अकबर से औरंगजेब के समय तक मनसबदारी व्यवस्था के विकास का वर्णन कीजिए।

    प्रश्नकर्ता rameshwar
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    उत्तरकर्ता jivtarachandrakant
    Moderator

    मनसब फारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है पद या ओहदा। इसके दो भाग थे- जात एवं सवार।

    जात से तात्पर्य व्यक्तिगत पद (सेना) से था जबकि सवार का तात्पर्य घुड़सवारों की संख्या से था। मनसबदार शब्द पदाधिकारी के लिए प्रयुक्त होता था इस पूरी व्यवस्था को मनसबदारी व्यवस्था कहा जाता था।

    मुगलकाल में मनसबदारी व्यवस्था का प्रारम्भ अकबर ने किया। मनसबदारी व्यवस्था की उत्पत्ति विश्वविख्यात मंगोल विजेता और आक्रमणकारी |चंगेज खाँ के काल में हुई थी।

    जिसने अपनी सेना को दशमलव के आधार पर संगठित किया था। इसमें सबसे छोटा एकांश दस का था और सबसे ऊंचा दस हजार का था।

    मुगलकाल में मनसबदारी व्यवस्था का प्रारम्भ अकबर ने अपने शासनकाल के उन्नीसवें वर्ष (1575) में किया था। अकबर| जागीरदारी प्रथा के स्थान पर मनसबदारी प्रथा लाया।

    सम्राट अकबर  सेना के महत्व को भली-भांति जानता था, उसे पता था कि एक स्थायी और शक्तिशाली सेना के अभाव में न तो शान्ति स्थापित की जा सकती है और न ही साम्राज्य की रक्षा व विस्तार। अकबर से पूर्व जागीरदारी प्रथा के आधार पर सेना एकत्र करने की प्रथा प्रचलित थी, |

    उसने देखा कि जागीरदार निश्चित संख्या में न तो घोड़े रखते हैं और न ही घुड़सवार या सैनिक। इसके विपरीत वे सरकारी धन को अपनी  विलासिता पर खर्च करते थे। अकबर ने जागीरदारी प्रथा के स्थान पर  मनसबदारी प्रथा के आधार पर सेना को संगठित किया। मनसबदारी सेना को संगठित करने की एक व्यवस्था थी।

    जिसमें प्रत्येक मनसबदार अपनी-अपनी श्रेणी और पद (मनसब) के अनुसार  घुड़सवार सैनिक रखता था। इस व्यवस्था में मनसबदार सम्राट से प्रति  माह नकद वेतन प्राप्त करता था। अकबर ने अपने प्रत्येक सैनिक और असैनिक अधिकारी को कोई न कोई मनसब (पद) अवश्य दिया।

    इन पदों को उसने जात या सवार नामक दो भागों में विभाजित किया। जात का अर्थ व्यक्तिगत पद या ओहदा व सवार का अर्थ घुड़सवारों की उस निश्चित संख्या से है जिसे किसी मनसबदार को अपने अधिकार में रखने का अधिकार होता था।

    दूसरे शब्दों में यदि कहा जाये तो मनसब पद, प्रतिष्ठा अथवा अधिकार प्राप्त करने की स्थिति थी इससे व्यक्ति का पद, स्थान और वेतन निर्धारित होता था। मनसबदारों की नियुक्ति सम्राट स्वयं करता था और उसकी मर्जी तक ही अपने पद पर बने रह सकते थे।

    प्रायः सात हजार का मनसब राजघराने के लोगों या बहुत ही महत्वपूर्ण और विश्वसनीय सरदारों जैसे- राजा-मानसिंह, मिर्जा शाहरुख और अजीज कोका को ही दिया गया। मुगल मनसबदारों को प्रायः नगद वेदन दिया जाता था।

    मनसबदार सैनिक अभियानों में भेजे जा सकते थे। समय-समय पर सौंपे गये गैर सैनिक और प्रशासनिक कार्य भी करने पड़ते थे।

    500 से नीचे के मनसबदार, मनसबदार कहलाते थे। 500 से 2500 तक के मनसबदारों को ‘अमीर’ कहा जाता था। 2500 से ऊपर के मनसबदारों को ‘अमीर-ए-आजम’ कहा जाता था। सैनिक अधिकारियों में सर्वाधिक प्रतिष्ठा का पद खानेजामा का था, तत्पश्चात् खानेखाना का था।

    काजियों व सद्रों को इस व्यवस्था में सम्मिलित नहीं किया गया था। अकबर की मृत्यु के पश्चात् उसके उत्तराधिकारियों ने मनसबदारी व्यवस्था में दो महत्वपूर्ण परिवर्तन किये

    जहाँगीर ने अपने समय में दो अस्पा एवं सिह अस्पा नामक नवीन व्यवस्था की शुरुआत की। दो अस्पा से तात्पर्य दो घोड़े, जबकि सिंह-अस्पा से तात्पर्य तीन घोड़े से था। जहाँगीर ने सर्वप्रथम यह पद महावत खाँ को दिया।

    शाहजहाँ ने मनसबदारी व्यवस्था में मासिक वेतन की शुरुआत की। शाहजहाँ के समय में पूरे मुगल काल का सबसे बड़ा मनसब दाराशिकोह को 60,000 का दिया गया।

    शाहजहाँ के समय में दो नयी जागीर शीशमहा एवं सीमाहा प्रचलित हुई। शीशमहा जागीर से निर्धारित आय की 50% वसूली होती थी जबकि सीमाहा से 25% की।

    औरंगजेब ने मनसबदारी व्यवस्था में मशरुत की शुरुआत की। इसके तहत सवार में आकस्मिक वृद्धि हो जाती थी। औरंगजेब के समय हिन्दू मनसबदारों की सर्वाधिक संख्या 33 प्रतिशत थी।

    औरंगजेब के समय मनसबदारों की संख्या में इतनी वृद्धि हुई कि उन्हें देने के लिए जागीर नहीं बची, इस स्थिति को बेजागिरी’ कहा गया।

    औरगजेब के काल में खालसा भूमि को भी मनसबदारों को प्रदान किये गये। फलस्वरूप जागीर की निधारित आय एवं वास्तविक प्राप्त आय के बीच अन्तर बढ़ता गया। इस कारण मनसबदारी व्यवस्था चरमरा गयी।

    मनसबदारी व्यवस्था मुगल प्रशासनिक व्यवस्था का मेरुदण्ड था इसके द्वारा राज्य के प्रशासकीय व्यवस्था में एकरूपता आई जिससे  राजनैतिक एकीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ।

     

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