भारतीय समाज में भ्रष्टाचार की प्रकृति को समझाइये

    प्रश्नकर्ता anshu
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    उत्तरकर्ता maharshi
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    आज दिन-प्रतिदिन समाज में भ्रष्टाचार बढ़ता ही जा रहा है। आज लोक जीवन में भ्रष्टाचार से शायद ही कोई वर्ग बचा हो जिसको जहाँ मौका मिलता है, वह वहीं अपने पद का दुरुपयोग कर रहा है। समाज में प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ-साथ भ्रष्टाचार भी अपने विकराल रूप में लोक जीवन में प्रकट हो रहा है। इसलिए प्रतिदिन ही पारियों द्वारा की जाने वाली मिलावट, काला बाजारी, सटटा बाजार, मैच फिक्सिग, घूसखोरी, डॉक्टरों एवं वकीलों के काले कारनामे, टैक्स चोरी, गैर कानूनी व्यापार आदि के समाचार देखने को मिलते हैं। ये सभी लोक जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार के ही स्वरूप हैं।

    भ्रष्टाचार का अर्थ (Meaning of Corruption)

    भ्रष्टाचार शब्द का प्रयोग बहुत विस्तृत अर्थों में किया जाता है। इनमें राजनीतिक दलों द्वारा किया गया गोल-माल व दल-बदल, ऊँचे अधिकारियों द्वारा की गई अनियमितता, पुलिस के लोगों द्वारा घूस लेने का कार्य, पढ़े-लिखे व्यक्तियों द्वारा कानून तोड़ना आदि सम्मिलित हैं। कभी-कभी भ्रष्टाचार (corruption) शब्द के स्थान पर अनुचित लाभ शब्द का प्रयोग किया जाता है। अनुचित लाभ का अर्थ भ्रष्ट साधनों द्वारा नियमों को तोड़कर लाभ उठाना है, जबकि भ्रष्टाचार इलियट तथा मैरिल के अनुसार, “किसी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष लाभ को प्राप्त करने के लिए जान-बूझकर कर्तव्य का पालन न करना है। भ्रष्टाचार सदैव किसी स्पष्ट अथवा अस्पष्ट लाभ के लिए कानून तथा समाज के विरोध में किया जाने वाला कार्य है।” भ्रष्टाचारी व्यक्ति सहयोग, सेवा कर्तव्य और नियम कानून के प्रति निष्ठा की भावना को तिलांजलि देकर अपने ही स्वार्थों की अधिकतम पूर्ति में लगा रहता है। भ्रष्टाचार की कोई सीमा नहीं है राजनीतिक व सरकारी कर्मचारियों से लेकर व्यापारियों, डॉक्टरों, नौं तथा पुजारियों तक इसका अपना क्षेत्र है।

    भ्रष्टाचार के कारण (Causes of Corruption)
    भ्रष्टाचार के अनेक कारण हो सकते हैं, पर उनमें निम्नलिखित कारण विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं
    (1) आत्म स्वार्थ की पूर्ति-भ्रष्टाचार का सबसे प्रथम व सर्वप्रमुख कारण है आधुनिक भौतिकवादी सभ्यता, जिसने लोगों की अत्यधिक स्वार्थी बना दिया है। प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वार्थों की अधिकतम पूर्ति करता है चाहे वह उचित ढंग से हो अथवा अनुचित ढंग से। यह स्वार्थ-भावना दोनों तरफ भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित करती है। उदाहरणार्थ, एक ठेकेदार सार्वजनिक निर्माण विभाग (पी. डब्ल्यू. डी.) के अधिकारी को घूस इसलिए देता है कि ठेका प्राप्त करने पर ही उसके स्वार्थों की पूर्ति सम्भव होगी और अधिकारी घूस इसलिए लेता है कि उसे बिना परिश्रम धन मिल जाता है और उसकी आर्थिक स्थिति ऊँची हो जाती है।
    (2) नियम कानून के सम्बन्ध में ज्ञान का अभाव भी भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित करता है। आम जनता विशेषकर अनपढ़ जनता को नियम-कानून की वास्तविकताओं का ज्ञान नहीं होता है और उसी अज्ञानता का फायदा वकील, पुलिस, अदालत के अधिकारी, सरकारी दफ्तर के क्लर्क आदि उठाते हैं और लोगों को कानून का दाव-पेंच दिखाकर पैसा ऐंठते हैं।
    (3) कानून की अपनी कमियाँ भी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती हैं। अनेक कानून ऐसे होते हैं जिनसे बचने के अनेक रास्ते हो सकते हैं। इन परिस्थितियों का पूरा-पूरा फायदा कानून से सम्बन्धित लोग लेते हैं और व्यापारी आदि को वे कमियाँ बताकर उनसे पैसा लेते हैं और व्यापारियों को अनुचित लाभ उठाने में मदद करते हैं।

