टे गाँधी जी को ही सावधान करते हुए कहा कि, “मुझे दुःख है कि गाँधी जी वह रास्ता अपना रहे हैं जिसमें कानून और सार्वजनिक शान्ति भंग होना आवश्यक है।”

    इसके उत्तर में गाँधी जी ने कहा कि, “मैंने घुटने टेककर रोटी माँगी थी परन्तु मुझे उसके स्थान पर पत्थर मिला। ब्रिटिश राष्ट्र केवल शक्ति के सामने झुकता है इसलिए वायसराय के पत्र से मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। भारत के भाग्य में तो जेलखानों की शान्ति ही एकमात्र शान्ति है। सम्पूर्ण भारत एक जेलखाना है। मैं उन ब्रिटिश कानूनों का अर्थ समझता हूँ और मैं उस शोकमय शान्ति को भंग करना चाहता हूँ जो राष्ट्र के दिल को कष्ट दे रही है।”

    सविनय अवज्ञा आन्दोलन का प्रारम्भ एवं दाण्डी यात्रा- शासन द्वारा गाँधी जी के पत्र का सहानुभूतिपूर्वक उत्तर न मिलने के कारण गाँधी जी के सामने आन्दोलन प्रारम्भ करने के अतिरिक्त अन्य कोई रास्ता नहीं था। इसलिए 11 मार्च, 1930 ई. को साबरमती के मैदान में 75 हजार व्यक्तियों ने एकत्रित होकर प्रण किया कि जब तक स्वाधीनता नहीं मिल जाती तब तक न तो हम स्वयं चैन लेंगे और न सरकार को चैन लेने देंगे। उन्होंने इसमें से 79 ऐसे कार्यकर्ता चुने जो 12 मार्च, 1930 ई. को साबरमती आश्रम से डाण्डी समद्र तट की ओर चल पड़े। 200 मील की लम्बी दूरी पैदल चलकर 24 दिनों में पूरी की गई। जैसे-जैसे गाँधीजी के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं का समूह आगे बढ़ता गया वैसे ही वैसे मार्ग गाँवों का जनसमूह उमड़ने लगा। उनसे गाँधी जी यही कहते थे कि, “ब्रिटिश साम्राज्य एक अभिशाप है, मैं इसे समाप्त करके रहूँगा।” वे खादी पहनने, शराब पीना बन्द करने, सरकारी नौकरी छोड़ने का उपदेश भी देते थे। 5 अप्रैल, 1930 ई. को गाँधी जी अपने कार्यकर्ताओं के साथ डाण्डी पहुँचे। अगले दिन 6 अप्रैल, 1930 ई. को प्रार्थना के उपरान्त डाण्डी समुद्र तट पर गाँधी जी ने स्वयं अपने हाथ से नमक बनाकर ब्रिटिश सरकार के नमक कानून को तोड़ दिया। इस प्रकार नमक कानून तोड़कर गाँधी जी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन का श्रीगणेश किया।

    सविनय अवज्ञा आन्दोलन का कार्यक्रम- 6 अप्रैल, 1930 ई. को गाँधीजी द्वारा स्वयं नमक कानून तोड़ने के पश्चात् आन्दोलन के निम्नलिखित कार्यक्रम निर्धारित किए गए :-
    1. गाँव-गाँव में नमक कानून को तोड़कर नमक बनाया जाना चाहिए।

    2. महिलाओं द्वारा शराब, अफीम और विदेशी वस्त्रों की दुकानों पर धरना दिया जाना चाहिए।

    3. विदेशी वस्त्रों का प्रयोग बन्द करके सार्वजनिक रूप से विदेशी वस्त्रों की होली जलाई जानी चाहिए।

    4. हिन्दुओं को अस्पृश्यता का त्याग कर देना चाहिए।

    5. विद्यार्थियों द्वारा सरकारी स्कूलों और कॉलेजों का बहिष्कार कर दिया जाना चाहिए।

    6. सरकारी कर्मचारियों को नौकरियों से त्याग-पत्र देने चाहिए।

    7. 4 मई को महात्मा जी की गिरफ्तारी के बाद करबन्दी को भी आन्दोलन के कार्यक्रम में सम्मिलित कर लिया गया।

