राजनीतिक सिद्धांत क्या है

    प्रश्नकर्ता mayank
    Participant
Viewing 1 replies (of 1 total)
  • उत्तर
    उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
    Moderator

    राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ समझने से पहले सिद्धांत शब्द को समझना अनिवार्य बन जाता है। सिद्धांत (Theory) शब्द की उत्पत्ति थ्योरिया (Theoria) से हुई है, जिसका अभिप्राय मनन की अवस्था में समझने या ग्रहण करने के लिए गंभीरतापूर्वक सोच-विचार करना है।

    अरनोल्ड बॅच के अनुसार सिद्धांत शब्द की व्यापक एवं संकीर्ण व्याख्या हो सकती है। व्यापक अर्थों में सिद्धांत का अर्थ किसी विचारक के समस्त विचार, जिसमें तथ्यों का वर्णन, व्याख्या, विचारक का इतिहास बोध, उसके मूल्य और उसके उद्देश्य, नीतियां तथा मूल तत्वों से संबंधित दूसरे सभी तत्व शामिल हैं। संकीर्ण अर्थ में सिद्धांत विचारों की व्याख्या है।

    राजनीतिक सिद्धांत का संबंध राजनीति से है, किसी विषय के विज्ञान या दर्शन से है, जो कि ‘राजनीतिक है’।

    राजनीतिक सिद्धांत की कुछ परिभाषाएं निम्न हैं:-

    1. “व्यापक तौर पर राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ उन सब बातों से है जो कि राजनीति से संबंधित या प्रासंगिक है और संकीर्ण दृष्टि से इसका अर्थ राजनीतिक समस्याओं की विधिवत छानबीन से है।” -सेबाइन

    2. “राजनीतिक-सिद्धांत राजनीति की विषय-वस्तु की व्याख्या है, राजनीतिक विश्व को समझने के लिए एक वैचारिक ढांचा है, संदर्भो की व्यवस्था है, जिसके बिना हम किसी घटना को यह भी नहीं कह पाएंगे कि वह राजनैतिक थी या नहीं, यह क्यों घटित हुई अथवा अच्छी थी या बुरी और न ही इस बात का कोई अनुमान कर पाएंगे कि अब आगे क्या होने की संभावना है।” -बल्हम

    3. “राजनीतिक सिद्धांत एक ओर बिना किसी पक्षपात के अच्छे राज्य तथा समाज की तलाश है तो दूसरी ओर राजनीतिक एवं सामाजिक वास्तविकताओं की पक्षपात-रहित जानकारी की तलाश है।” -एण्ड्रयू हैक्कर

    4. “राजनीतिक सिद्धांत, राजनैतिक जीवन विषयक अवधारणाओं और सामान्य सिद्धांतों का बुना हुआ एक जाल है, जिसमें हम सरकार, राज्य और समाज की मुख्य विशेषताओं, उनकी प्रकृति व उद्देश्य से संबंधित विचारों, मान्यताओं व वक्तव्यों तथा मनुष्य के राजनैतिक सामर्थ्य का अध्ययन करते हैं।” -डेविड हैल्ड

    राजनीतिक सिद्धांत के विकास में तीन प्रमुख धाराएं स्पष्टतः दिखायी पड़ती हैं:

