औचित्य सिद्धान्त की परम्परा बताइये

    प्रश्नकर्ता Deepak Porwal
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    उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
    Moderator

    औचित्य सिद्धान्त का प्रतिपादन क्षेमेन्द्र ने ग्यारहवीं शती में किया था।

    औचित्य विचारचर्चा ग्रन्थ में उन्होंने कहा कि जब तक काव्य में औचित्य प्राप्त नहीं होता, अलंकार और गुणों की कोई उपयोगिता नहीं। रससिद्धकाव्य का प्राणभूत तत्त्व तो औचित्य है।

    शब्दार्थ रूप काव्य में उपमा, उत्प्रेक्षा आदि अलंकार बाह्य शोभा प्रदर्शित करने के कारण कटक, कुंडल, हार आदि के समान सौन्दर्य के प्रसाधन मात्र हैं।

    कुछ विद्वानों ने काव्य के जो गुण बताए हैं, वे सत्य, शील आदि के समान गुणमात्र हैं। काव्य में अविनाशी तत्त्व तो औचित्य है। इसके बिना गुण और अलंकार निर्जीव हो जाते हैं।

    अतः उचित स्थान पर धारण करने पर ही अलंकारों की शोभा होती है और औचित्य से युक्त ही गुण प्रशंसनीय हो पाते हैं इस प्रकार जो पदार्थ जिसके अनुरूप होता है, उसे प्राचीन आचार्यों ने उचित कहा है।

    उचित के भाव को औचित्य कहते हैं। पद, वाक्य, प्रबन्धार्थ, गुण, अलंकार, रस, क्रिया, कारक, लिंग, वचन, विशेषण, उपसर्ग, निपात, काल देश, कुल, व्रत, तत्त्व, सत्व, अभिप्राय, स्वभाव, सारसंग्रह, प्रतिभा, अवस्था, विचार, नाम, आशीर्वाद इन स्थानों में व्याप्त औचित्य स्पष्ट प्रतीत हुआ करता है।

    विवेचन-  क्षेमेन्द्र का मन्तव्य है कि उपर्युक्त स्थानों के प्रयोग, इस विधि से किए जाएँ कि वे पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों को अपील करें तथा इनके यथास्थान होने में किसी प्रकार की विमति न रहे।

    इन स्थानों के अनुचित प्रयोग से काव्यत्व की हानि होती है। यदि मुकुट में जड़ित होने वाली मणि, पैरों के आभूषण में जड़ दी जाए तो वह विरोध नहीं करती, परन्तु कलाकार की निन्दा होती है।

    इसी प्रकार पद, वाक्य, प्रबन्ध, गुण, अलंकार, रस आदि का यथास्थान प्रयोग न हो तो इसमें कवि का दोष है। अतः औचित्य की उपेक्षा से काव्य निर्जीव हो जाता है।

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