ध्वनि का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा ध्वनि के भेदों का वर्णन कीजिए

    प्रश्नकर्ता Ankur Kumar Singh
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    उत्तरकर्ता jivtaraQuizzer
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    “ध्वनि” शब्द का अर्थ बड़ा व्यापक है। किसी भी प्रकार की आवाज को ध्वनि कह दिया जाता है, चाहे मशीनों के चलने की आवाज हो, कार-मोटर आदि की आवाज हो, रेलगाड़ी-वायुयान की आवाज हो या बर्तन गिरने की आवाज हो।

    लेकिन भाषा में “ध्वनि” शब्द का संदर्भ सीमित है। यहाँ ध्वनियों से हमारा तात्पर्य उन ध्वनियों से है, जिनका हम अपने मुख से उच्चारण करते हैं, लेकिन मानव मुख से उच्चारित प्रत्येक ध्वनि “भाषिक ध्वनि” नहीं कही जा सकती, क्योंकि मुख से तो अनेक प्रकार की ध्वनियाँ उच्चारित की जा सकती हैं। कभी सीटी बजाकर, कभी चीखकर, कभी हँस कर, तो कभी रो कर। हम तरह-तरह की ध्वनियाँ मुख से निकाल सकते हैं। लेकिन उच्चारण अवयवों की सहायता से निकाली गई ध्वनि भाषिक ध्वनि कहलाती है।

    मनुष्य अपने विचारों के आदान-प्रदान के लिए भाषा को माध्यम बनाता है। किसी भी भाषा के शब्दों का निर्माण विभिन्न सार्थक ध्वनियों के संयोग से होता है। यहाँ ध्वनि शब्द से तात्पर्य भाषा की इन्हीं सार्थक ध्वनियों से है।

    अन्य ध्वनियों से भाषिक ध्वनियों को अलग करने के उद्देश्य से ही भाषिक ध्वनियों को भाषा विज्ञान में “स्वन” कहा जाता है। अतः “क”, “म” “त” आदि हिन्दी के “स्वन” हैं।

    भाषा की ये ध्वनियाँ या स्वन के दो भेद है –

    1. स्वर ध्वनियाँ

    2.व्यंजन ध्वनियाँ

    1. स्वर ध्वनियाँ :-

    स्वर ध्वनियाँ वे हैं जिनका उच्चारण करते समय वायु को बिना किसी अवरोध या रुकावट के मुख से बाहर निकाला जाता है।स्वर ध्वनि की प्रकृति के बारे में बहुत-सी बातें स्पष्ट हो चुकी हैं।

    स्वर- ध्वनियों के वर्गीकरण के निम्नलिखित आधार माने गए हैं

    1. जीभ का कौन-सा भाग क्रियाशील होता है? सामान्य रूप से उच्चारण में जीभ का अग्र, मध्य या पश्च भाग सक्रिय होता है। इस आधार पर स्वर ध्वनि के उच्चारण में जीभ का जो भाग (अग्र, मध्य, पश्च) क्रियाशील होता है, उसके आधार पर उसे अग्र स्वर, मध्य स्वर और पश्च स्वर कहते हैं। जैसे जीभ का अग्र भाग इ. ई, ए, ऐ स्वरों के उच्चारण में सहायक होता है। अतः ये इ.ई. ए. ऐ अग्र स्वर हैं। इसी प्रकार जीभ का मध्य भाग अ स्वर तथा पश्च भाग उ, ऊ, ओ, औ स्वर के उच्चारण में क्रियाशील होता है। अतः अ मध्य स्वर तथा आ, उ, ऊ, ओ, औ पश्च स्वर हैं।

