प्रस्तावना क्या है? क्या यह संविधान का हिस्सा है? क्या इसका इस्तेमाल संविधान की व्याख्या के लिए किया जा सकता है ?इसके महत्व क्या है

    प्रश्नकर्ता MD
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    उत्तरकर्ता Quizzer Jivtara
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    प्रस्तावना क्या है:-

    संविधान के उद्देश्यों को प्रकट करने हेतु प्रायः उनसे पहले एक प्रस्तावना या उद्देशिका प्रस्तुत की जाती है |

    भारतीय संविधान की प्रस्तावना अमेरिकी संविधान से प्रभावित है तथा विश्व में श्रेष्ठ मानी जाती है |

    प्रस्तावना के माध्यम से, भारतीय संविधान का सार, अपेक्षाएं, उद्देश्य, लक्ष्य तथा दर्शन प्रकट होता है |

    प्रस्तावना में आधारभूत दर्शन तथा राजनितिक, धार्मिक एवं नैतिक मूल्यों का उल्लेख है जो हमारे संविधान के आधार स्तम्भ है |

    संविधान-निर्माताओ के विचार को जानने के लिए प्रस्तावना एक कुंजी की तरह कार्य करती है |

    क्या यह संविधान का हिस्सा है:-

    प्रस्तावना को लेकर एक विवाद रहता है कि क्या यह संविधान का एक भाग है या नहीं।
    बेरूबरी संघ मामले (1960) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि प्रस्तावना संविधान में निहित सामान्य प्रयोजनों को दर्शाता है और इसलिए संविधान निर्माताओं के मस्तिष्क के लिए एक कुंजी है। इसके अतिरिक्त अनुच्छेद में प्रयोग की गई व्यवस्थाओं के अनेक अर्थ निकलते हैं। इस व्यवस्था के उद्देश्य को प्रस्तावना में शामिल किया गया है। प्रस्तावना की विशेषता को स्वीकारने के लिए इस उद्देश्य के बारे में व्याख्या करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि प्रस्तावना संविधान का भाग नहीं है।

    केशवानंद भारती मामले (1973)” में उच्चतम न्यायालय ने पूर्व व्याख्या को अस्वीकार कर दिया और यह व्यवस्था दी कि प्रस्तावना संविधान का एक भाग है। यह महसूस किया गया कि प्रस्तावना संविधान का अति महत्वपूर्ण हिस्सा है और संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित महान विचारों को ध्यान में रखकर संविधान का अध्ययन किया जाना चाहिए। एल आई सी ऑफ इंडिया मामले (1995) में भी पुनः उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि प्रस्तावना संविधान का आंतरिक हिस्सा है।
    संविधान के अन्य भागों की तरह ही संविधान सभा ने प्रस्तावना को भी बनाया परन्तु तब जबकि अन्य भाग पहले से ही बनाये जा चुके थे। प्रस्तावना को अंत में शामिल किए जाने का कारण यह था कि इसे सभा द्वारा स्वीकार किया गया। जब प्रस्तावना पर मत

    व्यक्त किया जाने लगा तो संविधान सभा के अध्यक्ष ने कहा, ‘प्रश्न यह है कि क्या प्रस्तावना संविधान का भाग है”।’ इस प्रस्ताव को तब स्वीकार कर लिया गया। लेकिन उच्चतम न्यायालय द्वारा वर्तमान मत दिए जाने के बाद कि प्रस्तावना संविधान का भाग है, यह संविधान के जनकों के मत से साम्यता रखता है। दो तथ्य उल्लेखनीय हैं:

    1. प्रस्तावना न तो विधायिका की शक्ति का स्रोत है और न ही उसकी शक्तियों पर प्रतिबंध लगाने वाला।

    2. यह गैर-न्यायिक है अर्थात इसकी व्यवस्थाओं को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।

    प्रस्तावना का इस्तेमाल संविधान की व्याख्या के लिए किया जा सकता है:-

    मौलिक अधिकारों की परिधि के निर्धारण के लिए (केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य) तथा नीति निर्देशक तत्वों की परिधि के निर्धारण के लिए (एक्सेल वीयर बनाम भारतीय संघ) प्रस्तावना का उपयोग किया जा सकता है। उन संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है जिनके द्वारा प्रस्तावना भारत को एक संप्रभु, समाजवादी. धर्मनिरपेक्ष, प्रजातांत्रिक, गणराज्य घोषित करता है। यह संशोधन की शक्ति पर अंकुश लगाता है। प्रस्तावना में उल्लिखित उद्देश्य संविधान के मूलभूत ढाँचे को घोषित करते है। बहुचर्चित ‘केशवानन्द भारती’ के वाद में यह कहा गया कि अनुच्छेद 368 के तहत संसद प्रस्तावना में भी (संविधान का भाग होने के कारण) संशोधन कर सकती है? न्यायालय ने यह अभिधारित किया कि चूंकि प्रस्तावना संविधान के मूलभूत तत्वों को समाहित करती है अतः संशोधन के अधिकार का इस प्रकार प्रयोग न किया जाय कि मूलभूत तत्वों को क्षति पहुँचे। प्रस्तावना भारत को एक संप्रभु प्रजातांत्रिक गणराज्य घोषित करती है। संशोधन की शक्ति का इस प्रकार प्रयोग न किया जाय कि भारत “संप्रभु प्रजातांत्रिक गणराज्य” ही न रहे।

    भारतीय संविधान में प्रस्तावना का महत्व :-

    1) संविधान के प्राधिकार का स्रोत :- संविधान के प्राधिकार का स्रोत भारत की जनता है कारण यह कि संविधान का निर्माण भारत की जनता की ओर से संविधान सभा के सदस्यों ने किया और उन्हीं के द्वारा इसे अंगीकृत किया गया। इसीलिए संप्रभुता भारत की जनता में निहित है।

    2) राज्य का स्वरूप :- संविधान की प्रस्तावना में दर्शाया गया है कि राज्य संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य होगा |

    3)संविधान का उद्देश्य:-
    नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुलभ कराना।
    विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता उपलब्ध कराना।
    प्रतिष्ठा और अवसर की समता को सुनिश्चित करना।
    व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता को सुनिश्चित करने वाली बंधुता को बढ़ाना।

    4) संविधान लागू होने की तिथि:- संविधान लागु होने की तिथि का प्रस्तावना में उल्लेख तारीख 26 नवम्बर, 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शक्ल सप्तमी, संवत्
    मार छह विक्रमी) हैं।

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