दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष कौन थे

    प्रश्नकर्ता pinku
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    उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
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     दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष  श्री बी. पी. मण्डल थे 

    विभिन्न राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग व उनकी संस्तुतियाँ

    पिछड़े वर्गों के कल्याण को ध्यान में रखते हुए भारतीय संविधान की धारा (Article) 340 में सरकार के लिए ‘अन्य पिछड़े वर्ग के कल्याण’ (OBC) को बढ़ावा देना अनिवार्य (Obligatory) कर दिया गया है।

    इसी दृष्टिकोण से अनुच्छेद 340 (1) में स्पष्ट कहा गया है, “राष्ट्रपति अपने आदेश द्वारा एक आयोग की नियुक्ति करेगा, जिसमें ऐसे व्यक्ति सम्मिलित होंगे जो भारतीय भू-भाग (Territory) में रह रहे सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों का पता लगा सकें,

    उनकी कठिनाइयों की खोज कर सकें और उनको दूर करने के लिए अपनी संस्तुतियाँ दे सकें। साथ ही यह भी बतायें कि उनकी दशा सुधारने के लिए कितना अनुदान (Grants) दिया जाये?”

    संविधान की इसी भावना या आदेश को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने समय-समय पर विभिन्न ‘राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग’ (National Commissions for Backward classes) का गठन किया, जिनका संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है

    (1) प्रथम राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (First National Backward Class Commission)

    भारत सरकार ने राष्ट्रपति के आदेश के द्वारा दिनांक 29 जनवरी, 1953 को श्री काका कालेलकर (Kaka Kalelkar) की अध्यक्षता में प्रथम राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (First Backward class Commission) का गठन किया।

    आयोग ने सम्पूर्ण भारत में कुल,2,399 पिछड़े वर्ग की जातियाँ या समुदायों को चिन्हित किया, जिसमें से 837 को ‘अति पिछड़ा’ (Most Backward) माना गया। इस आयोग ने 30 मार्च, 1955 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। आयोग की कुछ प्रमुख संस्तुतियाँ निम्नलिखित हैं

    1, 1961 की जनगणना में जाति के आधार पर परिगणन (Reumeration) होना चाहिए।

    1. परम्परागत जातिगत संस्तरण में एक वर्ग की निम्न स्थिति को सामाजिक पिछड़ेपन का आधार मानना चाहिए।
    2. समस्त स्त्रियों का एक ‘पिछड़ा वर्ग के रूप में मानना या उपचार किया जाना (Treat) चाहिए।
    3. पिछड़े वर्ग के समस्त योग्य विद्यार्थियों को सभी तकनीकी तथा व्यावसायिक संस्थानों में 70 प्रतिशत आरक्षण दिया जाना चाहिए।
    4. सभी सरकारी नौकरियों तथा स्थानीय निकायों में रिक्त स्थानों में आरक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए।

    आयोग ने अपनी अन्तिम रिपोर्ट में यह भी संस्तुति की कि पिछड़ेपन (Backwardness) के मापदण्ड’ के लिए ‘जाति’ ही एक आधार होना चाहिए।

    इस सम्बन्ध में यह स्मरणीय है कि ‘काका कालेलकर आयोग’ की यह रिपोर्ट भारत सरकार द्वारा स्वीकार नहीं की गई क्योंकि इससे यह भय था कि ‘आयोग’ द्वारा जिन जातियों व समुदायों को ‘पिछड़े वर्ग’ में सम्मिलित नहीं किया गया होगा,

    यद्यपि वे वास्तव में जरूरतमंद होंगे; उनको सरकार के कल्याणकारी उपायों का लाभ नहीं मिल सकेगा।

    (I) द्वितीय राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग : मण्डल आयोग (Second National Backward Class Commission : Mandal Commission)

    द्वितीय राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की स्थापना के लिए राष्ट्रपति द्वारा अधिकारिक निर्णय की घोषणा 1 जनवरी 1979 को की गई। फलत: श्री बी. पी. मण्डल (B. P. Mandal) को अध्यक्षता में द्वितीय राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग’ की नियुक्ति की गई।

    यह आयोग ‘मण्डल आयोग’ के रूप में ऐतिहासिक रूप से प्रसिद्ध हो गया। मण्डल आयोग के सदस्यों के रूप में सर्वश्री आर. आर. भोले, दीवान मोहन लाल, एल. आर. नायक तथा के. सुब्रामनयम की नियुक्ति की गई।

