राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता से संबंधित आपातकालीन प्रावधान क्या है

    प्रश्नकर्ता MD
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    उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
    Moderator

    राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता से संबंधित आपातकालीन प्रावधान:-  संवैधानिक तंत्र की विफलता से उत्पन्न आपातकालीन स्थिति अनुच्छेद-355 में प्रावधानित है कि प्रत्येक राज्य की बाह्य आक्रमण और आभ्यंतरिक अशांति (सशस्त्र विद्रोह) से प्रत्येक राज्य का संरक्षण करना तथा प्रत्येक राज्य की सरकार भारतीय संविधान के उपबंधों के अनुसार चलाई जाए यह सुनिश्चित करना संघ का दायित्व है।

    अनुच्छेद-356 में कहा गया है कि राष्ट्रपति को स्वयं या राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर यह ज्ञात हो जाए कि उस राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो गया है तो राष्ट्रपति उस राज्य में संकटकालीन स्थिति अर्थात् राष्ट्रपति शासन की घोषणा कर सकता है।

    राष्ट्रपति की राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा को 2 माह के अंदर दोनों सदन से साधारण बहुमत से अनुमोदित कराना आवश्यक होता है।

    यदि घोषणा के समय लोकसभा की बैठक नहीं चल रही हो अथवा दो माह के अंदर लोकसभा का विघटन हो जाता है तो नई लोकसभा का गठन होने के एक माह के अंदर उद्घोषणा का अनुमोदन कराना आवश्यक होगा अन्यथा उद्घोषणा निष्प्रभावी हो जाएगी।

    संसद द्वारा अनुमोदन के पश्चात उद्घोषणा 6 माह तक प्रभावी रहेगी। 6-6 माह पर संसद द्वारा अनुमोदन कराना आवश्यक होगा। परंतु इस प्रकार की घोषणा को अधिकतम 3 वर्ष तक की अवधि के लिए ही बढ़ाया जा सकता है।

    परंतु यदि इस अवधि को एक वर्ष से अधिक बढ़ाया जाता है तो 44वें संविधान संशोधन अधिनियम की दो शर्तों को पूरा होना चाहिए

    1.जब संपूर्ण भारत में या संबंधित राज्य या इसके किसी भाग में आपात स्थिति की घोषणा की जा चुकी हो तथा

    2.निर्वाचन आयोग यह प्रमाणित कर दें कि अभी उस राज्य में चुनाव कराना

    अनुच्छेद-356 के अंतर्गत किसी राज्य में आपात स्थिति की उद्घोषणा के निम्नलिखित परिणाम होते हैं

    1 उच्च न्यायालय के कार्यों को छोड़कर संबंधित राज्य की कार्यपालिका या किसी अन्य प्राधिकारी के समस्त या कुछ कृत्यों/अधिकारों को अपने हाथ
    में ले लेगा।

    राष्ट्रपति राज्य की विधानमंडल की शक्तियों का प्रयोग संसद या उसके प्राधिकार के अधीन करने की घोषणा कर सकता है।

    3 राष्ट्रपति राज्य सरकार के किसी भी पदाधिकारी की कार्यकारिणी की शक्तियों को हस्तगत कर राज्यपाल को हस्तांतरित कर सकता है।

    4 यदि लोकसभा की बैठक नहीं चल रही हो तो राष्ट्रपति राज्य की संचित निधि से व्यय के लिए आदेश दे सकता है।

    5 आपात की अवधि में राष्ट्रपति अनुच्छेद-19 के अंतर्गत प्रदत्त स्वतंत्रताओं पर रोक लगा सकता है और साथ ही साथ संवैधानिक उपचारों के अधिकारों को भी निलंबित कर सकता है।

    42वां संविधान संशोधन और आपात व्यवस्था:-  42वें संविधान संशोधन से राष्ट्रपति को यह अधिकार प्राप्त हो गया कि वह देश के किसी एक भाग अथवा पूरे देश में आपात की उद्घोषणा कर सकता है।

    42वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद-356 (4) में संशोधन किया गया। ध्यातव्य है कि उक्त अनुच्छेदका संबंध किसी भी राज्य में संवैधानिक तंत्र के विफल होने की स्थिति में राष्ट्रपति शासन लागू करने से संबंधित है।

    किसी भी राज्य में संसद की स्वीकृति के बाद राष्ट्रपति शासन 6 माह तक प्रवर्तन में रह सकता है तथा उसके पश्चात् पुनः संसद की स्वीकृति मिलने पर 6 माह के लिए बढ़ाया जा सकता है।

    इस प्रकार राज्यों में अधिक-से-अधिक 3 वर्ष तक आपात स्थिति बढ़ाई जा सकती है। 42वें संविधान संशोधन में यह व्यवस्था की गई थी कि संसद की स्वीकृति पाकर राष्ट्रपति शासन की घोषणा की तिथि से 1 वर्ष तक लागू रहेगा और पुनः संसद की स्वीकृति मिलने पर 1 वर्ष से अधिक अवधि तक बढ़ाया जा सकता है, परंतु किसी भी स्थिति में तीन वर्ष से अधिक अवधि तक राष्ट्रपति शासन नहीं लागू रह सकता है।

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