    विभिन्न क्षेत्रो में भ्रष्टाचार:-

    (1) डॉक्टर और भ्रष्टाचार (Doctor and Corruption)-डॉक्टर की एक सामाजिक प्रतिष्ठा होती है। साथ ही रोग-मुक्त कराने वाले तथा इस प्रकार नवजीवन दान देने वाले के रूप में डॉक्टर का लोग सम्मान भी करते हैं और विश्वास भी। इसी सम्मान व विश्वास का दुरुपयोग करने वाले डॉक्टरों का भी नितान्त अभाव समाज में नहीं होता है। सम्पत्ति पाने के लालच में यदि एक व्यक्ति अपने किसी रिश्तेदार को मार डालना चाहता है तो डॉक्टर उसकी मदद कर सकता है और उस रिश्तेदार को धीमे-धीमे काम करने वाले जहर (slow poisoning) दे सकता है या इन्जेक्शन आदि के द्वारा उसे मार सकता है। अवैध भ्रूणहत्या (abortions) में सहायता करना तो कई डॉक्टरों का पेशा होता है। इसके लिए वे सम्बन्धित पक्ष (party) से हजारों रुपये फीस के रूप में लेता है। झूठे प्रमाण-पत्र (certificates) देकर डॉक्टर अपराधी को फाँसी के तख्ते पर जाने से बचा सकता है। शव परीक्षा (postmortem) की रिपोर्ट में वास्तविकता को छुपाकर अपराधी को निरपराध प्रमाणित करने में भी डॉक्टर मदद करते हैं। उसी प्रकार यह प्रमाणित करने के लिए कि घटना घटित होते समय अपराधी घटना स्थल पर था ही नहीं। डॉक्टर उस अपराधी के नाम को अपने क्लीनिक के रजिस्टरों में फर्जी तौर पर लिख लेते हैं कि घटना होने के दो-चार दिन पहले और उस घटना के दो या दस दिन बाद तक वह अपराधी मरीज के रूप में डॉक्टर साहब की क्लीनिक में भर्ती था। इससे भी अपराधी छूट जाता है। इसके अतिरिक्त, शराबियों को तथा निद्राकारी द्रव्या (narcotics) का प्रयोग करने वालों को झूठे तौर पर पर्चा (prescription) लिखकर भी डॉक्टर भ्रष्टाचार करते हैं। मरीज को फाँसने के लिए कुछ डॉक्टर दलालों को भी रखते हैं। उसी प्रकार कुछ डॉक्टरों में आपस में यह समझौता रहता है कि अगर आवश्यकता पड़ी तो वे अपने मरीजों को एक-दूसरे को देंगे। इस समझौते के अनुसार एक डॉक्टर एक मरीज का दो चार दिन तक तो स्वयं इलाज करता है और फिर यह कहता है कि इस रोग की उचित चिकित्सा के लिए किसी एक और डॉक्टर की सलाह की आवश्यकता है। यह अन्य डॉक्टर कौन होगा, इस बात का सुझाव भी वह स्वयं देता है। इस प्रकार मरीज को दोहरी फीस देने को बाध्य कर उसका अधिक-से-अधिक आर्थिक शोषण किया जाता है। इतना ही नहीं, बहुत से ऐसे डॉक्टर होते हैं जो कि पहले तो मरीज को ऐसी दवा देते हैं कि उसे तुरन्त आराम हो जाए और फिर मरीज के अच्छे हो जाने के सम्बन्ध में इस प्रकार विश्वास उत्पन्न करके फिर मर्ज को बहुत धीरे-धीरे ठीक होने देते हैं। कृत्रिम अंग बेचकर धन कमाना तथा कानून के विरुद्ध लिंगनिर्धारण मालूम करके भ्रूण-हत्या करना डॉक्टरों का आज पेशा बन गया है। बड़े-बड़े अस्पतालों में मरीजों से ‘झूठे व अनावश्यक टेस्टों’ के नाम पर लाखों रुपया वसूला जाता है।

