धनुष यज्ञ किसके द्वारा आयोजित किया गया

    प्रश्नकर्ता yoginath
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    उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
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    धनुषयज्ञ का आयोजन  रामायण त्रेतायुग में मिथिला के नरेश राज जनक ने अपनी पुत्री सीता के स्वयंवर के हेतु किया था।

    प्राचीन काल में दूसरों की भलाई के कार्यों को यज्ञ कहते थे। मिथिला के राजा जनक ने अपनी बेटी के विवाह के लिये यह शर्त लगाई थी कि जो राजा उनके धनुष पर बाण चढ़ाकर खींच सकेगा उसी वीर के साथ सीता का विवाह होगा। इसीलिये सीता के स्वयंवर का नाम धनुष यज्ञ हो गया। धनुष यज्ञ से एक दिन पहले मुनि विश्वामित्र ने दोनों भाइयों को सूचना दी कि कल जनकपुरी में राजा जनक की बेटी का स्वयंवर है।

    जनकपुरी में मुनि विश्वामित्र शहर के बाहर एक बाग में ठहर गये। जब राजा जनक ने सुना कि महामुनि आये हैं तो वह दौड़ा-दौड़ा गया और मुनि को साथ लिवा लाया और अपने खास अतिथि गृह में ठहरा दिया। और उन्हें बता दिया कि नगर के पूर्वी भाग में यज्ञशाला है जहाँ पर धनुष रखा हुआ है। यदि इच्छा हो तो उस धनुष को भी देखने निकल जाना। गुरु की आज्ञा पाकर दोनों भाई यज्ञशाला में जा पहुंचे।  आज स्वयंवर का दिन है। राजा लोग यज्ञशाला में पहुँच गये हैं। राजा जनक के पुरोहित शतानंद आकर

    विश्वामित्र को यज्ञशाला पहुंचने का निमंत्रण देते हैं। विश्वामित्र दोनों भाइयों को जनक के निमंत्रण की सूचना देते हैं और कहने लगते हैं कि चलो सीय स्वयंवरु देखिअ जाई।

    राजा जनक यज्ञशाला में पहुँचता है और अपनी प्रतिज्ञा की घोषणा कराता है। जो वीर पुरुष यज्ञशाला में रखे हुए धनुष से निशाना लगा देगा उसी के साथ अपनी बेटी सीता का विवाह कर दूँगा। घोषणा सुनकर राजा लोग धनुष चढ़ाने आते हैं, किन्तु कोई भी भारी धनुष को उठा नहीं पाता। हरेक आँखें नीची करके लौट जाता है।

    सभी राजाओं का यही हाल हुआ। यह देखकर राजा जनक को बड़ी घबराहट हुई। सोचने लगे कि मेरी प्यारी बेटी का विवाह कैसे होगा? राजा को यह आशा नहीं थी कि मुनि विश्वामित्र के नौजवान शिष्य धनुष को उठा सकेंगे। इसलिये, उनसे धनुष उठाने की बात ही नहीं चलाई। राजा की व्याकुलता अब क्रोध के रूप में उभरी। क्रोध के आवेश में राजा के मुँह से अत्यन्त कठोर वचन निकल पड़े: “अब कोई राजा वीरता का अभिमान न करे। सारे राजा कायर हैं। केवल वीर होने का ढोंग बनाये फिरते हैं।

    अगर मुझे यह मालूम होता कि पृथ्वी पर कोई शूरवीर नहीं रहा, तो मैं अपनी बेटी के विवाह के लिये ऐसी शर्त न लगाता। अब मैं अपना प्रण छोड़ता हूँ तो पाप का भागी बनता हूँ। नहीं छोड़ता हूँ तो मेरी बेटी कुंआरी रह जायेगी। हाय, मैं क्या करूँ, क्या न करूँ”

    राजा जनक की मर्मान्तक पीड़ा का आर्तनाद सुनकर सब लोग दुखी हो गये। परन्तु लक्ष्मण क्रोध से तिलमिला उठा। भौंहें टेढ़ी हो गईं और होठ फड़कने लगे। लक्ष्मण का क्रोध स्वाभाविक था। जनक ने दोनों भाइयों के स्वाभिमान को गहरी चोट पहुंचाई थी। ऐसी चुनौती को लक्ष्मण जैसा महावीर कैसे अस्वीकार कर सकता था। उससे रहा न गया।

    लक्ष्मण उठकर खड़ा हो गया और तमतमाते चेहरे से बोल उठा। “राजा जनक ने बहुत अनुचित बात कह डाली है। रघुकुल के किसी वीर के सामने ऐसी कठोर बात कोई नहीं कहता है। अगर मुझे मेरे गुरु और मेरे बड़े भाई आज्ञा दें तो मैं इस धनुष को कच्चे घड़े की तरह तोड़-मरोड़ कर टुकड़े-टुकड़े कर डालूँगा।

    यह धनुष तो पुराना है और बहुत जर्जर हो चुका है। अगर नये दस ऐसे धनुष लाकर रख दें तो उन्हें भी तोड़ दूंगा। राजा जनक को यह समझ लेना चाहिये कि भारत भूमि ने सदा वीरों को जन्म दिया है। सारा संसार भारत के वीरों का लोहा मानता है। भारत माता वीरता-विहीन कभी नहीं रही, किन्तु धूर्तता-विहीन जरूर रही है। अगर राजा जनक को विश्वास न हो तो हमें आजमा कर देख लें।”

     

    लक्ष्मण की क्रोधभरी वाणी राजा जनक को शहद जैसी मीठी प्रतीत हुई। परंतु संकोच के कारण मुँह से आवाज नहीं निकली। मुनि विश्वामित्र मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए।

    मुनि ने लक्ष्मण से धनुष उठाने को नहीं कहा क्योंकि मुनि सीता का विवाह भावी राष्ट्रनायक से कराना चाहते हैं। वैसे भी राम बड़े भाई होने के कारण विवाह के अधिकारी थे। गुरु की आज्ञा पाते ही राम उठे और मुनि के चरणों में सिर झुकाया। फिर धनुष की ओर कदम बढ़ा दिये।

    लक्ष्मण ने देखा कि राम ने धनुष की तरफ नजर डाली है तो उसे जनक को लग्जित करने की शरारत सूझी। जोर से धरती पर लात मारी ताकि लोगों का ध्यान उसकी तरफ जाय। फिर जोर से बोला, “सब लोग सँभल कर बैठे और अपने कानों में रूई दूँस लें। यह धनुष पुराना है खींचते ही टूट जायेगा। टूटते समय जोर की ध्वनि होगी। जिससे धरती हिल जायेगी और लोगों के कान के परदे फट जायेंगे।”

    राम ने धनुष को बड़ी फुर्ती से उठा लिया और धनुष पर बाण चढ़ाकर उसे जोर से खींचा। धनुष बहुत पुराना हो चुका था। चट-चट की ध्वनि हुई और उसके दो टुकड़े हो गये। राम ने दोनों टुकड़े धरती पर पटक दिये। धम्म की ध्वनि के साथ खेल खत्म हो गया।

    धनुष टूटते ही जनकपुरी में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। लोग खुशी से झूम उठे, बाजे बजने लगे और मंगल गीत गाये जाने लगे। सीता अपनी सहेलियों के साथ आई और राम के गले में वरमाला डाल दी। सीता-स्वयंवर की प्रथा पूरी हुई। जनक प्रफुल्लित हो उठे।

     

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