प्रारंभिक मध्ययुगीन काल के दौरान धार्मिक आंदोलनों की मुख्य प्रवृत्तियों की चर्चा करें।

    प्रश्नकर्ता Jai Singh
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    उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
    Moderator

    प्रारंभिक मध्ययुगीन काल के दौरान धार्मिक आंदोलनों की मुख्य प्रवृत्तिया :-

    भारत पर मुस्लिम आक्रमण का भारतीय समाज पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा. वास्तविकता तो यह है कि हिन्दू एवं मुसलमान दोनों ही एक-दूसरे से प्रभावित हुए.

    यद्यपि पन्द्रहवीं एवं सोलहवीं शताब्दी में प्रमुख रूप से दो ही धर्म-1. हिन्दू, 2. इस्लाम अपने अस्तित्व में थे, किन्तु हिन्दू एवं मुसलमानों के

    पारस्परिक संसर्ग के परिणामस्वरूप कुछ अन्य धार्मिक सम्प्रदायों का उदय हुआ जो हिन्दू-मुस्लिम भेद को समाप्त करने के इच्छुक थे.

    इन धार्मिक सम्प्रदायों के प्रयासों के परिणामस्वरूप तत्कालीन भारतीय समाज में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ तथा कुछ हद तक हिन्दू तथा मुसलमानों के बीच भेद भी हुआ.

    इसे ही धार्मिक आंदोलन के नाम से जाना जाता है. छठी शताब्दी के बाद होने वाला यह सर्वाधिक व्यापक धार्मिक आंदोलन था. इसे भक्ति आंदोलन भी कहा जाता है.

    भक्ति आंदोलन:-

    हिन्दू धर्म में मोक्ष प्राप्ति के तीन मार्ग बताए गए हैं-ज्ञान, कर्म एवं भक्ति .

    सल्तनतकाल में अनेक ऐसे हिन्दू धार्मिक विचारक हुए, जिन्होंने भक्ति को अत्यधिक महत्व दिया और धर्म सुधार का एक आंदोलन प्रारम्भ किया जो भक्ति आंदोलन के नाम से प्रख्यात हुआ

    . मध्ययुगीन विचारकों ने मोक्ष प्राप्ति के तीसरे मार्ग’भक्ति’ पर अत्यधिक बल दिया. उन्होंने भक्ति द्वारा ईश्वर को प्राप्त करने का उपदेश दिया.

    इस आंदोलन के निम्नलिखित कारण थे

    (1) मुस्लिम शासकों द्वारा हिन्दू धर्म पर किए गए अत्याचारों से हिन्दू जनता त्रस्त हो गई. परिणामस्वरूप उसका भक्ति की ओर झुकाव हुआ.

    (2) सूफी संतों की उदारता एवं सहिष्णुता ने जनता को प्रभावित किया.

    (3) हिन्दू एवं मुसलमानों के पारस्परिक संसर्ग ने इस आंदोलन के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

    भक्ति आंदोलन की प्रमुख विशेषताएँ

    (I) भक्ति आंदोलन के समर्थक ईश्वर की एकता (एकेश्वरवाद) में विश्वास करते थे

    (2) भक्ति आंदोलन के अनुयायी कर्मकाण्ड तथा आडम्बर के घोर विरोधी थे.

    (3) इन्होंने चरित्र की शुद्धता पर अत्यधिक बल दिया.

    (4) जाति प्रथा का विरोध

    (5) भगवान की भक्ति द्वारा ही मोक्ष की प्राप्ति.

    (6) मोक्ष प्राप्ति हेतु संन्यास की आवश्यकता नहीं है

    (7) ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं.

    (8) सामाजिक कुरीतियों का विरोध.

    (9) गुरु के महत्व पर विशेष बल.

    (10) समर्पण की भावना.

    भक्ति आंदोलन का प्रभाव
    (1) जनसाधारण की भाषा में संतों द्वारा पद लिखे जाने के कारण प्रान्तीय भाषा एवं साहित्य का विकास हुआ.

    (2) भारतीय जनता में सहिष्णुता की भावना का उदय हुआ.

    (3) हिन्दू एवं मुसलमानों के मध्य वैमनस्यता कम हुई.

    (4) सामाजिक कुरीतियों एवं अंधविश्वासों पर करारी चोट.

    (5) हिन्दुओं के आत्मबल में वृद्धि हुई.

    भक्ति आंदोलन का स्वरूप

    भक्ति आंदोलन की दो धाराएं थीं

    (1) निर्गुण, (2) सगुण.

    निर्गुण-अर्थात् निराकार पारब्रह्म की उपासना, निर्गुण धारा की भी दो शाखाएं थीं-(1) ज्ञानाश्रयी, (2) प्रेमाश्रयी.

    सगुण-अर्थात् राम-कृष्ण की उपासना, सगुण की भी दो शाखाएं थीं

    (1) रामभक्ति, (2) कृष्ण भक्ति

    भक्ति आंदोलन के मुख्य संचालक

    आचार्य रामानुज

    भक्ति आंदोलन के प्रवर्तक रामानुज का आविर्भाव बारहवीं शताब्दी में तमिलनाडु में हुआ.

