बंगाल विभाजन के विरुद्ध बंगाल तथा महाराष्ट्र में हुए विरोध प्रदर्शन का वर्णन कीजिए

    प्रश्नकर्ता MD
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    उत्तरकर्ता Rupa Yadav
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    उत्तरकर्ता Quizzer Jivtara
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    स्वदेशी आन्दोलन वास्तव में बंगाल विभाजन के विरोध में एक आन्दोलन के रूप में पैदा हुआ। अंग्रेजी हुकूमत के बंगाल विभाजन के निर्णय से बंगालवासी जितने क्रोधित और क्षुब्ध हुए यह अप्रत्याशित था। इसी के परिणामस्वरूप स्वदेशी आन्दोलन प्रारम्भ हुआ। गरमपंथी विचारधारा को बढ़ावा मिला सांस्कृतिक जीवन पर प्रभाव पड़ा तथा कुछ हद तक साम्प्रदायिकता का भी प्रारम्भ हुआ।

    दिसम्बर 1903 में बंगाल विभाजन के प्रस्ताव की जानकारी सबको मिली। इसका बंगाल में विरोध हुआ। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, कृष्ण कुमार मित्र, पृथ्वीशचंद्र राय व अन्य नेताओं ने विभाजन प्रस्ताव के खिलाफ ‘बंगाली’, ‘हितवादी’ तथा ‘संजीवनी’ जैसे अखबारों व पत्रिकाओं के माध्यम से आन्दोलन छेड़ा अंग्रेजी सरकार ने 20 जुलाई, 1905 को बंगाल विभाजन का निर्णय लिया। यह आन्दोलनकारियों और विभाजन विरोधी जनता के मुँह पर तमाचा था 7 अगस्त, 1905 को कलकता के टाउन हाल में एक ऐतिहासिक बैठक में स्वदेशी आन्दोलन की विधिवत घोषणा की गई। 7 अगस्त की बैठक में ऐतिहासिक “बहिष्कार प्रस्ताव पारित हुआ। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी जैसे अनेक नरमपंथी नेता भी देश के दौरे पर निकल गए और स्वदेशी लोगों से मैनचेस्टर के कपड़े और लिवरपूल के नमक के बहिष्कार की अपील करने लगे।

    स्वदेशी आन्दोलन ने जनजागरण के लिए स्वयंसेवी संगठनों की खूब मदद ली। इन संगठनों ने आन्दोलन के लिए जनमत तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अश्विनी कुमार दत्त के नेतृत्व में गठित ‘स्वदेश बांधव समिति’ बंगाल में अपनी शाखाएँ स्थापित कीं। इस समिति ने स्वदेशी स्कूल, स्वदेशी दस्तकारी आदि पर बल दिया। महाराष्ट्र में तिलक ने गणपति महोत्सव और शिवाजी की जयंती के माध्यम से स्वदेशी आन्दोलन को लोकप्रिय बनाया। इन आन्दोलनों ने ‘आत्मनिर्भरता’, ‘आत्मविश्वास’ का नारा दिया। गाँवों के आर्थिक व सामाजिक पुनरुत्थान के लिए गाँवों में रचनात्मक कार्य शुरू करने की आवश्यकता महसूस की गई सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध भी जनमत तैयार करने की जरूरत हुई ।

    टैगोर के शांति निकेतन की तर्ज पर बंगाल नेशनल कॉलेज की स्थापना हुई। अरविन्द घोष इसके प्राचार्य बने शिक्षा का माध्यम वे देशी भाषाएं बनीं जो क्षेत्र विशेष में प्रचलित थीं। तकनीकी शिक्षा के लिए ‘बंगाल इंस्टीट्यूट’ की स्थापना हुई। छात्रों को उच्च शिक्षा हेतु जापान भेजा गया। इसी समय देश में तमाम स्वदेशी कल कारखानें स्थापित होने लगे कपड़ा मिलें, साबुन, माचिस के कारखाने, चर्म उद्योग, बैंक, बीमा कम्पनियाँ अस्तित्व में आईं। आचार्य पी.सी. राय ने बंगाल केमिकल्स फैक्ट्री स्थापित की।

    स्वदेशी आन्दोलन का सबसे अधिक प्रभाव सांस्कृतिक क्षेत्र में पड़ा। यह बंग्ला साहित्य का स्वर्णकाल था। इसी समय अवनीन्द्र नाथ टैगोर ने भारतीय कला पर पाश्चात्य आधिपत्य को तोड़ा और मुगलों, राजपूतों और अजंता की चित्रकला से प्रेरणा लेनी शुरू की। इसी समय नन्दलाल बोस प्रसिद्ध चित्रकार हुए। विज्ञान के क्षेत्र में जगदीश चंद्र बोस, प्रफुल्ल चंद्र राय आदि की उल्लेखनीय सफलताएँ स्वदेशी आन्दोलन को मजबूती प्रदान की।

    स्वदेशी आन्दोलन ने पहली बार समाज के एक बहुत बड़े तबके को अपने दायरे में ले लिया। राष्ट्रीय आन्दोलन का सामाजिक दायरा काफी फैला और इसमें जमींदार, शहरी निम्न मध्यम वर्ग के लोग ” तथा छात्र शरीक हुए, पहली बार औरतें घर से बाहर निकलीं और प्रदर्शन तथा धरने पर बैठने लगीं। यही वह समय था जब पहली बार मजदूर वर्ग की आर्थिक कठिनाइयों को राजनीतिक स्तर पर उठाया गया। उसे राजनीति से जोड़ा गया। स्वदेशी आन्दोलन ने बैठकों, जनसभाओं, यात्राओं, प्रदर्शनों इत्यादि के माध्यम से किसानों के एक बड़े तबके को आधुनिक राजनीतिक विचारधारा से परिचित कराया

    भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में स्वदेशी आन्दोलन का विशेष महत्व है। इस आन्दोलन ने समाज के उस बड़े तबके में राष्ट्रीयता की चेतना का संचार किया जो उससे पहले राष्ट्रीयता के बारे में अनभिज्ञ था। इस आन्दोलन ने औपनिवेशिक विचारधारा तथा फिरंगी हुकूमत को काफी हद तक क्षति पहुँचाई और सांस्कृतिक जीवन को काफी प्रभावित किया। यह संघर्ष भावी राष्ट्रीय आन्दोलन की नींव बना । स्वदेशी आन्दोलन उपनिवेशवाद के खिलाफ पहला सशक्त राष्ट्रीय – आन्दोलन था।

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