दीवानों की हस्ती’ कविता के रचयिता कौन हैं?

    प्रश्नकर्ता smithi
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    उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
    Moderator

    दीवानों की हस्ती’ कविता के रचयिता भगवतीचरण वर्मा  है

    भगवतीचरण वर्मा मूलरूप से कथाकार और उपन्यासकार के रूप में जाने जाते हैं। किंतु उन्होंने अपने लेखन की शुरूआत कविता से की थी।

    जिस समय उन्होंने कविता लिखना प्रारंभ किया वह छायावादी युग का दौर था और उनकी प्रारंभिक कविताओं में इस दौर की झलक भी दिखाई पड़ती है।

    उनकी कविता ‘हम दीवानों की क्या हस्ती‘, ने उन्हें प्रारंभिक दौर में ही जबरदस्त ख्याति दिलाई।

    इस कविता में जीवन के प्रति आस्था और विश्वास की झलक देखने को मिलती है। उसकी कविता –

    हम दीवानों की क्या हस्ती

    हम दीवानों को क्या हस्ती है

    आज यहाँ, कल वहाँ चले

    मस्ती का आलम साथ चला

    हम धूल उड़ाते जहाँ चले

    आए बनकर उल्लास अभी

    आंसू बनकर यह चले अभी

    सब कहते ही रह गए, अरे

    तुम कैसे आए, कहाँ चले

    किस ओर चले यह मत पूछो

    चलना है, बस इसलिए चले

    जग से उसका कुछ लिए चले

    जग को अपना कुछ दिए चले

    दो बात कही, दो बात सुनी

    कुछ हंसे, और फिर कुछ रोए

    छककर सुख-दुख के पूंटों को

    हम एक भाव से पिए चले

    हम भिखमंगे की दुनिया में

    स्वच्छंद लुटाकर प्यार चले

    हम एक निशानी सी उर पर

    ले असफलता का भार चले

    हम मान रहित, अपमान रहित

    जी भरकर खुलकर खेल चले

    हम हंसते-हंसते आज यहाँ

    प्राणों की बाजी हार चले .

    हम भला-बुरा सब भूल चुके

    नत-मस्तक हो मुख मोड़ चले

    अभिशाप उठाकर होठों पर

    वरदान दृगों से छोड़ चले

    अब अपना और पराया क्या

    आबाद रहें रूकने वाले

    हम स्वयं बंधे थे, और स्वयं

    हम अपने बंधन तोड़ चले।

    हम दीवानों की क्या हस्ती

    है आज यहाँ कल वहाँ चले

    मस्ती का आलम साथ चला

    हम धूल उड़ाते जहाँ चले।

    भगवती बाबू की चर्चा हिंदी साहित्य में एक दिग्गज और युगांतकारी उपन्यासकार के रूप में होती है।

    कहानियों की भी जो बेहद शक्तिशाली और अपने मिजाज की कहानियाँ हैं, काफी चर्चा हुई है।

    लेकिन भगवती बाबू की कविताओं की ज्यादा चर्चा नहीं हुई। जबकि भगवती बाबू अद्भुत कवि थे।

    वे इतने शक्तिशाली कवि हैं, कि उनकी कुछ कविताएँ ही हिंदी साहित्य के इतिहास में उनके नाम को ऊपर करने के लिए काफी हैं।

    भगवतीचरण वर्मा का रचना संसार अत्यंत बृहद है। उपन्यास, कहानियाँ, एकांकी, नाटक, कविताएँ, निबंध, संस्मरण और संपादन सभी को उन्होंने श्रेष्ठता प्रदान की है।

    उनके प्रमुख उपन्यास है-‘अपने खिलोने’, ‘आखिरी दाँव’, ‘चाणक्य’, ‘चित्रलेखा’, ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते’, ‘तीन वर्ष’, ‘धुष्पल’, ‘थके पाँव’, ‘पतन’, ‘मृग और मरीचिका’, ‘भूले बिसरे चित्र’, ‘युवराज चुंडा’, ‘रेखा’, ‘वह फिर नहीं आई’, ‘सबहिं नचावत राम गोसाई’, ‘सामर्थ्य और सीमा’, ‘सीधी सच्ची बातें’,

    एकांकी और नाटक में ‘चलते-चलते’, ‘बुझता दीपक’, ‘रूपिया तुम्हें खा गया’, वसीयत।

    कहानियाँ  ‘इंस्टालमेंट’, ‘दो बाँके’, ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’, ‘मेरी कहानियाँ’, ‘मोर्चा बंदी और राख और चिंगारी’।

    काव्य में-‘आधुनिक कवि’, ‘एक दिन’, ‘सविनय और एक नाराज कविता’, ‘त्रिपथगा’, ‘प्रेम संगीत’, ‘मधुकण’, ‘मेरी कविताएँ’, ‘रंगों से मोह
    ओर विस्मृति के फूल’।

    निबंध संस्मरण और अन्य विधाओं में जो पुस्तकें लिखी’अतीत के गर्त में’, ‘ये सात और हम’, ‘वासव दत्ता’, ‘साहित्य की मान्यताएँ’, ‘साहित्य के सिद्धांत तथा रूप और हमारी उलझन’। जिनका संपादन किया उनमें हैं-‘नवजीवन’ और ‘विचार’।

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