भारतीय साहित्यशास्त्र के विकास क्रम का परिचय देते हुए साहित्यशास्त्र के विकास की 5 अवस्थाओं का वर्णन कीजिए ।

    प्रश्नकर्ता Nihal Khan
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    उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
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    भारतीय साहित्य शास्त्र के विकास क्रम का परिचय

    भारतीय साहित्य शास्त्र का आरम्भ सामान्यतः भरत मुनि के नाट्यशास्त्र (लगभग प्रथम शती ईसबी) से माना जाता है।

    आचार्य भरत मुनि ने साहित्यशास्त्र का निम्न शब्दों में वर्णन किया है।

    .मानव द्वारा अपने भावों को अभिव्यक्त करने और उन्हें स्थिरता देने की मावना से साहित्य का जन्म हुआ

    यह कथन अक्षरशः सत्य है। संसार और जीवन को देखकर, उसका अनुभाव करके, उसके प्रति हमारी कुछ न कुछ प्रतिक्रिया होती है। पहले हमको उसका ज्ञान होता है और फिर उसके प्रति आकर्षण या विकर्षण पैदा होता है।

    इस शान के उत्पन्न होते ही हमारा हृदय आन्दोलित हो उठता है। ज्ञान के साथ हमारे भावों का गहरा सम्बन्ध होता है। भावों से प्रेरित होकर हम उन्हीं के अनुकूल कार्य करने लगते है,

    जैसे-मित्र को देखकर उसका स्वागत करना तथा शत्रु को देखकर उसकी उपेक्षा करना अथवा उससे दूर भागना स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है।

    इसी कारण विद्वानों ने मानव भन के मूल में कार्यरत मनोवृत्तियों के तीन रूप माने है:

    (1) ज्ञान

    (2) भावना

    (3) संकल्प।

    परिस्थितियों के अनुसार ही इन मनोवृतियों का स्फुरण होने लगता है। अभिव्यक्ति की भावना ज्ञान से भी होती है। परन्तु उसकी जितनी तीव्रता भावना के क्षेत्र में देखी जाती है उतनी अन्यत्र नहीं।

    अभिव्यक्ति की वही भावना को क्रियाशील बनाती है। यह क्रिया अभिव्यक्ति की यहीं भावना मानय यो क्रियाशील बनाती है। यह क्रिया अभिव्यक्ति का ही रूप है।

    मानव की विभिन्न अभिव्यक्तियों में से विद्वान उसकी शाब्दिक अभिव्यक्ति को ही सबसे अधिक महत्व देते है क्योंकि उसमें स्थायित्व और सामाजिकता अपेक्षाकृत अधिक होती है।

    हम अपनी आत्मा पर पड़ें हुए विभिन्न प्रभावों से उत्पन्न भावों की अभिव्यक्ति चाहते है। यहीं अभिव्ययित्त कहलाती है।

    साहित्य इसी का दूसरा नाम है

    “साहित्य को राजशेखर ने आन्थिक्षिकी थर्धा, वार्ता और दण्ड नीति के अतिरिक्त पाँचवी विधा माना है जो इन चारों विधाओं का सार है।

    धर्म और अर्थ की प्राप्ति इन्हीं विधाओं को मुख्य फल है।

    डा0 गुलाबराय के अनुसार साहित्य शब्द अपने व्यापक अर्थ में सारे वाङ् मय का द्योतक है। वाणी का जितना प्रकार है यह सब साहित्य के अन्तर्गत है।

    आचार्य कुन्तक ने आह्लाद कारक कवि-व्यापार से युक्त रचना में व्यवस्थित शब्द और अर्थ को काव्य माना तथा शब्द और अर्थ की परस्पर समभाव की मनोहर स्थिति को ही साहित्य माना है।

    बाबू जयशंकर प्रसाद के अनुसार : साहित्य आत्मा की अनुभूतियों का नित्य नया रहस्य खोलने में प्रयत्नशील है। क्योंकि आत्मा को मनोमय, वाड्.मय और प्राणमय माना गया है।

    सुश्री महादेवी वर्मा के अनुसार : साहित्य में मनुष्य की बुद्धि और भावना इस प्रकार मिल जाती है जैसे धूपछाही वस्त्रों में दो रंगों के तार, जो अपनी-अपनी भिन्नता के कारण भी अपने रंगों से भिन्न एक तीसरे रंग की सृष्टि करते है।

    हमारी मानसिक वृतियों की ऐसी सामंजस्य पूर्व एकता साहित्य के अतिरिक्त और कही संभव नहीं है। उसके लिये न हमारा अन्तर्जगत त्याज्य है और व बाहय । क्योंकि उसका विषय सम्पूर्ण जीवन है, आशिंक नहीं।

