मातृ उद्योग किसे कहा जाता है ?

    प्रश्नकर्ता kunal
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    उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
    Moderator

    मातृ उद्योग अर्थात  ऐसे भारी उद्योग  जो अन्य उद्योगों के निर्माण तथा भारतीय प्रतिरक्षा का आधार बन सकें। मातृ उद्योग कहलाता है

    लोहा तथा इस्पात उद्योग को ‘मातृ उद्योग‘ भी कहा जाता है। सभी भारी, हल्के तथा मध्यम उद्योग लोहा तथा इस्पात उद्योग से निर्मित मशीनरी पर ही निर्भर होते हैं।

    विभिन्न प्रकार के इंजीनियरिंग सामान, उपकरण तथा उपभोक्ता वस्तुओं के निर्माण में लोहा तथा इस्पात की आवश्यकता होती है।

    इस्पात के उत्पादन तथा खपत को ही प्रायः किसी देश के विकास का पैमाना भी माना जाता है। इसी कारण इस उद्योग को ‘मातृ उद्योग‘ भी कहते हैं।

     

    आकार के आधार पर उद्योग उद्योगों को तीन वर्गों में विभक्त किया गया है

    (i) कुटीर या गृह उद्योग

    (ii) लघु या छोटे पैमाने के उद्योग,

    (iii) वृहद् या बड़े पैमाने के उद्योग।

    (i) कुटीर या गृह उद्योग (Cottage or Household Industries)

    प्रशुल्क आयोग के अनुसार, “ये वे उद्योग होते हैं जो अंशत: परिवार के सदस्यों के सहयोग से आंशिक या पूर्वकालिक कार्य के रूप में किये जाते हैं।”
    कुटीर उद्योग शिल्पकारों के मानवीय श्रम से प्रारम्भ होते हैं;

    जैसे-काँस से रस्सी बनाना, मिट्टी से बर्तन बनाना, पशुचारकों द्वारा चमड़े से विभिन्न वस्तुएँ-तम्बू, जूते, थैले आदि बनाना। भारत में ऐसे उद्योग बहुत हैं; जैसे-जुलाहों द्वारा वस्त्र बनाना, चमड़े से ग्रामीण स्तर पर जूते तैयार करना, कुम्हार द्वारा मिट्टी के बर्तन बनाना, रस्सियाँ बनाना, बाँस से टोकरियाँ बनाना, खजूर के पत्तों से  पंखे तैयार करना आदि।

    वस्तुत: कुटीर उद्योग निर्माण की सबसे छोटी इकाई के रूप में कार्यरत मिलते हैं, जिनमें शिल्पकार स्थानीय कच्चे माल तथा साधारण औजारों द्वारा दैनिक उपभोग की वस्तुओं का निर्माण करते हैं।

    पूँजी तथा परिवहन का इन उद्योगों पर कम प्रभाव पड़ता है, क्योंकि इन उद्योगों में पूँजी की कम आवश्यकता होती है तथा तैयार माल का एक बड़ा भाग या तो स्वयं उपभोग कर लिया जाता है या उसे स्थानीय बाजार में विक्रय कर दिया जाता है।

    (ii) लघु या छोटे पैमाने के उद्योग (Small Scale Manufacturing)-

    इस स्तर के उद्योगों में स्थानीय कच्चे माल, अर्द्ध-कुशल श्रमिक तथा शक्ति संचालित मशीनों का प्रयोग होता है। यह उद्योग घर से बाहर लगाए जाते हैं तथा इनमें उत्पादन की तकनीक कुटीर उद्योगों की तुलना में उत्तम होती है।

    छोटे पैमाने के उद्योग स्थानीय लोगों को रोजगार प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे स्थानीय निवासियों की क्रय शक्ति में वृद्धि होती है।

    विश्व में भारत, चीन, इण्डोनेशिया तथा ब्राजील जैसे विकासशील राष्ट्रों में स्थानीय लोगों को रोजगार के अधिक अवसर प्रदान करने के लिए छोटे पैमाने के उद्योगों की स्थापना पर बल प्रदान किया जा रहा है।

    (iii) वहद या बड़े पैमाने के उद्योग (Large Scale Manufacturing)

    वृहद या बड़े पैमाने के उद्योगों की स्थापना मुख्यत: वाष्पचालित मशीनों के आविष्कार के बाद प्रारम्भ हुई। इन शक्ति संचालित यन्त्रों की सहायता से उद्योगों में वृहत् स्तर पर उत्पादन प्रारम्भ हो गया।

    बड़े पैमाने के उद्योगों के लिए विस्तृत बाजार, विभिन्न प्रकार के कच्चे माल, पर्याप्त शक्ति आपूर्ति, कुशल श्रमिक, विकसित तकनीक, अधिक उत्पादन तथा पर्याप्त पूँजी की आवश्यकता होती है।

    प्रारम्भ में इन उद्योगों का विकास ग्रेट ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्वी भाग तथा यूरोपियन देशों में हुआ, लेकिन वर्तमान में इन उद्योगों का विकास विश्व के अधिकांश देशों में मिलता है।

    वृहद् उद्योगों में श्रमिकों अथवा कारीगरों का कार्य प्रधानतः कार्यरत मशीनों की देखभाल करना तथा उत्पादित वस्तुओं के प्रतिमान को बनाये रखने के लिए यंत्रों को एक निश्चित गति से चलाते रहना रह गया है।

    इन उद्योगों में कई प्रकार का कच्चा माल प्रयुक्त होता है। यद्यपि विभिन्न उद्योगों में श्रमिकों एवं शक्ति का अनुपात भिन्न-भिन्न होता है, अधिकाधिक कार्य स्वाचालित यन्त्रों द्वारा करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।

    इनमें अधिक अच्छी किस्म की वस्तुओं का निर्माण होता है तथा इन वस्तुओं की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। उत्पादन विशिष्टीकरण बड़े पैमाने के उद्योगों की सर्वप्रमुख विशेषता है।

     

     

     

     

     

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