    (i) प्राचीन राजनीतिक सिद्धांत

    (ii) आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत

    (iii) समकालीन राजनीतिक सिद्धांत

    (1) प्राचीन राजनीतिक सिद्धांत :- हमारा यह त्रिपक्षीय वर्गीकरण वस्तुतः विषय-वस्तु पर आधारित है। प्राचीन अथवा परम्परागत और आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत की विभाजन रेखा वैज्ञानिक तत्व है। प्राचीन राजनीतिक सिद्धांत में दर्शन का बोलबाला है तो आधुनिक सिद्धांत पर विज्ञान छाया हुआ है लेकिन इसके अपवाद भी मिल जायेंगे। पाश्चात्य विश्व के प्रागैतिहासिक और मध्यकाल में सामाजिक जीवन के नियमों के निर्धारण में वैज्ञानिक तत्वों का महत्व बताने वाले अरस्तू और टॉमस एक्वनास हुए हैं तो हमारे समय में स्ट्रॉस मिल जाएंगे जो राजनीति के अध्ययन में दर्शन की उपयोगिता स्वीकार करते हैं। इसी प्रकार आधुनिक और समकालीन राजनीतिक-सिद्धांतों में भी भेद किया जा सकता है। सभी आधुनिक सिद्धांत समकालिक हों यह आवश्यक नहीं है पर एक समकालिक सिद्धांत सदैव आधुनिक होगा। आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत अनुभव सिद्ध और वैज्ञानिक है, जबकि समकालिक सिद्धांत दार्शनिक और ऐतिहासिक भी है। आधुनिक सिद्धांत वर्तमान की चिंता करता है जबकि समकालिक सिद्धांत भविष्य के विषय में भी चिंतन करता है। समकालीन सिद्धांत प्राचीन और आधुनिक सिद्धांतों के मूल तत्वों के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करता है।

    (2) आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत:- आधुनिक राजनीतिक-सिद्धांत में अनेक धाराएं सम्मिलित हैं, जैसे-संस्था-संरचनावाद, वैज्ञानिकवाद, प्रत्यक्षवाद, अनुभववाद, व्यवहारवाद, उत्तर-व्यवहारवाद और यहां तक कि मार्क्सवाद भी। अतः जब हम आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत की बात करते हैं तो हमारा आशय उन सभी धाराओं से है, जो 20वीं शताब्दी के अधिकांश वर्षों पर छाई रही हैं। केवल सातवें-आठवें दशक से ही समकालीन सिद्धांतों का आरम्भ माना जाता है।

    वैचारिक दृष्टि से आधुनिक सिद्धांतों को दो परस्पर विरोधी भागों में बांटा जा सकता है :

    1. उदारवादी, जिसमें व्यक्तिवादी, अभिजात्यवादी, बहुलवादी आदि धाराएं सम्मिलित हैं।

    2. मार्क्सवादी धाराएं

    (i) उदारवादी राजनीतिक सिद्धांत:- आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत की उदारवादी धारा पन्द्रहवीं व सोलहवीं शताब्दी में
    प्रारम्भ हुई थी। अठारहवीं व उन्नसवीं शताब्दी में आधुनिक सिद्धांतकारों ने पारम्परिक राजनीतिक सिद्धांत को तत्कालीन समस्याओं को सुलझा पाने में असमर्थ पाया तथा परम्परागत राजनीतिक सिद्धांत की आदर्शवादिता, इतिहासवादिता और नैतिकता की तीखी आलोचना की। आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत ने महसूस किया कि राजनीति की उलझनों को केवल वैज्ञानिक आधार पर ही सुलझाया जा सकता है। उदारवादी धारा में बहुत सी विचारधाराएं हैं। यह सकारात्मक अनुभववाद से शुरू हुई। इसके बाद व्यवहारवाद और उत्तर व्यवहारवाद आये। मुख्य तौर पर यह पश्चिमी संसार की विचारधारा थी।

    (ii) मार्क्सवादी सिद्धांत:- आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत के दूसरे छोर पर हम मार्क्सवादी सिद्धांत को पाते हैं। इस सिद्धांत को द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद या वैज्ञानिक समाजवाद भी कहा जाता है यह सभी प्रक्रियाओं के विकासक्रम के सामान्य नियमों के उद्घाटन का दावा करता है। इसका महत्व परस्पर-विरोधी सामाजिक शक्तियों के संघर्ष द्वारा परिवर्तन में झलकता है। इस संघर्ष उत्पादन संबंधों और उत्पादक शक्तियों में एक बेहतर उत्पादन विधा के निर्माण के लिए संघर्ष का रूप लेकर निम्न से उच्चतर स्तर के विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। इनका मानना है कि आदिम साम्यवाद से दास प्रथा फिर सामंतवादी, पूंजीवाद, समाजवाद और अंततः साम्यवाद इसी विकास क्रम की स्वाभाविक अवस्था है। इस रूप में यह सिद्धांत सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के अध्ययन को एक व्यवस्थित वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है तथा इसमें भूतकाल की व्याख्या, वर्तमान की समझ और भविष्य का दर्शन होता है।

