आपके विचार से “ग्राम स्वायत्तता” चोल प्रशासन की प्रकृति का वर्णन कैसे करती है?

    प्रश्नकर्ता Jai Singh
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    उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
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    चोलों की शासन व्यवस्था में स्थानीय शासन का प्रमुख स्थान था। उनकी स्थानीय शासन व्यवस्था वर्तमान पंचायती राजव्यवस्था के समकक्ष थी जो कि लोकतांत्रिक आधारों पर स्थापित की गई थी।

    उत्तरमेरूर से परांतक कालीन 919 से 929 ई. के लेखों के आधार पर ग्राम सभा की कार्यकारिणी समितियों की कार्य प्रणाली का विस्तृत विवरण प्राप्त करते हैं।

    प्रत्येक ग्राम में अपनी सभा होती थी जो प्रायः केंद्रीय नियंत्रण से मुक्त होकर स्वतंत्र रूप से ग्राम शासन का संचालन करती थी। ग्रामों में मुख्यतः दो प्रकार की संस्थाएँ कार्य करती थीं –

    (1) उर – शास्त्रों के अनुसार इससे तात्पर्य ‘पुर‘ से है जो गाँव। एवं नगर दोनों के लिए प्रयुक्त होता था। ‘उर’ की बैठकों में सभी ग्रामवासी सम्मिलित होते थे और यह सामान्य मनुष्यों की संस्था थी।

    ‘उर’ की कार्य-समिति को ‘गणम‘ कहा जाता था। समिति के सदस्यों की संख्या अथवा उसके चुनाव की विधि के सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं मिलती।

    कुछ सभाओं के लिए एक ही कार्य समिति होती थी जो सभी विषयों की देख-रेख के लिए उत्तरदायी थी। कहीं-कहीं एक ही ग्राम में दो ‘उर’ संगठन कार्य करते थे। 1245 ई. में ‘उस्तूवुर्रम्‘ तथा ‘अमणकुंडि‘ नामक ग्रामों में दो-दो ‘उर’ कार्य कर रहे थे।

    (2) सभा या महासभा – यह अग्रहार ग्रामों में होती थी। ऐसे ग्रामों को ‘ब्रह्मदेय’ अथवा ‘मंगलम्’ भी कहा गया है। अग्रहार ग्रामों में मुख्यतः विद्वान ब्राह्मण निवास करते थे।

    चोल मण्डलम् के लेखों से अग्रहार के विषय में सूचना मिलती है। इनसे स्पष्ट है कि काञ्ची तथा मद्रास क्षेत्रों में ऐसी कई सभाएं थीं। सभा मुख्यतः समितियों के माध्यम से कार्य करती थी। इसे वारीयम कहा गया है।

    तमिल में इस शब्द का अर्थ ‘आय‘ है। एक लेख में सभा की कार्य समिति को वरणम् कहा गया है। सभा द्वारा किसी कार्य विशेष के लिए नियुक्त व्यक्तियों को ‘वारियर’ कहा जाता था।

    ‘वारियम’ को मंदिर का प्रबन्ध करने, देवभूमि का प्रामाणिक विवरण देने एवं उसकी सीमा लिखने का कार्य दिया गया। है।

    वारीयम् के सदस्यों को कोई पुरस्कार नहीं दिया जाता था।

    कभी-कभी एक ही ग्राम में उर तथा सभा ये दोनों ही संस्थाएँ कार्य करती थीं। जिन स्थानों में पहले से कोई बस्ती होती थी तथा वे बाद में ब्राह्मणों को दान में दे दिये जाते थे वहाँ ‘उर’ तथा सभा साथ-साथ कार्य करती थी।

    ऐसे गाँवों के मूल निवासी ‘उर’ में मिलते थे जबकि नवागंतुक ब्राह्मण अपनी सभा गठित कर लेते थे। ग्राम सभा के सदस्यों की संख्या भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न होती थी।

    कहीं-कहीं सभी वयस्क पुरुष | इसके सदस्य होते थे जबकि कुछ स्थानों में यह एक निर्वाचित संस्था थी। ऐसी स्थिति में इसके सदस्यों का चुनाव ग्रामवासियों द्वारा किया जाता था

    तथा सदस्यों के लिए कुछ निर्धारित योग्यताएं भी होती थीं। ग्राम सभा की बैठकें प्रायः मंदिरों तथा मण्डपों में होती थी।

    बैठक के  लिए निर्धारित स्थान को ‘ब्रह्मस्थान’ कहा जाता था। कभी-कभी वृक्षों के नीचे या किसी तालाब के तट पर भी ग्राम सभा की बैठकें होती थीं।। प्रत्येक सभा अथवा महासभा के अंतर्गत कई समितियाँ होती थीं जिन्हें ।