    आपने विशिष्ट अद्वैतवाद का प्रचार किया. सगुण ब्रह्म की भक्ति पर बल दिया. मूर्तिपूजा एवं जाति भेद-भाव का विरोध किया. शूद्रों को भी मंदिर में प्रवेश की आज्ञा दे दी.

    स्त्रियों के लिए भक्ति के द्वार खोल दिए. उनका विचार था कि सच्चे हृदय से ईश्वर की भक्ति करना ही मुक्ति का मार्ग है. उनकी शिक्षाएं दक्षिण में अत्यन्त ही प्रभावी रहीं.

    निम्बार्काचार्य
    निम्बार्काचार्य राधा तथा कृष्ण के उपासक तथा रामानुज के समकालीन थे. आपने द्वैताद्वैतवाद सिद्धान्त का प्रचार किया. इनके अनुसार कृष्ण की भक्ति ही एकमात्र मोक्ष का साधन है.

    मध्वाचार्य
    मध्वाचार्य विष्णु के उपासक थे. उनका मत था कि ज्ञान से भक्ति प्राप्त होती है और भक्ति से मोक्ष इन्होंने इतवाद का प्रतिपादन किया.

    रामानंद इलाहाबाद में कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में जन्मे रामानंद उत्तरी भारत में भक्ति आंदोलन के प्रमुख संचालक थे. भगवान राम के उपासक रामानंद ने शुद्ध आचरण एवं भक्ति पर विशेष बल दिया.

    उन्होंने रीति-रिवाज, धार्मिक उत्सवों आदि के स्थान पर प्रेम तथा भक्ति पर बल दिया. जातपाँत के वे घोर विरोधी थे,

    उनका कहना था-“जाति-पांति पूछै नहिं कोई. हरिको भजै सौ हरि का होई“.

    कबीर

    काशी में एक जुलाहे परिवार में जन्मे कबीर भक्ति आंदोलन के मुख्य संचालको में से एक थे. वे रामानंद के शिष्य तथा निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे. सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वास साम्प्रदायिकता तथा छुआछूत के घोर विरोधी थे.

    उन्होंने हिन्दूमुसलमानों के मध्य एकता स्थापित करने के लिए सराहनीय प्रयास किए. उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप कबीरपंथ सम्प्रदाय की स्थापना हुई, जिसके अनुयायी ‘कबीरपंथी‘ कहलाए,

    कबीरदास जी की प्रमुख रचनाएं थीं-

    (1) साखी, (2) सबद, (3) रमैनी. वल्लभाचार्य

    ये कृष्ण के उपासक थे. उनका मत था कि गृहस्थ आश्रम में रहते हुए भी मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है, उनके अनुसार ब्रह्म तथा आत्मा में कोई अंतर नहीं है. भक्ति के द्वारा आत्मा अपने बंधनों से छुटकारा पाकर मोक्ष प्राप्त कर सकती है.

    मीराबाई
    ये मेड़ता के राठौर रत्नसिंह की पुत्री तथा राणा सांगा की पत्नी थीं. वे कृष्ण की उपासिका थीं. उन्होंने घूम-घूमकर सर्वत्र कृष्ण भक्ति का प्रचार-प्रसार किया.

    चैतन्य
    बंगाल में जन्मे चैतन्य कृष्ण के उपासक थे, उन्होंने कर्मकाण्ड, बाह्य आडम्बर का विरोध किया तथा प्रेम एवं भक्ति पर विशेष बल दिया, जाति-पाति तथा ऊँच-नीच का विरोध किया. चैतन्य अनुयायी उन्हें विष्णु का अवतार मानते थे.

    गुरु नानक
    गुरु नानक का जन्म पाकिस्तान स्थित तलवंडी नामक गाँव में 1469 ई. में हुआ था. इस गाँव को अब ननकाना के नाम से जाना जाता है. उन्होंने एकेश्वरवाद तथा उसकी भक्ति का उपदेश दिया.

    उन्होंने धार्मिक बाह्य आङम्बर, जाति-पॉति, भेदभाव तथा कर्मकाण्डों का घोर विरोध किया. उन्होंने सिख धर्म चलाया. हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही जाति के लोग उनके शिष्य थे

    रैदास
    कबीरदासजी के समकालीन रैदास निर्गुण धारा के समर्थक संत थे. उनका पुनर्जन्म में विश्वास था. उनका मत था कि मोक्ष प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ मार्ग भक्ति है.

    दादू
    1544 में अहमदाबाद में जन्मे दादू भक्ति आंदोलन के मुख्य संचालक थे. उन्होंने विभिन्न सम्प्रदायों के मध्य प्रेम और मैत्री स्थापित करने के उद्देश्य से ‘ब्रह्म सम्प्रदाय’ की स्थापना की.