    डा0 नगेन्द्र के अनुसार : आत्माभिव्यक्ति ही यह मूल तत्व है जिसके कारण कोई व्यक्ति साहित्यकार और उसकी कृति साहित्य बन पाती है। इस प्रकार साहित्य शब्द का प्रयोग मुख्यतः धार रूपों में होता है:

    (1) शब्द और अर्थ का सहभाव

    (2) हित कारक रचना

    (3) शान राशि का कोश

    (4) अंग्रेजी के लिटरेचर के पर्याय के रूप में।

    साहित्य शास्त्र के विकास की 5 अवस्थाओं का वर्णन :- 

     साहित्यशास्त्र सम्बन्धी साहित्य का अर्थ भली भांति ज्ञात हो जाता है। इस विवरण के आधार पर साहित्यशास्त्र का विकास सामान्यतः भरत मुनि के नाट्य शास्त्र से माना जाता है।

    आचार्य भरत से लेकर अब तक के साहित्य शास्त्र के विकास को हम सामान्यतः पाँच कालों में विभक्त कर सकते है:

    (1) स्थापना काल – (पाँचवी शती के अन्त तक)

    (2) नव अन्वेषण काल – (छठी शती से ग्यारवहीं शती तक)

    (3) संशोधन काल – (ग्यारहवीं शती से सत्रहवीं शती तक)

    (4) पद्यानुवाद काल – (सत्रहवीं शती से उन्नीसवीं शती तक)

    (5) नवोत्थान काल -(उन्नीसवीं शती के अन्तिम चरण से अब तक)।

     

    (1) स्थापना काल (पाँचवी शती के अन्त तक)– यद्यपि आचार्य भरत से भी पूर्व अनेक आचार्य हो गये होगें परन्तु इस काल के उपलब्ध ग्रन्थों में केवल भरत मुनि के ही नाट्य शास्त्र का नाम आता है। अत: आचार्य भरत को ही भारतीय साहित्य शास्त्र की स्थापना का श्रेय दिया जा सकता है।

    उन्होंने नाट्य कला का सर्वांगीण विवेचन करने के साथ-साथ नाटक सम्बन्धित अन्य कलाओं तथा साहित्य के भी विभिन्न तत्वों पर भी प्रकाश डाला है

    साहित्य शास्त्र में उनकी सबसे बड़ी देन रस सिद्धान्त है। रस सिद्धान्त के अनुसार साहित्य का लक्ष्य पाठक या प्रोता की भावनाओं

    को उदेलित करके उसे आनन्द प्रदान करना है- इसी आनन्द को साहित्य शास्त्रीय शब्दावली – में रस कहते है।

    इसी तथ्य को सूत्र रूप में प्रस्तुत करते हुए आचार्य भरत ने कहा था

    विमावानुभाव व्यानिचारि संयोगाद रस निष्पत्ति

    अर्थात् विभाव अनुभाव एवं व्यभिचारी के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।

    परवर्ती आचार्यो व्याख्याताओं ने इस सूत्र की अपने-अपने दृष्टिकोण से व्याख्या करते हुए रस सिद्धान्त का विकास कई रूपों में किया है।

    भरत मुनि का यह रस सिद्धान्त आज भी महत्वपूर्ण के साथ-साथ प्रचलित एवं मान्य है।

    (2) नव अन्वेषण काल (छठी से ग्यारहवीं शती तक) – भारतीय साहित्य शास्त्र का सर्वतोमुखी विकास इसी काल में हुआ।

    इसी काल में एक और भामह (छठी शती) दण्डी (सातवी शती) वामन (आठवीं शती) आनन्द बल्देनाचार्य (बसवीं शती) जैसे मौलिक चिन्तक उत्पन्न हुए

    जिन्होंने साहित्य के नये-नये तत्वों का अन्वेषण करते हुए अनेक नवीन सिद्धान्तों की स्थापना की तो दूसरी ओर भट्टलोल्लट : (आठवी नवीं शती) शंकुक (नयी शाती) भट्टनायक (नवीं दसवी शती) अभिनवगुप्त (दसवीं, ग्याराष्वी शती) राजशेखर (दसवीं शती) धनअजय (दसवीं शती) महिम भट्ट (10वीं 11वीं शती) और भोजराज (ग्यारहवी शती) जैसे प्रतिभाशाली व्याख्याताओं का आविर्भाव हुआ।

    जिन्होंने पूर्ववर्ती आचार्यों की स्थापनाओं का सूक्ष्म विश्लेषण एवं तीक्ष्ण खंडन

    गण्डन करते हुए भारतीय साहित्य को व्यापक एवं गम्भीर रूप प्रदान किया।

    इस युग की देन को हम मुख्यतः दो भागों में विभक्त कर सकते है:

    (अ) नवीन सिद्धान्तों की स्थापना और (8) नवीन व्याख्याएँ।

    (अ) नवीन सिद्धान्तों की स्थापना : इस युग में साहित्य सम्बन्धी पाँच नये सिद्धान्तों की स्थापना हुई:

    1. अलंकार सम्प्रदाय

    2. रीति सम्प्रदाय

    3. ध्वनि सम्प्रदाय

    4. वक्रोक्ति सम्प्रदाय

    5. औचित्य सम्प्रदाय!

