ध्वनि का अर्थ स्पष्ट कीजिये

    प्रश्नकर्ता Vipul Saini
    Participant
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    उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
    Moderator

    ध्वनि का अर्थ – रस यदि काव्य की आत्मा है तो ध्वनि काव्य-शरीर को बल देने वाली प्राणशक्ति अवश्य है। ध्वनि शब्द का अर्थ है अनुरणन् या घंटे की-सी ‘टन’ के बाद देर तक होने वाली झंकार।

    यह एक प्रकार से अर्थ का भी अर्थ है, तभी तो इसको शरीर-मात्र से कुछ अधिक प्रधानता मिली है। रीति आदि द्वारा वाक्यों के सुसंगठित हो जाने पर भी काव्य में कुछ एक विशेष वस्तु होती है।

    वह मोती की एक आव को (छाया पारिभाषिक अर्थ में) भाँति सौन्दर्य की झलक उत्पन्न करती है।

    कविवर बिहारी ने कहा है- ‘बह चितवन औरे कछू जिहि बस होत सुजान’। यह ‘और कछू’ ही प्रतीयमान अर्थ है।

    जिस प्रकार अंगनाओं का सौन्दर्य अवयव-सौष्ठव से ऊपर की वस्तु है उसी प्रकार प्रतीयमान् अर्थ भी वाक्यों के संगठन और व्याकरण-औचित्य की अदोषता से ऊपर की वस्तु है

    यह लावण्य व्यंजना द्वारा प्राप्त होता है। जहाँ पर व्यंग्यार्थ वाच्यार्थ की अपेक्षा प्रधान होता है वहीं वह ध्वनि का रूप धारण कर लेता है।

    साधारण व्यंग्वार्थ और ध्वनि में यही विशेषता है। सब व्यंग्यार्थ वाच्यार्थ की अपेक्षा प्रधान नहीं होते।

    इसमें वाक्यार्थ गीण होकर पीछे रह जाते हैं। अर्थ या शब्द अपने निजी अर्थ (अभिधार्थ) को छोड़कर जिस विशेष अर्थ को (व्यंग्यार्थ को) प्रकट करता है उसे विद्वान् लोग ध्वनि कहते हैं

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