    2. जीभ का क्रियाशील भाग कितना ऊपर उठता है? स्वरों का स्वरूप जीभ के अग्र. पश्च या मध्य भाग के उठने पर भी निर्भर करता है अर्थात यदि जीभ का विशिष्ट भाग बहुत उठा हो तो मुख-विवर अत्यंत संकरा अर्थात् ‘संवृत’ होगा और यदि वह नहीं के बराबर उठा तो मुख-विवर बहुत खुला या ‘विवृत’ होगा। इन दोनों के बीच ‘अर्द्ध-विवृत’ और ‘अर्द्ध संवृत’ दो स्थितियाँ और होती हैं। हिन्दी में आ विवृत, ऑ अर्द्ध-विवृत, ए, ऐ, ओ, औ अर्द्धसंवृत और इ. ई. उ, ऊ संवृत स्वर हैं।

    3. ओष्ठ की स्थिति- प्रत्येक स्वर के उच्चारण में जीभ के साथ ओष्ठों की भी भूमिका होती है। स्वरों के उच्चारण के समय ओष्ठों की दो प्रमुख स्थितियाँ हैं- वृत्ताकार और अवृत्ताकार। ओष्ठ गोल आकार में बनने पर उ, ऊ, ओ तथा औ का वृत्ताकार उच्चारण होता है तथा शेष स्वर अवृत्ताकार होते हैं।

    कुछ स्वरों में ओष्ठ पूर्ण विस्तृत (ए), उदासीन (अ), स्वल्प वृत्ताकार (आँ) एवं पूर्ण वृत्ताकार (ऊ) होते हैं। 4. मात्रा-स्वर के उच्चारण में जितना समय लगता है, उसे ‘मात्रा’ कहते हैं। उच्चारण काल के आधार पर स्वरों के दो भेद हैं-हस्व और दीर्घ। हस्व स्वर के उच्चारण में कम समय लगता है और दीर्घ स्वर के उच्चारण में अपेक्षाकृत अधिक। अ, इ, उ, ए, ओ हस्व स्वर हैं। इसी प्रकार आ, ई, ऊ, ऐ, औं दीर्घ स्वर हैं।

    5. कोमल तालु और कौवे की स्थिति-उच्चारण के समय कोमल तालु और कौवा कभी तो नासिका मार्ग को रोक देते हैं, कभी मध्य में रहते हैं जिससे वायु मुख से या नासिका मार्ग से निकलती है। पहली स्थिति में मौखिक स्वर अ, आ, ए आदि तथा दूसरी स्थिति में अनुनासिक स्वर अँ, आँ, इ उच्चारित होते हैं।

    6. स्वरतंत्रियों की स्थिति-उच्चारण के समय स्वरतंत्रियों की स्थिति के आधार पर स्वर घोष और अघोष कहलाते हैं। घोष उन ध्वनियों को कहते हैं जिनके उच्चारण में स्वरतंत्रियों के बीच से आती हवा घर्षण करते हुए निकलती है। प्रायः सभी स्वर घोष की श्रेणी में आते हैं। जब स्वर तंत्रियाँ खुली रहती है तब हवा बिना किसी घर्षण के बाहर निकलती है। यह स्थिति अघोष कहलाती है।

    7. स्वरों के भेद- मुख की मांसपेशियों या अन्य वागवयवों की दृढ़ता या शिथिलता के आधार पर भी स्वरों के भेद किए गए हैं। जैसे-अ, इ, उ शिथिल स्वर हैं और ई, ऊ, दृढ़ स्वर। कुछ स्वर मूल होते हैं अर्थात् उनके उच्चारण में जीभ एक स्थान पर रहती है, जैसे अ, इ, ए, ओ। इसके सापेक्ष कुछ स्वर संयुक्त होते हैं अर्थात् इनके उच्चारण में जीभ एक स्वर के उच्चारण से दूसरे स्वर के उच्चारण की ओर चलती है। वस्तुतः संयुक्त स्वर दो स्वरों का ऐसा मिला-जुला रूप है जिसमें दोनों अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व खोकर एकाकार हो जाते हैं और साँस के एक झटके में उच्चरित होते हैं। दोनों मिलकर एक स्वर जैसे हो जाते हैं। ऐ (अ, ए), औ (अ, ओ) संयुक्त स्वर कहे गए हैं। संक्षेप में विभिन्न आधारों पर स्वरों के वर्गीकरण को निम्नलिखित तालिका से अच्छी तरह समझा जा सकता है।

