मुगल साम्राज्य के पतन के कारणों की विवेचना करें

    प्रश्नकर्ता sashi
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    उत्तरकर्ता Teekam
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    अपनी आन्तरिक दुर्बलताओं तथा बाह्य कारणों के कारण धीरे-धीरे मुगल साम्राज्य का पतन हो गया | कारणों की विवेचना निम्नांकित है |

    जाटों का विद्रोहः आधुनिक भारत में जाटों द्वारा मुगलों की सत्ता की अवज्ञा तथा उनका विद्रोह सतत रुप से समय-समय में चलता रहा। औरंगजेब के शासनकाल में यह विद्रोह 1669 ई. में मथुरा के जाटों व 1680 ई. में राजराय तथा उसके भतीजे चूड़ामल के नेतृत्व में हुआ। समय-समय पर जाटों द्धारा होने वाले इन विद्रोहों के कारण मुगलों की शक्ति क्षीण हुई।

    सिक्खों का विद्रोहः 1675 ई. में औरंगजेब द्धारा गुरु तेग बहादुर को प्राणदण्ड दिए जाने के बाद, मुगलों के खिलाफ सिक्खों के विद्रोह झेलना पड़ा। जहाँगीर के शासन के दौरान और उसके बाद के समयों में सिक्खों और मुगलों के मध्य होने वाला बारंबार संघर्ष आँधी में उड़ता हुआ कोई सुखा पत्ता नहीं था वरन् आने वाले विप्लव का संकेत था।

    बुंदेलों का विद्रोहः हालांकि मुगलों ने समय-समय पर बुंदेलों को हराया लेकिन बुंदेले बार बार अपनी सेना व ताकत को एकत्रित करके मुगलों के समक्ष अपने विद्रोहीपन का भाव प्रकट करते रहे जिससे मुगलों की शक्ति समय-समय पर क्षीण होती रही।

    सतनामी विद्रोहः उनका विद्रोह वास्तव में सन् 1672 में ग्रामीण असंतोष के रुप में आरम्भ हुआ। सतनामियों ने मुगलों की शाही सेना को पराजित करके नारनोल और बेरात पर कब्जा कर लिया। मासीर-ए-आलमगीरी के लेखक के अनुसार युद्ध की आवश्यक सामग्री की कमी होते हुए भी उन्होंने महाभारत की महान लड़ाई का सा दृश्य प्रस्तुत किया।

    औरंगजेब की धार्मिक नीतिः सर जदुनाथ सरकार ने औरंगजेब की हिन्दु विरोधी धार्मिक नीति को भी मुगल साम्राज्य के पतन का कारण बताया है। उनके विचार में तास्सुब ने हिन्दुओं में प्रतिशोध की भावना को जगाया जिसके फलस्वरुप वह एकता मिट्टी में मिल गई जिसे उसके पूर्वजों ने कठिन परिश्रम से अर्जित किया था। औरंगजेब के काल से मुगल साम्राज्य का पतन का चिन्ह दिखने लगा था। औरंगजेब की धर्मान्धता की नीति के कारण सिक्खों, जाटों, बुन्देलों, राजपूतों एवं मराठों ने विद्रोह किए। जजिया पुन: लागू करने तथा अन्य सामाजिक अपमानों के कारण सतनामी, बुन्देलों तथा जाटों ने विद्रोह किए।

    औरंगजेब की दक्षिण की मूर्खतापूर्ण नीति जो 25 वर्षों तक चलती रही, के कारण राज्य के समस्त साधनों पर इतना बोझ पड़ा कि धन, सेना इत्यादि का नाश हुआ।

    औरंगजेब के अयोग्य उत्तराधिकारीः औरंगजेब के उत्तराधिकारी दुर्बल एवं नैतिक रुप से पतित थे। बहादुरशाह की उपाधि शाहे बेखबर थी। जहांदारशाह लम्पट मूर्ख था फर्रुखशियर घृणित कायर था, मुहम्मदशाह की प्रशासन के प्रति उदासीनता थी।

    शासक वर्ग की ऐयाशीः पुराने इतिहासकारों का ख्याल है कि मुगल साम्राज्य एक केन्द्रीय सत्ता के अंर्तगत था और उसका शासन सिर्फ एक व्यक्ति और उसके सहायकों पर निर्भर था। यह उस समय बर्बाद हुआ जब सम्राट और उमरा वर्ग का व्यक्तिगत जीवन ऐशो आराम में डूब गया। जवानी और शराब के नशे ने शासकों को अंधा कर दिया। वे अपने कर्तव्यों को भूल गए और सारा शासन डाँवाँडोल हो गया।