    (2) वकील और भ्रष्टाचार (Legal Practitioners and Corruption)-देश में वकील-वर्ग भी भ्रष्टाचार रूपी भयंकर रोग से अछूता नहीं रह गया। वकील या अटार्नी अपने मुवक्किलों की पूँजी का अनुचित प्रयोग (misappropriation) करते हैं, गवाहों से झूठी शहादत दिलवाते हैं और मोटर गाड़ी दुर्घटना का पता लगाकर उसमें फंसे हुए व्यक्तियों से चालबाजी से मुआवजे वसूल कर लेते हैं। यह जानते हुए भी कि एक व्यक्ति वास्तव में अपराधी है, वकील धन के लालच में पड़कर उसे बचाने के लिए कठोर परिश्रम करता है। असली अपराधियों से घूस लेकर अपने मुवक्किलों की ओर से लापरवाह ढंग से अदालत में बहस करने में भी देश के कतिपय वकील हिचकिचाते नहीं हैं। बहुत से वकीलों के तो दलाल होते हैं जो कि मुवक्किलों को न केवल फाँसकर लाते हैं, बल्कि वकील साहब की ओर से उन मुवक्किलों से कई प्रकार के झूठे कारण दिखलाकर पैसे वसूल करते हैं। गांव वालों को इस तरह से फाँसना एवं उनका पर्याप्त आर्थिक शोषण करना तो यहाँ के अनेक वकीलों का सामान्य पेशा बन गया है। इतना ही नहीं, ऐसे भी कुछ वकील होते हैं जो कि अपने मुवक्किलों में यह झूठा प्रचार करते हैं कि जज साहब से उनकी मित्रता है और अगर उन्हें खुश कर दिया गया तो मुकदमे में सफलता अनिवार्य है। इस प्रकार से खुश करने के लिए मुवक्किलों से धन या अन्य चीजें लेकर वकील खुद उसे हड़प जाता है। बड़े-बड़े प्रतिष्ठित वकील जघन्य अपराधियों को छुड़ाने के लिए मोटी रकम ‘फीस’ के रूप में लेते हैं।

    (3) शैक्षिक संस्थाएँ एवं भ्रष्टाचार (Educational Institutions and Corruption)-भ्रष्टाचार के एक और साधन के रूप में अनेक प्राइवेट शिक्षा संस्थानों की प्रबन्धक कमेटी के सेक्रेटरी अध्यक्ष एवं सदस्यों का भी उल्लेखनीय स्थान है। ये लोग स्कूल, कॉलेज की स्थापना पैसा कमाने के लिए करते हैं। लाइब्रेरी के लिए पुस्तकें खरीदने, स्कूल या कॉलेज के लिए भवन निर्माण करने तथा शिक्षकों को वेतन देने के मामलों में इन संस्थाओं के प्रबन्धक कमेटी के सदस्य कितनी बेईमानी करते हैं, इसका कोई ठिकाना नहीं है। महीनों शिक्षकों का वेतन न देना, कम वेतन देकर उन पर अधिक पर हस्ताक्षर करवा लेना तथा अनुचित सेवाएँ लेना तो उन सदस्यों के लिए सामान्य चीजें हैं। किन्हीं-किन्हीं संस्थाओं में तो हजारों रुपयों का गबन तक होता रहता है। शिक्षकों या अध्यापकों की नियुक्ति के सम्बन्ध में इन विद्यामन्दिरों में जितनी धाँधलेबाजी होती है उसका तो कोई लेखा-जोखा ही नहीं। जिस उम्मीदवार का प्रबन्धक कमेटी के सदस्यों से किसी-न-किसी प्रकार का सम्बन्ध होता है, अधिकतर उसी की नियुक्ति होती है। यदि किसी विशेष कारणवश किसी व्यक्ति की नियुक्ति होती है तो उसके लिए बिना किसी सोर्स (source) के अपनी नौकरी चलाते रहना कठिन हो जाता है या प्रबन्धक कमेटी के सदस्यों की चमचेबाजी करनी पड़ती है। ‘प्रवेश’ के नाम पर करोड़ों रुपये वसूले जा रहे हैं।