    यद्यपि ये सिद्धान्त पर्याप्त मौलिक है परन्तु इनमें यद्यपि ये सिद्धान्त पर्याप्त मौलिक है परन्तु इनमें से अधिकाश का प्रेरणा स्त्रोत भरत मुनि का नाट्य शास्त्र ही है।

    उपर्युक्त पाँचों सिद्धान्तों में क्रमश: काव्य के पाँच पक्षों पर बल दिया गया है :

    अलंकारः में काव्य शैली को बाह्य साज सज्जा पर

    रीतिः में काव्य के स्वाभाविक गुणों जैसे-शुद्धता, संक्षिप्तता, स्पष्टता, नाद सौन्दर्य आदि पर,

    ध्वनिःमें उसके अर्थ की व्यंग्यात्मकता पर.

    वक्रोक्तिःमें अर्थ की लाक्षणिकता पर और
    औचित्यः में विषय शैली के पारस्परिक संतुलन पर सर्वाधिक बल दिया गया है।

    पारस्परिक प्रतिद्वन्दिता एवं क्षेत्र विस्तार की इस प्रवृत्ति के कारण एक ओर ये सिद्धान्त अनिश्चित, अमर्यादित एवं अप्रामाणिक हो गये तो दूसरी ओर इससे साहित्य शास्त्र भी अव्यवस्थित हो गया।

    (ब) नवीन व्याख्याएँ : इस युग में नवीन सिद्धान्तों के आविष्कार के साथ-साथ परम्परागत मतों की नवीन व्याख्याएँ भी हुई।

    इस क्षेत्र में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य आचार्य भट्टलोल्लट, श्री शंकुक, भट्टनायक तथा अभिनवगुप्त का है। इन्होंने मुख्यतः रस सिद्धान्त की ही नई व्याख्याएँ प्रस्तुत की।

    सभी ने भरत के सूत्र

    विभावनुभाव संचार व्यभिचारि संयोगाद रस निष्पत्ति’ की व्याख्या की।

    इस प्रकार हम देखते है कि इस युग में नवीन सिद्धान्तों की स्थापना एवं पुराने सिद्धान्तों की नयी व्याख्या-इन दोनों ही क्षेत्रों में महत्तवपूर्ण कार्य हुआ।

    वस्तुतः ‘इस युग को हम भारतीय साहित्य शास्त्र का स्वर्ण युग कह सकते है।

    ‘वैसे भी इस युग को भारतीय साहित्यशास्त्र का स्वर्ण युग माना जाता है।

    (3) संशोधन काल (11वीं शती से 17वीं शती तक) :

    इस काल में मम्मट (11वीं, 12वीं शती) रूय्यक (12वीं शती) हेमचन्द्र (12वीं शती) रामचन्द्र गणचन्द (12वीं शती) जयदेव (13वीं शती) विश्वनाथ (13-14वीं शती) भानुदत (13वी 14वी शती) पंडितराज जगन्नाथ (17वीं शती) प्रभूति आचार्य हुए।

    जिन्होने किसी नये सिद्धान्त की स्थापना न करके पूर्व प्रचलित सिद्धान्तों में यत्किंचित संशोधन एवं समन्वय प्रस्तुत किया।

    इनमें प्रायः भौतिकता का अभाव है। इस युग को भारतीय साहित्य शास्त्र की जरा अवस्था की सूचक कहा जा सकता है। .

     

    (4) पद्यानुवाद काल (17वीं से 19वीं शती तक) : इस काल में संस्कृत का स्थान आधुनिक भाषाओं से ले लिया था। अतः भारतीय साहित्य शास्त्र भी अनेक प्रादेशिक भाषाओं में विभक्त हो गया।

    यहाँ हम केवल हिन्दी की दृष्टि से इसे “पद्यानुवाद काल कह सकते है।

    (5) नवोत्थान काल (19वीं शती के अन्तिम चरण से अब तक): इस युग काल को भी हम मुख्यतः तीन भागों में विभक्त कर सकते है:

    . भारतेन्दु द्विवेदी युग (1975 से 1925 तक)

    ख. शुक्ल युग (1926 से 1940 तक)

    . शुक्लोत्तर युग (1941 से आज तक)

    (क) भारतेन्दु युग : प्रथम युग में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, मिश्रबन्धु श्यामसुन्दर दास आदि विद्वान आते है।

