गोखले की उदारवादी राजनीति की अवधारणा की विवेचना कीजिए

    प्रश्नकर्ता sumit kumar
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    उत्तरकर्ता Quizzer Jivtara
    Participant

    नैतिक विचारों से ओतप्रोत गोखले राजनीति के क्षेत्र में भी नैतिकता के ही पूर्ण समर्थक थे।

    सार्वजनिक नेता के रूप में उनका ध्येय राजनीति को आध्यात्मिक रूप देना था, आगे चलकर उनके इसी आदर्श को उनके शिष्य महात्मा गाँधी ने भी अपनाया।

    वे स्वभाविक आध्यात्मवादी थे तथा आदर्शवाद में रमे तथा उच्च नैतिक मानदण्डों पर चलने वाले थे।

    विद्वानों ने उनकी तुलना ग्लेडस्टोन तथा आस्क्विथ से की है।

    उन्होंने हमेशा ही अपने आत्मत्याग, कर्तव्यपरायण तथा उद्देश्यपूर्ण कार्यों के लिए नैतिक मार्ग को प्रोत्साहन दिया।

    उनका मानना था कि राजनीति में वार्ता, संयम तथा समझौते के तरीकों को ही अपनाया जाना चाहिए।

    इससे राजनीति का स्वाभाविक रूप निखर कर जनता के समक्ष आता है जिसमें लोकतान्त्रिक प्रतिमानों को अंगीकृत किया जाता है।

    नीति निर्माता तथा कानूनी नीतियों का समर्थन करने के साथ ही वे संवैधानिक आन्दोलनों की पद्धतियों में भी विश्वास करते थे।

    डॉ. वी. पी. वर्मा ने उनके बारे में स्पष्ट भी किया है कि भारतीय राजनीतिक चिन्तन में गोखले के योगदान को दो सूत्रों में व्यक्त किया जा सकता है।

    प्रथम, वे राजनीति में नैतिक मूल्यों को समाविष्ट करना चाहते थे। दूसरा, राजनीतिक कार्य प्रणाली के रूप में उन्होंने संवैधानिक उपायों का हमेशा ही समर्थन किया।

    गाँधीजी के अनुसार, गोखले से मैंने यह सीखा कि राजनीतिक क्षेत्र में हमें धार्मिक उत्साह की नितांत आवश्यकता है।

    उग्रवादी तिलक ने स्पष्ट भी किया है कि, गोखले स्वभाव से ही मृदु थे अत: उनकी प्रवृत्ति यही थी कि नरम तरीकों से ही कार्य निकाला जा सके तो बेहतर है।

    लॉर्ड कर्जन के शब्दों में, “मैंने किसी राष्ट्र का ऐसा कोई भी और व्यक्ति नहीं देखा है जिसे उनसे अधिक संसदीय क्षमताएँ स्वभावतः प्राप्त हो।” प्रो. साहनी के अनुसार, गोखले का सार्वजनिक जीवन आधुनिक उदारवादी विचारधारा का पूरा लेखा-जोखा था।

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