    (4) धार्मिक संस्थाएँ और भ्रष्टाचार (Religious Institutions and Corruption)-बड़े-बड़े अभिजात अपराधी धर्म के नाम पर बड़े से बड़ा भ्रष्टाचारी कदम उठाने में नहीं हिचकिचाते। तीर्थस्थान पर गए यात्रियों का धर्म के नाम पर ही पण्डों द्वारा भयंकर आर्थिक शोषण किया जाता है। अनेक उदाहरण इस प्रकार के मिले हैं कि व्यक्ति को डराया गया कि यदि वह अमुक वस्तु दान में नहीं देगा तो उसका पुत्र कल मर जायेगा। जिन्दा जानवरों, यहाँ तक कि व्यक्तियों को जलाकर, काटकर बलिदान करने की घटनाएँ आज भी मिलती हैं। इतना ही नहीं, माँ-बहू-बेटियों की इज्जत भी इन्हीं धार्मिक स्थानों पर धर्म की आड़ लेकर लूटी जाती है जो कि सम्पूर्ण मानव जाति के लिए गहरा धब्बा एवं शर्मनाक बात है। इसी प्रकार अन्य अनेक तरीकों से धर्म की आड़ में भ्रष्टाचार और व्यभिचार होता रहता है। देवदासी प्रथा इसी प्रकार के भ्रष्टाचार का एक नमूना है। गलत’बैनर’ के नाम पर चन्दा इकट्ठा करना भी आज आम बात है। तथाकथित प्रख्यात सन्त आसाराम बापू का यौन व्यभिचार’ काण्ड में फँसना इसका एक ताजा उदाहरण है।

    (5) राजनीति और भ्रष्टाचार (Politics and Corruption)-राजनीति में भी हमें कम भ्रष्टाचार देखने को नहीं मिलता। राजनीति देश के लिए लाभदायक सिद्ध होने के बजाय हानिकारक सिद्ध हो रही है। आज राजनीति लड़ाई-झगड़े, दंगा-फसाद एवं व्यक्तिगत लाभों का एक साधन-मात्र बन गई है। राजनीति में आज चरित्र नाम की कोई वस्तु नहीं है। अदातल द्वारा सजा याफ्ता दागी सांसदों और विधायकों को भी सरकार अब कानून बनाकर बचाने का प्रयास कर रही है।

    इस बात से सभी सहमत होंगे कि वर्तमान समय में राजनीतिक नेताओं का चरित्र स्तर गिर रहा है। केवल पद के लालच में वे किसी भी समय किसी भी राजनीतिक दल के सदस्य होने में नहीं हिचकिचाते। कुछ व्यक्ति या विधायक तो केवल इस कारण निर्दलीय बने रहते हैं कि जैसे ही कोई दल सत्तारूढ़ होगा, उसी की सदस्यता वे स्वीकार करेंगे, ताकि उन्हें भी कोई अच्छा-सा पद प्राप्त हो जाए और धन कमाने का मौका मिल जाए। आजकल दल बदलने की प्रवृत्ति राजनीतिक भ्रष्टाचार का एक सामान्य लक्षण बन गई है। मिनिस्टर, संसद सदस्य आदि द्वारा भ्रष्टाचार का सामान्य रूप यह है कि वह अनुचित संरक्षण कुछ विशिष्ट लोगों को देते हैं और उसका उद्देश्य चुनाव के समय अधिक-से-अधिक वोट प्राप्त करना होता है। नौकरियाँ, लाइसेन्स, परमिट आदि जो कुछ भी वे देते हैं उसकी एवज में वे अधिक-से-अधिक वोट दिलवाने का वादा करवा लेते हैं। बड़े-बड़े उद्योगों को स्थापित करने का लाइसेन्स या कई प्रकार की चीजों को खरीदने का परमिट दिया जाना, विधायक व सांसद निधि का दुरुपयोग अथवा उच्च पदों पर अपने ही भाई-भतीजों या साला-बहनोई की नियुक्ति होना राजनीतिक जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार के कुछ तुच्छ उदाहरण हैं। आम चुनावों में करोड़ों रुपये खर्च करना किस बात का संकेत करता है?