    भारतेन्दु जी अपने नाटक ग्रन्थ में नया दृष्टिकोण के साथ प्राचीन एक नदीन के समन्वयक पर बल दिया।

    आगे चलकर विद्वानों ने भारतीय एवं पाश्चात्य काव्य शास्त्र की सामग्री को हिन्दी गद्य में प्रस्तुत किया है।

    यद्यपि इनमें नैतिकता का अभाव है किन्तु इन्होंने रीतिकालीन दृष्टिकोण, परम्परा और शैली को त्याग कर नये दृष्टिकोण और नयी शैली का प्रवर्तन करके स्तुत्य कार्य किया।

    (ख) शुक्ल युग : शुक्ल युग में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के द्वारा परम्परागत साहित्य शास्त्र को नया रूप प्राप्त हुआ।

    उन्होंने आधुनिक युग की परिवर्तित परिस्थितियों को ध्यान में रखकर प्राचीन सिद्धान्तों की निजी दृष्टि से व्याख्या की। इस क्षेत्र में उनकी देन महत्वपूर्ण

    (ग) शुक्लोतर युग : शुक्लोतर युग के साहित्य विद्वानों में डा0 गुलाब राय, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी और डा0 नगेन्द्र के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

    डा० गुलाब राय ने भारतीय एवं पाश्चात्य सिद्धान्तों को सरल एवं सुबोध शैली में प्रस्तुत करके परवर्ती अनुसंधान कर्ताओं का मार्ग प्रशस्त किया।

    डा0 गुलाब राय ने भारतीय एवं पाश्चात्य सिद्धान्तों को सरल एवं सुबोध शैली में प्रस्तुत करके परवर्ती अनुसंधान कर्ताओं का मार्ग प्रशस्त किया।

    आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का मुख्य क्षेत्र ऐतिहासिक एवं व्यावहारिक समीक्षा का है किन्तु इस क्षेत्र में भी उन्होने लेखों में समन्वयात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है।

    आचार्य वाजपेयी का भी क्षेत्र व्यावहारिक समीक्षा का ही है फिर भी उन्होंने उनेक निवन्धों में भारतीय एवं पाश्चात्य साहित्य को निकट लाने का सुकृत्य प्रयास किया। डा0 नगेन्द्र का असली क्षेत्र साहित्य शास्त्र है। इस रूप में उनकी देन तीन रूपों में स्वीकार की जा सकती

    1. एक तो उन्होने परम्परागत भारतीय सिद्धान्तों की नयी व्याख्याएँ प्रस्तुत की जो आ निकता एवं मौलिकता से युक्त है।

    2. इसी प्रकार ध्वनि रीति आदि के क्षेत्र में भी उन्होंने अनेक पूर्व प्रचलित भ्रांतियों का निराकरण किया है। दूसरे उन्होने पाश्चात्य साहित्यशास्त्र को भी विस्तृत व्याख्याओं सहित हिन्दी में प्रस्तुत किया है तथा करवाया है।

    3. तीसरे प्राचीन और नवीन भारतीय और पाश्चात्य तत्वों की पारस्परिक तुलना द्वारा उनके सापेक्ष महत्व का दिग्दर्शन कराया है। वस्तुतः उन्होंने हिन्दी समीक्षा को एक ऐसी व्यापक भूमि प्रदान की है

    जिससे विश्व साहित्य शास्त्र के दो परम हीरो ग्रीक एवं संस्कृत साहित्य शास्त्र का गुम्फन उसमें हो जाता है।

    उपर्युक्त विद्वानों के अतिरिक्त आचार्य बलदेव उपाध्याय, श्री रामदहिन मिश्र, डा0 भगीरथ मिश्र, डा0 गोविन्द त्रिगुणायत, डा0 रामलाल सिंह, डा0 भोलाशंकर व्यास, डा0 प्रेम स्वरूप गुप्त, डा0 आनन्द प्रकाश दीक्षित, डा0 राममूर्ति त्रिपाठी, डा0 गणपतिचन्द्र गुप्त, सत्यदेव चौधरी तथा डा0 विजयपाल सिंह आदि विद्वानों ने भी अपने ग्रन्थों में भारतीय साहित्य शास्त्र के विभिन्न पक्षों एवं सिद्धान्तों का विवेचन आधुनिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है।

    अतः इसमें कोई सन्देह नहीं कि परम्परागत भारतीय साहित्य शास्त्र हिन्दी में आकर और भी अधिक विकसित एवं प्रौढ़ हो गया है। साहित्य विज्ञान के रूप में वह शास्त्रीय रूढ़ियों एवं परम्परागत असंगतियों से युक्त होकर नये रूप में प्रस्तुत हुआ है।

    इस प्रकार भारतीय साहित्यशास्त्र आज अत्यन्त उन्नत एवं विकसित अवस्था में है।’

     

     

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