    2.व्यंजन ध्वनियाँ:-

    व्यंजन” वे ध्वनियाँ हैं जिनके उच्चारण में मुख में वायु का अवरोध होता है। उदाहरण के लिए “क” ध्वनि का उच्चारण करते समय कंठ में वायु का अवरोध होता है तथा “प” बोलते समय होंठों के पास। व्यंजन ध्वनियों की प्रकृति स्वर ध्वनियों से भिन्न हैं। अत: व्यंजन के वर्गीकरण में स्थान, कारण, प्रयल के अतिरिक्त स्वरतंत्री प्राणतत्व, उच्चारण शक्ति, अनुनासिकता आदि आधारों पर भी विचार करने की आवश्यकता है। इस प्रकार व्यंजनों के वर्गीकरण में निम्नलिखित आधार पर विस्तृत अध्ययन किया जा सकता है

    (क) स्थान के आधार पर-

    स्थान के आधार पर व्यंजन ध्वनियों के कंठ्य (कोमल तालव्य), मूर्धन्य, तालव्य (कठोर तालव्य) वयं, दंत्य, दंत्योष्ठ्य, ओष्ठ्य, अलिजिह्वीय, काकाल्य आदि भेद होते हैं। इन भेदों तथा इनके अंतर्गत आने वाली व्यंजन ध्वनियों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार हैं

    1. कंठ्य (Soft Palatal)-इसे ‘कोमल तालव्य’ भी कहते हैं। जीभ के पिछले भाग के सहारे ये ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं। क वर्ग की ध्वनियाँ क, ख, ग, घ. हु कंठ्य या कोमल तालव्य की ध्वनियाँ हैं। फारसी की ख, ग जैसी
    संघर्षी ध्वनियाँ भी यहीं से उच्चारित होती हैं।

    2. तालव्य (Palatal)-इन ध्वनियों का उच्चारण कठोर तालव्य से होता है। जीभ का अगला भाग या नोक इसमें सहायक होती है। च वर्ग की ध्वनियाँ-च, छ, ज, झू इसी के अंतर्गत आती हैं।

    3. मूर्धन्य (Cevebral)-मूर्द्धा की सहायता से उच्चारण की जाने वाली ध्वनियाँ मूर्धन्य कहलाती हैं। टू, तू, इ. द. अर्थात ट वर्ग की ध्वनियाँ मूर्धन्य

    4. वयं (Alveolar)-मसूढे या वर्क्स और जीभ के अगले भाग की सहायता से उत्पन्न ध्वनियाँ वयं कहलाती हैं। र. ल. स् तथा ज् वय॑ ध्वनियाँ

    5. दंत्य (Dental)-दाँत की सहायता से उत्पन्न ध्वनियाँ दंत्य हैं। इसके उच्चारण में जीभ की नोक भी सहायक होती है। त्. . . दंत्य ध्वनियाँ हैं।

    6. दंत्योष्ठ्य (Labiodental)-जिन ध्वनियों का उच्चारण ऊपर के दाँत और नीचे के ओंठ की सहायता से होता है, वे दंत्योष्ठ्य कहलाती हैं। व् दंत्योष्ठ्य ध्वनि है।

    7. ओष्ठ्य (Bilabial)-दोनों ओंठ से उच्चारित होने वाली ध्वनियाँ ओष्ठ्य होती हैं प वर्ग में प्. फ्. ब. भ. म् ओष्ठ्य ध्वनियाँ हैं।