    ‘वारीयम’ कहा जाता था। ये समितियाँ अलग-अलग विभागों का काम देखती थीं।

    कुछ प्रमुख समितियाँ इस प्रकार थीं – दान समिति, उपवन समिति, सिंचाई समिति, कृषि समिति, शिक्षा समिति, भूमि प्रबन्ध | समिति, मंदिरों की देखरेख करने वाली समिति लेखा-जोखा समिति, मार्गों एवं सड़कों की देखरेख करने वाली समिति आदि।

    समिति के सदस्यों को चुनने के लिए प्रत्येक गाँव को 30 वार्डों में। बाँटा जाता था। निर्वाचित होने के लिए कुछ योग्यताएं आवश्यक थी,

    यथा – जिनकी आयु 35-70 के बीच हो, डेढ़ एकड़ भूमि हो, एक वेद एवं उसके भाष्य का ज्ञाता हो एवं निजी आवास हो।

    अपराधी, चरित्रहीन, समिति की आय-व्यय में घोटाला करने वाला तथा शूद्रों के सम्पर्क से दूषित हुआ व्यक्ति समिति का सदस्य नहीं बन सकता था। प्रत्येक वार्ड से एक-एक व्यक्ति का चुनाव लाटरी निकाल कर किया जाता था।

    प्रत्येक उम्मीदवार का नाम अलग-अलग पत्रों पर लिखकर एक बर्तन में रखा जाता था और उसे हिलाकर मिला दिया जाता था।

    तत्पश्चात् किसी अबोध बच्चे से एक पत्र उठाने को कहा जाता था। वह जिस व्यक्ति के नाम का पत्र उठा लेता था वह समिति का सदस्य बन जाता था। इस प्रकार कुल तीस व्यक्ति चुने जाते थे जिन्हें विभिन्न समितियों में रखा जाता था।

    ऐसी व्यवस्था थी कि केवल वह व्यक्ति जो पिछले तीन वर्षों से किसी समिति का सदस्य नहीं रहा है, वही समिति का नया सदस्य चुना जाता था। इस प्रकार प्रत्येक ग्रामवासी को समिति का सदस्य बनने का अवसर मिल जाता था।

    इसके अतिरिक्त एक सामान्य समिति भी होती थी। जिसे ‘सम्वत्सवारीयम्‘ कहा जाता था। इसका कार्य सभी समितियों के कार्यों की देखरेख करना होता था। जो व्यक्ति पहले किसी समिति का सदस्य रह चुका होता तथा पर्याप्त अनुभवी होता वही सामान्य समिति का सदस्य बन सकता था।

    महासभा को ‘पेरुर्रि’ इसके सदस्यों को ‘पेरुमक्कल’ तथा समिति के सदस्यों को ‘वारियप्पपेरुमक्कल’ कहा जाता था।

    ग्राम सभा को राज्य के प्रायः सभी अधिकार मिले हुए थे। उसके  पास सामहिक सम्पत्ति होती थी जिसे वह जनहित में बेच सकती अथवा बन्धक रख सकती थी।

    यह न्याय का भी काम करती थी तथा ग्रामवासियों के सामान्य झगड़ों का फैसला भी करती थी। ग्राम सभा के पास बैंक भी होते थे तथा वह धन, भूमि तथा धान्य के रूप में जमा राशि प्राप्त करती थी तथा फिर ब्याज पर उन्हें वापिस लौटा देती थी।

    गांव की सभी अक्षय निधियाँ ग्राम सभा के अधीन होती थीं। सभा को ग्रामवासियों पर कर लगाने, वसूलने एवं उनसे बेगार लेने का भी अधिकार प्राप्त था। पीने के पानी, उपवनों, सिंचाई तथा आवागमन के साधनों की व्यवस्था करना ग्राम सभा के मुख्य कार्य थे।

    अकाल के समय वह ग्रामवासियों की उदारतापूर्वक मदद करती थी। ग्राम सभा – मंदिरों, शिक्षण संस्थाओं एवं दानग्रहों का भी प्रबन्ध चलाती थी तथा  राजस्व संग्रह कर सरकारी कोष में जमा करती थी।

    ग्रामवासियों के स्वास्थ्य, जीवन एवं सम्पत्ति की रक्षा करना भी ग्रामसभा का कर्तव्य था।  इस प्रकार ग्रामसभा के कार्य विस्तृत एवं व्यापक थे। केंद्रीय सरकार को वास्तविक कर देना उसकी मुख्य जिम्मेदारी थी।

    जब तक ग्राम सभा अपने कर्तव्यों का पालन करती थी एवं राज्य को नियमित कर पहुंचाती | थी, राज्य उसके शासन में हस्तक्षेप नहीं करता था। परवर्ती चोल युग में  केंद्रीय सरकार द्वारा सभा में हस्तक्षेप के उदाहरण मिलते हैं।