    (6) इलेक्ट्रोनिक मीडिया और भ्रष्टाचार (Electronic Media and Corruption)-वर्तमान समय में व्यावसायिक मनोरंजन, सिनेमा, केबल नेटवर्क द्वारा जो मनोरंजन परोसा जा रहा है वह निश्चित रूप से भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है। अपराध करने की विधि को इस तरह दिखाया जाता है कि कई बार आम व्यक्ति उसकी ओर आकर्षित हो जाता है। कम्प्यूटर और इंटरनेट ने भी इस काम में वृद्धि की है। इंटरनेट द्वारा आज कई अश्लील सन्देश एक स्थान से दूसरे स्थान को भेजे जा रहे हैं। युवकों एवं किशोरों द्वारा कम्प्यूटर बाजार से आज ऐसी सी. डी. खूब खरीदी जा रही हैं जिनमें यौन सम्बन्धों को नग्न अवस्था में दिखाया जा रहा है जिससे आज 15-16 वर्ष के लड़के भी वेश्यागामी बन रहे हैं। इस प्रकार के साहित्य एवं मीडिया प्रचार पर रोक लगानी चाहिए जो किशोरावस्था से ही बालकों को अपराधिक प्रवृत्ति की ओर धकेल रहे हैं और उनका मानसिक सन्तुलन अस्थिर कर रहे हैं। मीडिया स्वयं में आज भयंकर भ्रष्टाचार की चपेट में है।

    भ्रष्टाचार के निराकरण के उपाय व सुझाव (Measures and Suggestions for Eradicating Corruption)

    भ्रष्टाचार की समस्या वास्तव में एक गम्भीर समस्या है और इसके लिए बहुत से कारण जिम्मेदार हैं। अत: इसके निराकरण के लिए भी बहुमुखी प्रयत्नों की आवश्यकता है। कुछ उपाय व सुझावों को हम इस प्रकार से प्रस्तुत कर सकते हैं

    (1) राजनीतिज्ञों के नैतिक स्तर में सुधार भ्रष्टाचार के निवारण के लिए नैतिक रूप से गिरे राजनीतिज्ञों द्वारा संचालित सरकार प्रायः ऐसे कानून बनाती है जिनसे उनकी पार्टी को या उन्हें समर्थन देने वाले कुछ विशेष समूहों-व्यापारी या उद्योगपतियों को ही लाभ हो। संलीवन ने लिखा है, “वास्तव में संगठित अपराध बिना भ्रष्ट राजनीतिज्ञों के प्रोत्साहन के जिन्दा नहीं रह सकता।” इसके साथ ही उनको भ्रष्ट पुलिस का वरदहस्त प्राप्त होना भी आवश्यक है कि राजनीतिज्ञों का नैतिक स्तर ऊँचा हो और वे अपने जीवन में अधिक ईमानदारी अपनाएँ।

    (2) पुलिस अधिकारियों में ईमानदारी भी एक आवश्यक शर्त है। पुलिस का वास्तविक डर अगर लोगों के दिल में है तो अधिकांश भ्रष्टाचार स्वत: ही समाप्त हो जायेगा। पर लोगों को विश्वास होता है कि कोई अपराध करके पुलिस के पंजे से सिफारिश या घूस के आधार पर छूटा जा सकता है। इससे समाज में भ्रष्टाचार खुले तौर पर फैलता है। अत: पुलिस को ईमानदार होना ही पड़ेगा।