    जागीरदारी संकटः प्रो. सतीशचन्द्र और प्रो. इरफान हबीब ने अपने महत्वपूर्ण अनुसंधान के जरिए मुगल शासन पद्धति की बहुत नजदीक से जाँच कर विभिन्न दृष्टिकोणों से इसकी कमियों पर प्रकाश डाला है। सतीशचन्द्र ने इस पतन की जिम्मेदारी मनसब और जागीरदारी प्रणालियों की असफलता पर डाली है, क्योंकि उनकी दृष्टि में मुगल साम्राज्य की स्थिरता के लिए इन दोनों प्रणालियों का स्पष्ट ढंग से कार्य करते रहना आवश्यक था।

    दरबार में गुटबन्दीः औरंगजेब के अन्तिम दिनों में दरबार में उमरा प्रभावशाली गुटों में बँट गए थे। मुगल दरबार में तूरानी, अफगानी, ईरानी एवं हिन्दुस्तानी गुट विशेष रुप से सक्रिय थे। तूरानी दल में निजामुलमुल्क, अमीन खाँ और इसहाक खाँ शामिल थे। अफगानी दल में अली मुहम्मद खाँ तथा मुहम्मद खाँ बंगश प्रमुख थे। हिन्दु दल के प्रमुख सैयद बन्धु थे।

    प्रत्येक गुट का प्रयत्न यह था कि सम्राट के कान भरें और सम्राट को दूसरे दल के विरुद्ध कर दें। विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध भी ये दल एक नहीं होते थे प्राय: आक्रान्तओं से मिलकर षड्यंत्र रचते थे।

    उत्तराधिकार का त्रुटिपूर्ण नियमः मुगलों में उत्तराधिकार का कोई नियम नहीं था। अत: उत्तराधिकार का फैसला मुख्यत: तलवारों के बल पर ही होता था। प्रसिद्ध लेखक अर्कीन के शब्दों में, तलवार ही अधिकार की निर्णायक थी और प्रत्येक पुत्र अपने भाइयों के विरुद्ध अपना भाग्य अजमाने को उद्यत रहता था। औरंगजेब की मृत्यु के बाद तो यह लगभग विस्मृति के गर्त में चला गया। 1718-1719 ई. के बीच निर्गमतापूर्वक एक ही वर्ष में करीब 4 बादशाहों का कत्ल कर दिया गया।

    आर्थिक दिवालाः आर्थिक वित्तीय परिस्थितियों की बिगड़ती हुई स्थिति ने मुगल साम्राज्य को खोखला कर दिया। औरंगजेब के दक्षिण के दीर्घकालीन युद्धों ने न केवल कोष सी रिक्त कर दिया, अपितु देश के व्यापार उद्योग का भी नाश कर दिया।

    नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली के आक्रमणः इन विदेशी आक्रमणों ने मरणासन्न मुगल साम्राज्य को अत्यधिक आघात पहुँचाया। कोष रिक्त हो गया और सैनिक दुर्बलता स्पष्ट हो गई। इन दोनों विदेशी आक्रमणों ने तो जैसे मुगल साम्राज्य के ताबूत में अन्तिम कील ठोकने का कार्य किया।

    मराठों का उत्थानः मुगल साम्राज्य के पतन में सबसे महत्वपूर्ण बाहरी कारण जो इस साम्राज्य को ले डूबा, वह था पेशवाओं के अधीन मराठों का उत्थान। पेशवाओं ने हिन्दू पद पादशाहों का आदर्श अपने सामने रखा जो मुस्लिम राज्य के क्षय द्वारा ही पूरा किया जा सकता था। एक समय भारत की राजनीति में मराठे ही सबसे शक्तिशाली थे। यद्यपि मराठे भारत में एक स्थायी सरकार बनाने में असफल रहे तो भी उन्होंने मुगल साम्राज्य के विघटन में बहुत योगदान दिया।

    नई हुकूमतों का उदयः मुगल काल के दौरान यूरोपीय कम्पनियों जैसे अंग्रेज, डच, डेन, फ्रांसीसी आदि का प्रवेश भारत में हो चुका था। अन्तत: अंग्रेजों ने भारत में सर्वोच्चता स्थापित करते हुए मुगल सम्राट को अन्तिम रुप से भारत से बाहर खदेड़ दिया।

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