    8. अलिजिह्वीय (Uvular)- इसे जिह्वामूलीय या जिह्वापश्चार्य भी कहते हैं। इसमें कौवे या अलिजिह्व से ध्वनि का उच्चारण होता है। इसके लिए जिह्वामूल या जिह्वापश्च को निकट ले जाकर वायुमार्ग संकरा करते हैं जिससे संघषी ध्वनि उत्पन्न होती है। फारसी की क, ख, ग ध्वनि भी इसी प्रकार की है।

    9. काकल्य (Lavygeal)-ये स्वरयंत्र मुख से उत्पन्न होने वाली ध्वनियाँ हैं। इसे ‘उरस्य’ भी कहते हैं। ह और विसर्ग (:) इस वर्ग की ध्वनि हैं।

    (ख) प्रयत्न के आधार पर-

    प्रयत्न के आधार पर ध्वनियों के निम्नलिखित वर्ग हैं

    1. स्पर्श- इसे ‘स्फोट’ या ‘स्फोटक’ भी कहते हैं। इसके उच्चारण में दो अंग (जैसे दोनों ओंठ या नीचे का ओंठ और ऊपर के दाँत, या जीभ की नोक और दाँत, या जीभ का पिछला भाग और कोमल तालु) एक-दूसरे का स्पर्श करके हवा को रोकते हैं और फिर एक-दूसरे से हटकर हवा को जाने देते हैं। स्पर्श ध्वनि का उच्चारण कभी तो पूर्ण होता है, कभी अपूर्ण। हिन्दी की कवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग की ध्वनियों के साथ ही फ़ारसी का ध्वनि स्पर्शीय है।

    2. संघर्षी- संघर्षी ध्वनि में स्पर्श की तरह हवा का न तो पूर्ण अवरोध होता है और न ही स्वरों की भाँति वह अबाध रूप से मुंह से निकल जाती है। अतः इसकी स्थिति स्वरों और स्पर्श के बीच की है अर्थात् दो अंग एक-दूसरे के इतने समीप आ जाते हैं कि हवा दोनों के बीच घर्षण करके निकलती है। इसलिए इसे संघर्षी कहा जाता है। हिन्दी की श्, स्, प् तथा फ़ारसी की फ, व, ज, ख, ग संघर्षी ध्वनियाँ हैं।

    3. स्पर्श संघर्षी-जिन ध्वनियों के उच्चारण का आरम्भ स्पर्श से हो किन्तु हवा कुछ देर घर्षण के साथ निकले, वे स्पर्श संघर्षी कहलाती है। च, छ, ज, झू स्पर्श संघर्षी ध्वनियाँ हैं।।

    4. नासिक्य (Nasal)-इन ध्वनियों के उच्चारण में मुख-विवर के दो अंगों (स्पर्श की तरह) के स्पर्श के साथ हवा नाक के रास्ते बाहर निकलती है। इन्हें ‘अनुनासिक’ भी कहते हैं। हिन्दी में ङ, ण, न, में नासिक्य व्यंजन हैं।

    5. पार्श्विक (Lateral)-इसमें मुख विवर के मध्य में कहीं भी दो अंगों के सहारे हवा अवरुद्ध कर देते हैं। फलतः हवा दोनों पाश्वों से निकलती है। इसे ‘पार्श्व ध्वनि’ भी कहते हैं। ल पार्श्विक व्यंजन है।

    6. लुंठित (Rolled)- इसमें जीभ की नोक को बेलन की तरह कुछ लपेट कर तालु का स्पर्श कराते हुए ध्वनि का उच्चारण होता है। इसे ‘लोड़ित’

    भी कहते हैं। र लुंठित व्यंजन है।

    7. उत्क्षिप्त (Flapped)- जीभ की नोक को उलटकर तालु को झटके से मार उसे फिर सीधा कर लेने से उत्क्षिप्त ध्वनि उच्चारित होती है। ड़, द उत्क्षिप्त व्यंजन ध्वनि हैं।

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