    ग्राम-सभा  के आय-व्यय का निरीक्षण समय-समय पर केंद्रीय अधिकारी किया करते थे। सामान्यतः ग्रामसभा एवं केंद्रीय सरकार के सम्बन्ध सौहार्दपूर्ण हुआ  करते थे।

    समुदाय एवं निगम – ग्राम सभा के अतिरिक्त गाँव में कई  समुदाय एवं निगम होते थे। ये सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक प्रकृति के थे।

    इनका अधिकार किसी कार्य विशेष तक ही सीमित होता था। उदाहरण के लिए किसी मंदिर का प्रबन्ध अथवा व्यवसाय का संचालन करने के लिए समुदाय गठित किये जाते थे।

    ‘समुदाय’ पर ग्राम सभा का ही नियंत्रण होता था। समुदायों के सदस्य सभा के भी सदस्य थे। विभिन्न समुदायों में झगड़ा होने पर ग्रामसभा ही फैसला करती थी। धर्म के आधार पर बने हुए समुदायों की संख्या अधिक थी जो अपने अपने  स्थानों के मंदिरों का प्रबन्ध करते थे।

    मंदिर के पुजारियों के भी अपने संगठन होते थे। ‘मलूपरुडैयार’ नामक धार्मिक संगठन का उल्लेख मिलता है जिसका मुख्य कार्य मंदिरों का प्रबन्ध करना था। शैव पुजारियों को शिव ब्राह्मण तथा वैष्णव पुजारियों को ‘बैखानस’ कहा जाता था।

    कुछ समुदायों की सामाजिक स्थिति निम्न मानी जाती थी विभिन्न समुदायों के आपसी सम्बन्ध सद्भाव पर आधारित होते थे तथा उनका नियमन करने के लिए किसी सरकार या कानून की आवश्यकता नहीं समझी गयी थी।

    प्रत्येक ग्राम वस्तुतः एक लघु गणतंत्र ही था जिसे अपने कार्यों में स्वायत्तता मिली हुई थी और यह स्वायत्तता इतनी अधिक थी कि उच्च स्तर पर होने वाले प्रशासनिक या राजनैतिक परिवर्तन भी इसे प्रभावित नहीं कर सकते थे।

    प्रत्येक ग्राम राजनैतिक एवं आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर था।समितियों और स्थानीय सभाओं को अनेक महत्वपूर्ण कार्य सौंपे गए थे।

    गाँव में दिए गए सभी धार्मिक अनुदानों का प्रबंध ग्रामसभा ही करती थी। सभा मंदिरों में रामायण, महाभारत, पुराण और अन्य धर्मग्रंथों का पाठ करने वालों के लिए राजस्व मुक्त भूमि दान में देती थी।

    इसी प्रकार गाँव की सार्वजनिक भूमि से होने वाली आय को मंदिरों को दी जाने की व्यवस्था थी जिससे मंदिरों में नृत्य-गान तथा अभिनय को प्रोत्साहन दिया जा सके मंदिरों को शिक्षा के प्रचार तथा अस्पतालों की व्यवस्था के लिए भी भूमि अनुदान दिया जाता था।

    गाँवों में जमीन संबंधी अधिकारों की सुरक्षा करना, सिंचाई की व्यवस्था करना, सार्वजनिक हित के कार्य करना, कानून-व्यवस्था बनाए रखना तथा मुकदमों का फैसला करना भी सभा का काम था।

    इसी प्रकार के कार्य अन्य स्थानीय संस्थाएं भी करती थीं। इन संस्थाओं ने आने वाले राजवंशों के काल में भी अपना अस्तित्व  किसी न किसी रूप में बनाये रखा। इन्हें वर्तमान पंचायती राजव्यवस्था का ही सही मायनों में प्रतिरूप माना जा सकता है।

    वस्तुतः दक्षिण भारतीय इतिहास और विशेषकर चोल इतिहास में स्थानीय स्वायत्तशासी प्रशासनिक इकाइयों का महत्वपूर्ण योगदान था।

    चोल शासन व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं पर विचार करने के पश्चात् यह स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन युग की यह एक उत्कृष्ट  शासन-प्रणाली थी जिसमें केंद्रीय नियंत्रण तथा स्थानीय स्वायत्तता साथ- साथ वर्तमान रही।

    चोलों की शासन व्यवस्था का मूल्यांकन करते हुए नीलकंठ शास्वी लिखते हैं कि “एक योग्य नौकरशाही तथा सक्रिय स्थानीय संस्थाओं के बीच जो विविध प्रकार से नागरिकता की भावना का पोषण  करती थी, शासन निपुणता तथा शुद्धता का एक उच्च स्तर प्राप्त कर लिया गया था, जो किसी हिन्दू राज्य द्वारा प्राप्त सर्वोच्च स्तर पर था।”

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