    नामदेव
    महाराष्ट्र में धार्मिक आंदोलन के प्रमुख नामदेव जाति-प्रथा बाह्य आडम्बर एवं अंधविश्वास के कट्टर विरोधी थे. वे उपवास, तीर्थयात्रा आदि में भी विश्वास नहीं करते

    एकनाथ
    एकनाथ की गणना महाराष्ट्र के महान विद्वान् तथा समाज सुधारक के रूप में की जाती है. आपने श्रेष्ठ चरित्र पर विशेष बल दिया.

    उपर्युक्त भक्ति आंदोलन के मुख्य संचालकों के अतिरिक्त बंगाल में जयदेव, महाराष्ट्र में दासोपंत, तुकाराम, ज्ञानेश्वर, रामदास, उत्तर भारत में तुलसीदास, सूरदास आदि मुख्य संत हुए, जिन्होंने भक्ति आंदोलन को गति प्रदान की.

    सूफी धर्म
    भारत में इस्लाम धर्म के साथ ही सूफी धर्म का प्रवेश हुआ. सूफी शब्द का निर्माण अरबी भाषा के ‘सफा’ शब्द से हुआ है जिसका अर्थ है-‘पवित्रता’ अर्थात् वे संत जो आचार-विचार से पवित्र थे, सूफी कहलाए.

    सूफी मत में कर्मकाण्डों का घोर विरोध किया गया है. सूफी मत के अनुयायी एक ईश्वर में विश्वास करते थे तथा भौतिक जीवन के त्याग पर विशेष बल देते थे.

    शांति, अहिंसा, धार्मिक-सहिष्णुता एवं मानवमात्र के प्रति प्रेम की भावना में भी उनका अटूट विश्वास था. सूफियों के मत एवं विचारों से हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही अत्यधिक प्रभावित हुए.

    यही कारण रहा कि पन्द्रहवीं एवं सोलहवीं शताब्दी में भारत में सूफी धर्म का अत्यधिक प्रचार-प्रसार हुआ. ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती, हमदुद्दीन नागौरी, कुतुबुद्दीन बख्तियार काली, फरीदुद्दीन गंजए-शकर, निजामुद्दीन औलिया आदि प्रमुख सूफी संत हुए.

    सूफी धर्म प्रचार-प्रसार से पूर्व ही बारहवीं शताब्दी में बारह सिलसिलों अर्थात् वर्गों में विभक्त हो गया था,

    जिनमें चिश्ती, सुहरावर्दी, कादिरी, सत्तारी, फिरदौसी एवं नक्शबंदी आदि प्रमुख सिलसिले थे, ये सिलसिले भी दो वर्गों में विभाजित थे

    (1) बा-शरा‘, अर्थात् इस्लामी विधि (शरा) का अनुकरण करने वाले,

    (2) ‘बे-शरा‘, अर्थात् जो इस्लामी विधि से बँधे हुए नहीं थे. वे अधिकाशंतः घुमक्कड़ प्रवृत्ति के होते

    चिश्ती सिलसिला

    चिश्ती सिलसिला भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ. इसकी स्थापना अजमेर में बारहवीं शताब्दी के अंत में ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती ने की थी. कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, निजामुद्दीन औलिया, बाबा फरीद आदि चिश्ती सिलसिले के अन्य प्रमुख सूफी संत हुए.

    इस सिलसिले के संत एवं अनुयायी शासक वर्ग से अलग रहते थे तथा संगीत एवं योग क्रियाओं में विश्वास रखते थे.

    इस सिलसिले के संतों का व्यक्तित्व अत्यन्त ही आकर्षक था, इन्होंने अनेक प्रचलित भारतीय रीतिरिवाजों को अपने जीवन में आत्मसात कर लिया था.

    सुहरावर्दी सिलसिला

    घुमक्कड़ प्रवृत्ति के शहाबीन सुहरावर्दी एवं हमीदउद्दीन नागैरी इस सिलसिले के प्रमुख संत हुए. इनका शासक वर्ग से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा. पंजाब एवं मुल्तान इस सिलसले के संतों का प्रमुख कार्यक्षेत्र रहा.

    कादिरी सिलसिला

    कादिरी सिलसिले की स्थापना का श्रेय इराक के संत ‘अब्दुल कादिर-अल-जिलानी’ को जाता है. इस सिलसिले के संत उदार एवं रूढ़िवादी दोनों ही प्रवृत्ति के थे.

    नक्शबंदी सिलसिला

    इस सिलसिले के संस्थापक अहमद आता यास्वी थे. बाकी बिल्लाह, शेख अहमद सर-हिन्दी आदि इसके प्रमुख संत थे.

    फिरदौसी सिलसिला

    मध्य एशिया के ‘सैफुद्दीन बखरजी’ इस सिलसिले के संस्थापक तथा बदुद्दीन समरगंजी, अहमद इब्न याह्या मनैरी आदि प्रमुख संत थे.

    सत्तारी सिलसिला

    ‘अबूयजीद अल-बिस्तामी’ ने इस सिलसिले की स्थापना की थी, शेख अब्दुल्ला इस सिलसिले के प्रमुख संत थे,

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