    (3) अन्य प्रमुख सरकारी अधिकारियों में भी ईमानदारी व कर्त्तव्यपरायणता के गुण को विकसित करना होगा। इन अधिकारियों में आय-कर, बिक्री-कर, आबकारी व कस्टम अधिकारी, सार्वजनिक निर्माण विभाग अधिकारी और रेलवे अधिकारी (टिकट चेकर) आदि सम्मिलित हैं जिनका सीधा सम्बन्ध सरकार की आय के साधनों और रुपये-पैसे से है। इन अधिकारियों में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए यह आवश्यक है कि भ्रष्टाचार निरोध विभाग (Anticorruption Department) तथा सी. आई. डी. विभाग के अधिकारी स्वयं भ्रष्टाचार से दूर रहें और घूस या सिफारिश से प्रभावित होकर भ्रष्टाचारी अधिकारियों को न छोड़ें।

    (4) अदालत में व्याप्त भ्रष्टाचार को भी हमें पहले दूर करना होगा। अदालत न्याय करने की संस्था है, वहीं जब अन्याय व भ्रष्टाचार फैला होता है तो समाज में भी भ्रष्टाचार का बोलबाला होता है। अत: यह आवश्यक है कि न्यायाधीश वर्ग को पक्षपातविहीन और किसी भी राजनीतिक दबाव व सिफारिशों से स्वतन्त्र होना चाहिए।

    (5) भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रचार भी इस दिशा में सहायक सिद्ध हो सकता है। सक्रिय प्रचार के द्वारा ही लोगों में यह भावना भरी जा सकती है कि भ्रष्ट उपाय समाज-विरोधी ही नहीं, स्वयं व्यक्ति-विरोधी भी हैं। प्रचार के रूप में समाचार-पत्र, पत्रिका, चलचित्र आदि की सहायता ली जा सकती है।

    (6) कानून का सरलीकरण भी भ्रष्टाचार को दूर करने का एक आवश्यक उपाय है। कानून की जटिलता को न समझ सकने के कारण ही बहुत से लोग सरकारी कर्मचारियों व वकील आदि के चक्कर में पड़ जाते हैं और अपना काम करवाने के लिए घूस आदि देते हैं। अत: यह आवश्यक है कि कानून ऐसा हो कि सबकी समझमें आ जाए।
    (7) फर्जी विज्ञापन पर सरकारी रोक लगाने से भी अनेक भ्रष्टाचार कम हो सकेंगे। नौकरी खाली है, का फर्जी विज्ञापन देकर बहुत से लोग फार्म व परीक्षा की फीस हजारों लोगों से इकट्ठी करते हैं, दस रुपये में रेडियो बेचने का विज्ञापन देकर लोग प्लास्टिक का खिलौना-रेडियो बेचकर लोगों को धोखा देते हैं। अत: इसी प्रकार के हजारों किस्म के फजी विज्ञापन देने और गलत काम करने वालों के लिए कड़ी सजा की व्यवस्था करनी होगी। तभी इस प्रकार के भ्रष्टाचार का उन्मूलन सम्भव होगा।

    (8) भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर नियम बनाना और उसे कठोरता से लागू करना भी भ्रष्टाचार को कम करने के लिए आवश्यक है। यह कानून अमीर-गरीब पर समान रूप से लागू किया जाए और उच्च सामाजिक स्थिति, धन, पद या सिफारिश को किसी भी प्रकार की मान्यता न देकर प्रत्येक भ्रष्ट व्यक्ति के लिए कठोर दण्ड की व्यवस्था करनी होगी। यदि यह पता चल जाए कि किसी व्यक्ति ने अपने उच्च पद, धन, सामाजिक मर्यादा आदि की आड़ लेकर भ्रष्टाचार को अपनाया है या भ्रष्टाचार को संरक्षण प्रदान किया है तो उसके लिए कठोरतम दण्ड की व्यवस्था होनी चाहिए, तभी भ्रष्टाचार की बुराई का अन्त सम्भव हो सकता है। समाज सेवी ‘ अन्ना हजारे’ ने इसी उद्देश्यसे ‘जन-लोकपाल’ बनाने के लिए एक आन्दोलन छेडा था. लेकिन उसमें अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई।

    (9) भ्रष्टाचार के वास्तविक उन्मूलन में जनसहयोग सबसे अधिक आवश्यक है। अन्ना हजारे और स्वामी रामदेव ने भ्रष्टाचार-उन्मूलन के लिए सरकार और जनसहयोग दोनों के लिए पिछले कुछ समय से कमर कसी हुई है और वे जन-आन्दोलन चला रहे हैं। देखते हैं, उन्हें कितनी सफलता मिलती है।

