बस्तर दशहरा के आयोजन की कुल अवधि कितने दिन की होती है ?

    प्रश्नकर्ता rameshwar
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    उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
    Moderator

    बस्तर दशहरा के आयोजन की कुल अवधि निरन्तर 75 दिनो तक चलता है।

    बस्तर का ‘ऐतिहासिक दशहरा‘ बस्तर का पारम्परिक दशहरा पूरे विश्व में अपने तरह का विशिष्ट आयोजन है. विश्व के प्रत्येक कोने में दशहरा का त्यौहार ‘असत्य पर सत्य की विजय’ का प्रतीकात्मक त्यौहार है, जिसे विजय पर्व भी कहा जाता है.

    लेकिन बस्तर का दशहरा पर्व यहाँ के राजघराने की अधिष्ठात्री कुल देवी तथा आदिवासियों की आराध्य देवी माँ दन्तेश्वरी को केन्द्र मानकर मनाया जाता है..

    उत्पत्ति-एक जनश्रुति के अनुसार-बस्तर के चौथे ‘काकतीय नरेश पुरुषोत्तम देव’ के समय राजा ने स्वयं भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए चित्रकोट’ से ‘जगन्नाथपुरी’ की यात्रा पैदल चलकर की थी

    जिससे प्रसन्न होकर भगवान जगन्नाथ जी ने मंदिर के पुजारी के स्वप्न में राजा पुरुषोत्तम देव को रखपति’ की उपाधि प्रदान की तथा राजा की भक्ति भावना से प्रसन्न होकर भगवान जगन्नाथ जी ने ‘माँ सुभद्रा देवी‘ का रथ राजा पुरुषोत्तम देव को भेंट स्वरूप प्रदान किया.

    उसी समय से ही ‘लहुरा गजपति’ की उपाधि बस्तर राजवंश में प्रशस्ति के साथ जुड़ गई. ‘रथ’ के 16-चक्के थे, जिसे माँ दन्तेश्वरी की आज्ञानुसार दो भागों में बाँट दिया गया.

    जिसमें चार चक्के वाला ‘फूल रथ‘ तथा बारह चक्के वाल ‘विजय रथ‘ के नाम से प्रतिवर्ष दशहरा से समय उपयोग किया जाता है, जब राजा पुरी धाम से अपनी राजधानी ‘चक्रकोट’ (प्राचीन बस्तर) लौटे, तभी से ‘गोंचा पर्व’ (रथयात्रा) तथा ‘दशहरा पर्व’ में रथ चलाने की परम्परा प्रारम्भ हुई.

    दशहरा पर्व का प्रारम्भ पाठ जात्रा के रूप में ‘हरेली अमावस्या’ से होता है, दशहरा के प्रथम दिन माँ दन्तेश्वरी को महिषासुर रूप भैंसा अथवा बकरे की बलि देकर पर्व का शुभारंभ किया जाता है.

    रथ निर्माण– प्रथम दिन पारम्परिक दशहरा पर्व में ‘रथ’ के लिए प्रथम लकड़ी समीपवर्ती गाँव ‘पंडरी पानी’ से लाकर राजमहल के सिंहद्वार के पास पूजा अर्चना कर विशाल रथ बनाने का कार्य ‘जाड़ उमरगांव’ के पारम्परिक लोक कलाकारों द्वारा किया जाता है.

    यह परम्परागत पर्व विधि विधानों के मध्य अनेक चरणों काछन गादी, नवरात्रि, जोगी बिठाई, फूल रथचालन, मालवी परधाव (देवी बुलावा, दंतेवाड़ा से जगदलपुर), भीतरी रैनी, बाहरी रैनी, रथ चोरी, गोन्चा (रथ उत्सव), काछिन जात्रा (बारहवें दिन), मुरिया दरबार (काछिन जात्रा) के दिन सायंकाल मुरिया दरबार का आयोजन किया जाता है

    जिसके पश्चात् पर्व का समापन हो जाता है), कुटुम जात्रा अथवा गंगामुड़ा जात्रा अथवा ओहाड़ी पर्व (देवी विदाई, जगदलपुर से दंतेवाड़ा, तेरहवें दिन) आदि में सम्पादित होता है. बस्तर का यह ऐतिहासिक दशहरा विविधताओं से पूर्ण है. इसे देखने न केवल देश के वरन् विदेशी भी पहुंचते हैं.

    इस पर्व के मध्य यहाँ मेले में अनेक शासकीय, गैर-शासकीय प्रदर्शनियाँ आयोजित की जाती है. इस प्रकार यह पर्व सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ व्यवसायिक / आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बन गया है.

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