देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता को बताते हुए देवनागरी के स्वर एवं व्यंजनों की विशेषताएं बताइये

    प्रश्नकर्ता Prity Duhan
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    उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
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    देवनागरी को लिखने में भी वैज्ञानिकता

    “देवनागरी” लिपि को “गढ़ने”में भारतीय ऋषियों ने अत्यन्त वैज्ञानिक दृष्टि का प्रयोग किया है।

    देवनागरी लिपि के वर्ण जैसे बोले जाते हैं, वैसे ही लिखे जाते हैं, जैसे लिखे जाते हैं, वैसे ही बोले जाते हैं। उनके बोलने और लिखने में अन्य भाषाओं की लिपियों के समान, भेद नहीं है।

    हिन्दी में हम “स” ही बोलेंगे और “स” ही लिखेंगे परन्तु उर्दु में “सीनः””स्वाद”, से इन तीनों वर्गों के लिखने का झगड़ा पैदा होगा और वहाँ भी लिखने तथा बोलने से भेद रहेगा। यही अवस्था अंग्रेजी के “सी” और “एस” की है।

    अंग्रेजी में लिखा जायेगा काल्म (calm) और पढ़ा जायेगा “काम”। लिखा जायेगा (school) स्चूल और पढ़ा जायेगा “स्कूल” । इस प्रकार का दोष देवनागरी लिपि में नहीं है।

    इस प्रकार देवनागरी लिपि पूर्ण वैज्ञानिक सिद्ध होती है। देवनागरी लिपि में वैज्ञानिकता इस प्रकार है कि उसके वर्गों को लिखने में

    1. सर्वप्रथम स्वतन्त्र रूप से उच्चारित वर्णों (स्वरों) को स्थान दिया गया है और फिर स्वरों की सहायता से बोले जाने योग्य वर्णों (व्यंजनों) को महत्त्व दिया गया है।

    2. दूसरी विशेषता यह है कि लघु स्वर पहले लिखे जाते हैं उसके बाद दीर्घ स्वर और उसके पश्चात् गुण वृद्धि स्वर (ए,ओ, ऐ, औ) के अनुसार लिखे जाते  हैं।

    3. उच्चारण की दृष्टि से भी इन स्वरों में क्रम निर्धारित किया गया है।

    4. इसी प्रकार स्पर्श व्यंजनों में पाँच वर्ग बना दिये गये हैं। प्रत्येक वर्ग के अक्षर एक-एक उच्चारण-स्थान से बोले जाते हैं।

    5. फिर वर्ग के पाँच अक्षरों के क्रम में भी वैज्ञानिकता है। सभी वर्गों के वर्गों के उच्चारण में एक ही उच्चारण-स्थान काम करता है और इसी प्रकार अगले सभी वर्गों में इस प्रकार अन्तःस्थ और ऊष्म में भी वैज्ञानिक बुद्धि से काम लिया गया है।

    व्यवस्थित वर्णमाला– नागरी लिपि की वर्णमाला का रूप अत्यन्त व्यवस्थित है। इसमें स्वरों और व्यंजनों को अलग-अलग रखा गया है। स्वरों में भी हस्व और दीर्घ के युग्म (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ) हैं। पहले मूल स्वर रखे गए हैं, फिर संयुक्त स्वर

    स्पर्श ध्वनियों के अंतर्गत पहले कण्ठ ध्वनियों को रखा गया, एवं अंत में ओष्ठ्य ध्वनियों को।

    यहाँ तक कि प्रत्येक वर्ग की प्रथम, तृतीय एवं अंतिम ध्वनियाँ अल्प प्राण ध्वनि (क, ग, ङ) तथा द्वितीय एवं चतुर्थ ध्वनि महाप्राण ध्वनि (ख, घ) हैं। प्रत्येक वर्ग की अंतिम ध्वनि को अनुनासिक रखा गया है, जैसे-ङ,ञ, ण, न एवं म।

    इस प्रकार प्रत्येक वर्ग की ध्वनियों में पहले अघोष एवं उसके बाद सघोष ध्वनियों का उल्लेख है। इस प्रकार पहले की दो ध्वनियाँ अघोष तथा अंतिम तीन ध्वनियाँ सघोष हो जाती हैं।

     उच्चारण के अनुरूपलेखन -नागरी लिपिअक्षरात्मक लिपि है। अक्षरात्मक लिपि में प्रत्येक ध्वनि के लिए पृथक-पृथक वर्ण होते हैं। इसमें प्रत्येक स्तर के लिए भिन्न चिह्न होता है, जो उच्चारण के अनुरूप लिखे जाते हैं।

    जैसे यदि ‘रहीम’ बोलना है, तो उसे र+अ+ह+ई+म+अ लिखना होगा। जबकि अंग्रेजी में ऐसा नहीं है। उसमें अनेक लिखी हुई ध्वनियों का उच्चारण नहीं होता। जैसे-‘KNIFE’ | इसका उच्चारण ‘नाईफ है। इसमें ‘K’ ध्वनि का उच्चारण नहीं होता।

     एक ध्वनि एक लिपि-नागरी लिपि में प्रत्येक ध्वनि के लिए अलग-अलग चिह्न हैं, तथा एक चिह्न की एक ही ध्वनि है। जबकि रोमन लिपि में एक ध्वनि के लिए अनेक लिपिचिह्न हैं । जैसे-रोमन लिपि में ‘S’ की तीन ध्वनियाँ हैं-स, ज, श,। इसी प्रकार ‘क’ ध्वनि के लिए C,K,Q, का प्रयोग किया जाता है।

    व्यंजन चिह्न की आक्षरिकता– इससे तात्पर्य है-व्यंजन के उच्चारण के साथ स्वर का उच्चारण होना। यह गुण नागरी लिपि में ही है, रोमन आदि में नहीं। इसके कारण नागरी लिपि में लेखन की गति बढ़ जाती है।

    उदाहरण के लिए यदि ‘मदन’ को अंग्रेजी में लिखना होगा, तो लिखेंगे- MADANAA स्पष्ट है कि जहाँ नागरी में इसे केवल तीन चिह्नों द्वारा व्यक्त कर दिया गया है, वहीं रोमन में छ: चिह्नों की आवश्यकता पड़ी है।

    पृथक-पृथक् लिपि चिह्न- इसमें प्रत्येक स्वर एवं व्यंजन ध्वनि के लिए पृथक् लिपि चिह्न है। यद्यपि ऐसा करने से कुल स्वर एवं व्यंजनों की संख्या रोमन लिपि की तुलना में अधिक अवश्य हो गई है, किन्तु इससे लिपि में वैज्ञानिकता अधिक आ गई है।

    उदाहरण के लिए नागरी लिपि में अल्पप्राण एवं महाप्राण ध्वनियों के लिए अलग-अलग लिपि हैं। जैसे-क (अल्पप्राण). ख (महाप्राण). जबकि रोमन लिपि में इसके लिए होगा-K (क), KH (ख)।

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