    (3) समकालीन राजनीतिक सिद्धांत:- 20वीं शताब्दी के सातवें और आठवें दशक के बाद से राजनीतिशास्त्र के विद्वानों ने हमारे तेजी से बदलते हुए समय में राजनीतिक सिद्धांत के बदलते स्वरूप की आवश्यकता पर बल दिया है। यही कारण है कि आजकल राजनीतिक सिद्धांत में फिर से रुचि बढ़ती जा रही है। इसका एक कारण यह भी है कि व्यवहारवाद और अनुभववाद, जिन्होंने विज्ञान पर बहुत अधिक बल दिया, हमें वास्तविकताओं के करीब न ला सकें और विश्व के काफी हिस्सों में मार्क्सवादी व्यवस्था की विफलता से भी पुनर्चिन्तन को बढ़ावा दिया। इसीलिए यह महसूस किया जा रहा है कि राजनीतिशास्त्र न केवल दर्शन से कुछ अधिक है बल्कि यह विज्ञान से भी कुछ अधिक विस्तृत है। दर्शन पर अति-निर्भरता इसे अप्रासांगिक बना देती है तो विज्ञान पर अधिक निर्भरता इसे हमारे उद्देश्यों से दूर ले जाती है क्योंकि राजनीतिक सिद्धांत का उद्देश्य अतीत के अनुभवों के आधार पर वर्तमान की संरचना करना है। हम अपने अतीत से भागने का प्रयास नहीं कर रहे बल्कि उसके आधार पर भविष्य का निर्माण करने का प्रयास कर रहे हैं।यदि, जैसा कि कहा जाता रहा है, राजनीतिक सिद्धांत का कार्य राजनीतिक घटनाचक्र की समझ प्रदान करना है, तो इसे राजनीति के सिद्धांतों, संकल्पनाओं और संस्थाओं की व्याख्या, अन्वेषण एवं ज्ञान तक ही सीमित रह जाना चाहिए। सामयिक राजनीतिक-सिद्धांत में यही हो रहा है। ब्रायन बेरी (पोलिटिकल आयुमैण्ट) ने राजनीतिक सिद्धांत के महत्व को पुन:स्थापित करने के प्रयास में संस्थाओं और सिद्धांतों के बीच अंतर्सम्बंधों के अध्ययन पर जोर दिया और कहा कि पिछले समय में जो कुछ जैसा रहा है उसे भूलना उचित नहीं होगा। जॉन रॉल्स (ए थ्योरी आफॅ जस्टिस) ने कहा है कि, समकालीन राजनीतिक शास्त्र का एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य है- सत्य की निरंतर खोज। उसका कहना है कि, इस कार्य में वैज्ञानिक अनुभव पर आधारित विधियों का प्रयोग किया जा सकता है। आर. नौज़िक (अनार्की, स्टेट एण्ड यूटोपिया) राजनीतिक सिद्धांत के उद्भव का स्वागत करते हुए ‘न्यूनतम’ राज्य के व्यक्तिवादी सिद्धांत तक पहुंच जाते हैं और उसका विश्वास है कि, समकालीन सिद्धांत पारम्परिक उद्देश्यों और अनुभववादी विधियों का प्रयोग कर अनेकों राजनीतिक समस्याओं को सुलझा सकता है। कुल मिलाकर सहमति इस बात के पक्ष में बन रही है कि अनुभववादी विश्लेषण, विश्लेषण और तर्क तथा नैतिकता पर आधारित विचार राजनीतिक सिद्धांत में एक साथ हो सकते हैं।

Viewing 1 replies (of 1 total)
  • इस प्रश्न पर अपना उत्तर देने के लिए कृपया logged in कीजिये