    हमारे देश में 1947 में ‘भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम’ बनाया गया था, तब से सरकारी स्तर पर इस बीमारी को रोकने के लिए अनेक उपाय, जिसमें लोकायुक्त व लोकपालों की नियुक्ति, सी. बी. आई., सी. बी. सी. का गठन, विशेष न्यायालयों का गठन, विभिन्न विभागों में भ्रष्टाचार विरोधी विभागों’ का गठन आदि शामिल हैं। लेकिन हमें यह स्वीकार करना होगा कि सरकार अकेले भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगा सकती। अगर हमारा समाज येन-केन प्रकारेण हासिल किये गये धन को वैधता देता रहेगा. तो भ्रष्ट लोग लगातार सम्मान पाते रहेंगे। राजनेताओं, नौकरशाहों, जजों, कारपोरेट प्रमुखों, मीडिया से जुड़े लोगों, रक्षा अधिकारियों, इंजीनियरों, डॉक्टरों, खेल-आयोजकों आदि पर आरोप लगाना आसान है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि वे सभी इसी समाज से आते हैं। इसलिए जब तक हम पूरे समाज को साफ नहीं करते,सफल नहीं होंगे। यह लड़ाई घर और स्कूल के स्तर पर शुरू करनी होगी, जहाँ आने वाली पीढ़ी जीवन का पहला पाठ पढ़ती है। क्या माता-पिता और शिक्षक बच्चों के मन में ईमानदारी, सच्चाई, करुणा, नैतिकता और सादा जीवन-उच्च विचार की भावना बिठाते हैं, शायद नहीं। कक्षा के बाद बच्चों को बॉलीवुड, रियलिटी शो और टी. वी. सीरियलों की खुराक मिलती है, जिनमें मूल्यों, मान्यताओं और रिवाजों-परम्पराओं को विकृत रूप में दिखाया जाता है। बच्चे देखते हैं कि माता-पिता अच्छे स्कूल-कॉलेजों में प्रवेश कराने के लिए संघर्ष करते हैं या डोनेशन देते हैं। वयस्क होने पर वे अपने माता-पिता को दहेज माँगते और नौकरी के लिए घूस देते देखते हैं। प्रख्यात पत्रकार श्री विनीत नारायण के अनुसार, “जो लोग भ्रष्टाचार को लेकर आये दिन टी. वी. चैनलों पर हंगामा करते हैं या आक्रामक बहस करते दिखते हैं, वे खुद के और अपने संगी-साथियों के अनैतिक कृत्यों को ढंकने की भरपूर कोशिश भी करते हैं। ऐसे विरोधाभासों के बीच हमारा समाज चल रहा है। जो मानते हैं कि धरनों और आन्दोलनों से देश की फिज़ा बदल देंगे, उनके भी किरदार सामने आ जायेंगे, जब वह अपनी बात मनवाकर भी भ्रष्टाचार को कम नहीं कर पायेंगे, रोकना तो दूर की बात है। फिर क्यों न भ्रष्टाचार के सवाल पर आरोप-प्रत्यारोप की फुटबाल को छोड़कर प्रभावी समाधान की दिशा में सोचा जाये, जिससे धनवान धन का भोग तो करे, पर सामाजिक सरोकार के साथ और जनता को अपने जीवन से भ्रष्टाचार दूर करने के लिए प्रेरित किया जाये, ताकि हुक्मरान भी सुधरें और जनता का भी सुधार हो।”।

    भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए ईमानदारी को पुरस्कृत करना सबसे अधिक आवश्यक है। भ्रष्टाचार इतना अनियन्त्रित है कि ईमानदार लोग अपने को उपेक्षित महसूस करते हैं। इसलिए ईमानदार व्यक्ति अगर असुविधाजनक सवाल भी करते हैं तो हमें उनका समर्थन करना चाहिए। बड़ा सवाल है कि क्या हममें भ्रष्टाचार को समाप्त करने की इच्छाशक्ति है?

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