    आयोग को प्रमुख रूप से सम्पूर्ण भारत में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को निर्धारित करने के लिए ‘मापदण्ड'(Critaria) निश्चित करने तथा उनके उन्नयन (Advancement) हेतु उपाय करने एवं उनके लिए सरकार में पदों के आरक्षण की आवश्यकता का परीक्षण करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया।

    जैसा कि पिछले कुछ पृष्ठों में वर्णित किया जा चुका है कि अनेक विद्वानों, वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों व समाजशास्त्रियों आदि से विचार-विमर्श करने के उपरान्त मण्डल कमीशन ने सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन के मापदण्डों को निश्चित करके अपने अध्ययन के आधार पर यह दिसम्बर 1980 में अपनी अन्तरिम रिपोर्ट प्रस्तुत की थी।

    जिसमें वह निष्कर्ष निकाला कि भारत में कुल जनसंख्या का 52% प्रतिशत पिछड़ा वर्ग निवास करता है, इसमें हिन्दू व गैर-हिन्दू दोनों ही शामिल हैं। इस आधार पर पिछड़े वर्ग के आरक्षण आदि के बारे में मण्डल आयोग की कुछ सिफारिशें इस प्रकार प्रस्तुत की जा सकती है

    1.पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण होना चाहिए। जिन राज्यों में पहले से ही 27 प्रतिशत से अधिक आरक्षण की व्यवस्था लागू है, वह इस सिफारिश से प्रभावित नहीं होगी।

    1. अन्य पिछड़े वर्ग के जो उम्मीदवार खुली प्रतियोगिता में योग्यता (मेरिट) के आधार पर चयनित हों, उनको इस 27 प्रतिशत के आरक्षण में समायोजित नहीं किया जाना चाहिए।
    2. आरक्षण के इस 27 प्रतिशत नियम को पदोन्नति कोटा के सभी स्तरों पर लागू किया जाना चाहिए।
    3. आरक्षित शेष पदों को न भरे जाने की स्थिति में उनको तीन वर्षों तक आगे सुरक्षित रखना चाहिए और तत्तपश्चात् उनको गैर-आरक्षित (De-reserve) मानना चाहिए।
    4. पदों पर सीधी भर्ती के मामले में ‘अन्य पिछड़े वर्गा’ को ऊपरी आयु सीमा में छुट उसी रूप में दी जानी चाहिए जिस प्रकार से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों को दी जाती है।
    5. सम्बन्धित अधिकारियों द्वारा प्रत्येक श्रेणी के पदों के लिए एक रोस्टर प्रणाली’ उसी ढंग से अपनानी चाहिए, जैसी कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के मामले में अपनाई जाती है।
    6. उपर्युक्त सभी सिफारिशें भर्ती के सन्दर्भ में समस्त सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (राज्य व केन्द्र दोनों सरकारों के अधीन) तथा समस्त राष्ट्रीयकृत बैंकों पर भी लागू हो रही हैं।
    7. समस्त विश्वविद्यालयों तथा सम्बद्ध महाविद्यालयों पर भी आरक्षण की उपर्युक्त योजना को लागू किया जाना चाहिए।

    आयोग ने अपनी सिफारिशों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए यह भी आवश्यक बताया है कि मौजूदा अधिनियमों, नियमों, सरकारी प्रक्रिया के तदानुसार उचित संशोधन किया जाना चाहिए।

    जैसा कि सर्वविदित ही है कि 27 मार्च, 2007 को भारत के उच्चतम न्यायालय ने अशोक कुमार बनाम भारतीय संघ’ की एक जनहित याचिका पर विचार करके एक अन्तरिम आदेश के द्वारा IIT तथा LLM. जैसे उच्च शिक्षा संस्थानों में अन्य पिछड़े वर्गों के 27 प्रतिशत आरक्षण पर रोक लगा दी।

    27 अप्रैल, 2008 को उच्चतम न्यायालय ने सरकार द्वारा सहायता प्राप्त शिक्षा संस्थानों में OBC के लिए 27% आरक्षण के निर्णय को सही नहराया। यद्यपि इसमें ‘मलाईदार तबके’ (Creamy Layer) को आरक्षण से अलग रखने का भी निर्णय दिया।

     

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