    आन्दोलन की प्रगति- महात्मा गाँधी द्वारा नमक कानून तोड़े जाने के पश्चात् यह आन्दोलन सम्पूर्ण देश में फैल गया। स्थान-स्थान पर नमक कानून तोड़ा जाने लगा। बम्बई, बंगाल, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रान्त में नमक कानून तोड़कर अवैध रूप से नमक बनाया जाने लगा। महात्मा गाँधी के आह्वान पर महिलाओं ने भी बढ़-चढ़कर इस आन्दोलन में भाग लिया। अकेली दिल्ली में ही विदेशी वस्त्रों और दुकानों पर 1,600 महिलाओं ने धरना दिया जिसके परिणामस्वरूप अनेक दुकानें बन्द हो गईं। विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करके सार्वजनिक रूप, से उनकी होलियाँ जलाई गईं। आन्दोलन प्रारम्भ होने के एक माह के भीतर ही 200 पटेल और पटवारियों के अतिरिक्त, अनेक सरकारी कर्मचारियों ने अपने त्याग-पत्र दे दिए। इसके अतिरिक्त स्थान-स्थान पर विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूलों और कॉलेजों का परित्याग करके राष्ट्रीय शिक्षा को अपनाया। इस प्रकार आन्दोलन के अधिकांश कार्यक्रम को अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई। विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार की सफलता के सम्बन्ध में ब्रेलिस फोर्ड ने लिखा है कि, “सन् 1930 ई. की शरद ऋतु तक विदेशी वस्त्रों का आयात पूर्व वर्ष के इन्हीं महीनों की आयात की तुलना में तिहाई या चौथाई के बीच रह गया था। बम्बई में अंग्रेज व्यापारियों की 16 मिलें बन्द हो गईं और 32 हजार मजदूर बेकार हो गये। इसके विपरीत, भारतीय व्यापारियों की मिलें दगनी गति से कार्य कर रही थीं। इस आन्दोलन में खान अब्दुल गफ्तार खाँ के नेतृत्व में पठानों एवं अन्य राष्ट्रवादी मुसलमानों को छोड़कर मि. जिन्ना के नेतृत्व में अल्पसंख्यक मुसलमानों ने भाग नहीं लिया। फिर भी सविनय अवज्ञा आन्दोलन को अप्रत्याशित सफलता प्राप्त हुई।

    आन्दोलन का दमन- प्रारम्भ में तो सरकारी अधिकारियों ने आन्दोलन की तकनीक का उपहास किया था परन्तु जब आन्दोलन पूरे देश में आँधी की तरह फैल गया तो सरकार की नींद हराम हो और उसने आन्दोलन को कुचलने के लिये दमन-चक्र चलाना प्रारम्भ कर दिया। प्रदर्शनियों और सभाओं पर रोक लगा दी गई। लाठी प्रहार रोजाना की आम बात हो गई। 21 मई, 1930 ई. को धरसाना में 2,500 स्वयंसेवकों ने नमक के गोदाम पर चढ़ाई की तो उन पर पाशविक लाठी प्रहार किया गया। इस लाठी प्रहार का करुण दृश्य यह था कि गोदाम के आसपास की सम्पूर्ण भूमि पीड़ा से कराहते हुए आदमियों से पट गई थी। किसी का कन्धा टूट गया था और किसी की खोपड़ी। लोगों के सफेद कपड़े खून में तर थे। धारसाना के बाद बडाला तथा दूसरे स्थानों पर भी ऐसी ही घटनाएँ हुईं। लगभग 90 हजार लोगों को जेलों में डाल दिया गया। इनमें स्त्रियाँ भी शामिल थीं। कक्षाओं में घुसकर विद्यार्थियों व अध्यापकों को भी लाठियों से पीटा गया। स्त्रियों को निर्दयतापूर्वक पीटा गया तथा उनसे अभद्र व्यवहार किया गया। देश को अध्यादेश शासन के अधीन कर दिया गया। चारों ओर काले कानून की गूंज थी। काँग्रेस को अवैध संस्था घोषित कर दिया गया। लोगों की सम्पत्ति को गलत तरीके से छीना गया। पण्डित जवाहरलाल नेहरू व गाँधी जी को बन्दी बना लिया गया। किन्तु इन नेताओं की गिरफ्तारी के बाद भी आन्दोलन निरन्तर चलता रहा। पुलिस के दमन कार्य की प्रतिक्रिया के रूप में कुछ स्थानों पर जनता ने हिंसात्मक कार्यवाही की। शोलापुर में एक उत्तेजित भीड़ ने थाने को जला दिया तथा कुछ चौकीदारों को मार डाला। संगठित कार्यकर्ताओं ने व्यवस्था स्थापित करने में सफलता प्राप्त की लेकिन पुलिस ने 25 व्यक्तियों को भूनकर और सैकड़ों को घायल करके प्रतिशोध लिया। जहाँ अंग्रेज सरकार ने आन्दोलन को कुचलने के लिये कोई प्रयास शेष नहीं छोड़ा था वहीं सरकार की पहल पर एक अंग्रेज पत्रकार मि. सोलोकोम्ब, डॉ. जयकर और तेजबहादुर सप्रू ने गाँधी जी से जेल में मिलकर समझौते के प्रयास किए। लेकिन गाँधी जी ने जो शर्ते रखीं उन शर्तों को सरकार मानने के लिये तैयार नहीं थी। इसलिए आन्दोलन निरन्तर चलता रहा।

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